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संविधान निर्माण की पृष्ठभूमि

(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना)

संदर्भ

प्रत्येक वर्ष की भाँति इस वर्ष भी 26 नवंबर को ‘संविधान दिवस’ मनाया गया। साथ ही, यह वर्ष भारत की स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने के कारण भी महत्त्वपूर्ण है। ऐसे में भारत की नई पीढ़ी को संविधान निर्माण की पृष्ठभूमि के संबंध में अवगत कराना आवश्यक है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 

  • सर्वप्रथम वर्ष 1938 में जवाहरलाल नेहरु ने किसी बाहरी हस्तक्षेप के भारत के संविधान का निर्माण व्यस्क मताधिकार के आधार पर चुनी हुई संविधान सभा द्वारा किये जाने की माँग की।
  • वर्ष 1946 में संविधान सभा का गठन हुआ। लगभग 3 वर्ष पश्चात 26 नवंबर, 1949 को संविधान बनकर तैयार हुआ। 26 जनवरी, 1950 को संविधान पूर्ण रूप से लागू किया गया। विदित है कि 26 जनवरी को ही वर्ष 1930 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने नेहरू की अध्यक्षता में 'पूर्ण स्वराज' की घोषणा की थी।

संविधान निर्माण की विकास प्रक्रिया

  • संविधान सभा में नेहरु ने ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ पेश किया। इसमें संवैधानिक संरचना के ढाँचे एवं उसके दर्शन की झलक थी। इसी आधार पर प्रस्तावना का निर्माण किया गया और संविधान में स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व तथा सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय जैसे विचार शामिल किये गए।
  • नेहरु यूरोपीय पुनर्जागरण, अमेरिका की स्वतंत्रता और फ्रांसीसी क्रांति के विचारों से काफी प्रभावित थे जिसकी झलक संविधान में भी दिखाई पड़ती है।
  • संविधान में सामाजिक समानता की अवधारणा को शामिल करने में डॉ. आंबेडकर का योगदान महत्त्वपूर्ण है जो भारतीय समाज के लिये परिवर्तनकारी साबित हुआ। उन्हें हिंदू समाज में व्याप्त संरचनात्मक विषमता और दर्शन की गहरी समझ थी।
  • आंबेडकर का विचार था कि भारत के संविधान का निर्माण विश्व के विभिन्न संविधानों को छानने के बाद किया गया है। उन्होंने राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत को संविधान की अनूठी विशेषता माना है जो कल्याणकारी राज्य की स्थापना करता है।

विधायिका की जवाबदेहिता

  • संविधान की प्रस्तावना ‘हम भारत के लोग’ से प्रारंभ होती है अर्थात संविधान का निर्माण भारत के लोगों ने ही अधिनियमित किया है अत: देश की संप्रभुता जनता में ही निहित है तथा सरकार का प्रत्येक अंग इनके प्रति जवाबदेह है।
  • संसदीय शासन की कैबिनेट प्रणाली में कार्यपालिका, विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है। विधायिका लोगों का प्रतिनिधित्त्व करती है अत: सरकार निर्माण में जनता की भूमिका महत्त्वपूर्ण है।

न्यायिक जवाबदेहिता

  • संविधान निर्माताओं ने विधायिका और कार्यपालिका की तरह न्यायपालिका पर जवाबदेहिता का बोझ नहीं डाला है। इस प्रकार, जवाबदेहिता के संबंध में राज्य के अन्य अंगों की तुलना में न्यायपालिका की संवैधानिक स्थिति स्पष्ट है।
  • न्यायपालिका का उत्तरदायित्व लोगों के साथ न्याय करना है अत: इसे एक स्वतंत्र संस्था बनाया गया है, जो कार्यपालिका व विधायिका के प्रति जवाबदेह नहीं है।
  • अनुच्छेद 142 पूर्ण न्याय की अवधारणा की स्थापना करता है। इसके तहत शीर्ष अदालत विशेष परिस्थितियों में कोई आदेश पारित कर सकता है। केशवानंद भारती वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने संवैधानिक भावनाओं को बरकरार रखने के लिये ‘बुनियादी ढाँचे का सिद्धांत’ प्रतिपादित किया। र, संविधान का विकास भारतीयता के अनुरूप हुआ है। संविधान संशोधन के लिये माध्यम मार्ग इसके लचीलेपन का उदाहरण है। 
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