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'राष्ट्र-विरोधी गतिविधि'

चर्चा में क्यों?

हाल ही में, गृह मंत्रालय ने लोकसभा को सूचित किया है कि वाक्यांश 'राष्ट्र-विरोधी' को विधिक रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। वर्ष 1976 में आपातकाल के दौरान संविधान में 'राष्ट्र-विरोधी गतिविधि' को शामिल किया गया था, जिसे बाद में इसे हटा दिया गया।

प्रमुख बिंदु

  • इसे आपातकाल के दौरान 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान के अनुच्छेद 31(घ) में शामिल किया गया, जिसमें 'राष्ट्र-विरोधी गतिविधि' को परिभाषित किया गया। इस अनुच्छेद को बाद में 43वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1977 द्वारा निरसित कर दिया गया।
  • गौरतलब है कि 'राष्ट्र-विरोधी' शब्द को विधियों में परिभाषित नहीं किया गया है। हालाँकि, ऐसी गैरकानूनी और विध्वंसक गतिविधियों से निपटने के लिये आपराधिक कानून व विभिन्न न्यायिक घोषणाएँ मौज़ूद हैं, जो देश की एकता और अखंडता के समक्ष खतरा उत्पन्न कर सकती हैं। 
  • वर्ष 2019 में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा वर्ष 2017 के लिये जारी 'क्राइम इन इंडिया' नामक वार्षिक रिपोर्ट में पहली बार 'राष्ट्र विरोधी तत्त्वों द्वारा किये गए अपराध' के संबंध में एक अध्याय शामिल किया गया। इस अध्याय में ‘पूर्वोत्तर भारत के विद्रोहियों, वामपंथी चरमपंथियों तथा आतंकवादियों (जिहादी आतंकवादियों सहित)’ को तीन राष्ट्र विरोधी तत्त्वों के रूप में सूचीबद्ध किया गया।
  • विगत तीन वर्षों के दौरान 'राष्ट्र-विरोधी' गतिविधियों से संबंधित अपराधों में वृद्धि हुई है, इस संदर्भ में संसद के एक सदस्य द्वारा इन अपराधों में संलिप्त व्यक्तियों की संख्या तथा इनसे निपटने हेतु सर्वोच्च न्यायलय के दिशा-निर्देशों का विवरण मांगा। 
  • इसके प्रत्युत्तर में यह कहा गया कि संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार 'लोक व्यवस्था' और 'पुलिस' राज्य सूची के विषय हैं, अतः राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में संलिप्त लोगों की संख्या के बारे में डाटा केंद्रीय स्तर पर नहीं रखा जाता है। 
  • वस्तुतः अपराधों की जाँच, पंजीकरण व अभियोजन, जीवन तथा संपत्ति की सुरक्षा सहित कानून और व्यवस्था बनाए रखने का दायित्व मुख्य रूप से संबंधित राज्य सरकार का होता है।
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