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रूस-चीन संबंधों की गहराती साझेदारी और भारत पर इसका प्रभाव

चर्चा में क्यों ?

  • हाल ही में व्लादिमीर पुतिन की चीन यात्रा ने रूस-चीन संबंधों की बढ़ती निकटता को फिर से वैश्विक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने 40 से अधिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए तथा पश्चिमी देशों के प्रभुत्व के विरुद्ध “बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था (Multipolar World Order)” के समर्थन को दोहराया।
  • यह घटनाक्रम न केवल वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित कर रहा है, बल्कि भारत की विदेश नीति, सुरक्षा और सामरिक हितों पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

रूस-चीन संबंधों के प्रगाढ़ होने के प्रमुख कारण

  1. साझा भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता
    • रूस और चीन दोनों अमेरिका-नेतृत्व वाली वैश्विक व्यवस्था को अपने रणनीतिक हितों के लिए चुनौती मानते हैं। दोनों देश वैश्विक शक्ति संतुलन को पश्चिमी प्रभुत्व से हटाकर बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर ले जाने का समर्थन करते हैं।
  2. आर्थिक पूरकता और बढ़ती निर्भरता
    • पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों के बाद रूस की चीन पर आर्थिक निर्भरता बढ़ी है। चीन रूस के लिए एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार, निवेश स्रोत और ऊर्जा खरीदार के रूप में उभरा है।
  3. डी-डॉलराइजेशन की नीति
    • दोनों देश अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में कार्य कर रहे हैं।
    • व्यापार में युआन और रूबल के उपयोग में वृद्धि हुई है।
    • वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्थाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है।
    • गैर-पश्चिमी संस्थागत ढांचे को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है।
  4. बहुपक्षीय मंचों का उपयोग
    • BRICS तथा Shanghai Cooperation Organisation जैसे मंचों के माध्यम से रूस और चीन यूरेशियाई सुरक्षा एवं आर्थिक व्यवस्था को मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं।

भारत पर प्रभाव

  1. रणनीतिक संतुलनकर्ता के रूप में रूस की भूमिका कमजोर होना
    • भारत और चीन के बीच सीमा विवादों एवं रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में रूस लंबे समय से एक संतुलनकारी भूमिका निभाता रहा है। किंतु चीन पर रूस की बढ़ती निर्भरता उसकी तटस्थता को प्रभावित कर सकती है।
  2. रक्षा क्षेत्र में चुनौतियाँ
    • भारत अभी भी रूसी रक्षा प्रणालियों पर काफी हद तक निर्भर है, जैसे- S-400 Triumph वायु रक्षा प्रणाली,स्टेल्थ फ्रिगेट्स, लड़ाकू विमान एवं अन्य सैन्य प्लेटफॉर्म
    • रूस-यूक्रेन संघर्ष तथा रूस की चीन की ओर बढ़ती प्राथमिकताओं के कारण रक्षा आपूर्ति में देरी और तकनीकी बाधाओं की आशंका बढ़ी है।
    • इसके अतिरिक्त, चीन को रूस द्वारा उन्नत सैन्य प्रणालियाँ उपलब्ध कराए जाने से भारत की सुरक्षा चिंताएँ बढ़ सकती हैं।
  3. रूस–चीन–पाकिस्तान समीकरण का उभरना
    • हाल के वर्षों में रूस और पाकिस्तान के संबंधों में सुधार देखा गया है, जिसमें रक्षा सहयोग में वृद्धि, ऊर्जा क्षेत्र में साझेदारी तथा रियायती दरों पर तेल आपूर्ति जैसे पहलू प्रमुख रूप से शामिल हैं।
    • यह बदलता समीकरण भारत के लिए नई सामरिक चुनौतियाँ उत्पन्न कर सकता है।
  4. बहुपक्षीय मंचों पर बढ़ती जटिलताएँ
    • Shanghai Cooperation Organisation जैसे मंचों में रूस और चीन के बढ़ते सहयोग से भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताओं को संतुलित करना अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
  5. भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर दबाव
    • भारत लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) की नीति अपनाता रहा है। लेकिन रूस-चीन निकटता, अमेरिका की बदलती नीतियाँ और वैश्विक ध्रुवीकरण भारत की बहु-संरेखण (Multi-alignment) रणनीति को जटिल बना सकते हैं।

भारत के लिए आगे की राह

  • भारत को बदलते वैश्विक परिदृश्य के बीच रक्षा आयात स्रोतों के विविधीकरण, स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने, इंडो-पैसिफिक साझेदारियों को मजबूत करने, बहुपक्षीय मंचों पर संतुलित एवं सक्रिय नीति अपनाने तथा रूस के साथ पारंपरिक संबंध बनाए रखते हुए चीन से जुड़ी रणनीतिक चिंताओं को स्पष्ट रूप से उठाने पर ध्यान देना होगा।

निष्कर्ष

  • रूस और चीन के बढ़ते संबंध वैश्विक शक्ति संतुलन में महत्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत देते हैं। यह स्थिति भारत के लिए अवसर और चुनौतियाँ दोनों प्रस्तुत करती है। ऐसे में भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता, बहु-संरेखण नीति और रक्षा आत्मनिर्भरता को और मजबूत करना होगा।

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