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सशस्त्र बल न्यायाधिकरण

चर्चा में क्यों

हाल ही में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक निर्णय के तहत कहा कि वायु सेना, नौसेना और सेना सहित सशस्त्र बलों के सदस्य वेतन, पेंशन, पदोन्नति और अनुशासन से जुड़े मुद्दों पर सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) के निर्णयों को उच्च न्यायालय में चुनौती दे सकते हैं।

प्रमुख बिंदु

  • केंद्र सरकार का तर्क है कि सशस्त्र बल न्यायाधिकरण अधिनियम के तहत सशस्त्र बलों के सदस्यों को ए.एफ.टी. के निर्णयों के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपील दायर करने का विकल्प उपलब्ध है।
  • जबकि उच्च न्यायालय का मानना है कि बड़ी संख्या में मामलों में शीर्ष अदालत में अपील दायर करना भारत के विभिन्न क्षेत्रों में तैनात सशस्त्र बलों के सदस्यों के लिये महंगा होने के कारण अप्रभावी साबित हो सकता है, जिस कारण न्यायायिक व्यवधान उत्पन्न होंगे।
  • साथ ही, दिल्ली उच्च न्यायालय ने रोजर मैथ्यू मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा है कि संविधान का अनुच्छेद 226 ए.एफ.टी. पर उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र को प्रतिबंधित नहीं करता है।
  • इसके अलावा, संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को केवल एक न्यायाधिकरण के आदेश के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में सीधे अपील करने का प्रावधान करके नज़रंदाज नहीं किया जा सकता है। 

सशस्त्र बल न्यायाधिकरण अधिनियम

  • सशस्त्र बल न्यायाधिकरण अधिनियम, 2007 का उद्देश्य न्यायाधिकरण की स्थापना कर उच्च न्यायालयों के समक्ष लंबित मामलों की बड़ी संख्या का निपटान कर न्याय प्रदान करना है।
  • सशस्त्र बल न्यायाधिकरण की मुख्य पीठ दिल्ली में है जबकि इसकी 10 अन्य पीठ भारत में अन्य क्षेत्रों में स्थित हैं।

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