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लंबी दूरी की लैंड अटैक क्रूज मिसाइल (एलआरएलएसीएम)

संदर्भ 

  • हाल ही में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने ओडिशा तट पर स्थित डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से स्वदेशी लंबी दूरी की सतह पर हमला करने में सक्षम लंबी दूरी की लैंड अटैक क्रूज मिसाइल (एलआरएलएसीएम) का सफल उड़ान परीक्षण किया। 

एलआरएलएसीएम के बारे में 

  • क्रूज़ मिसाइल एक ऐसी निर्देशित मिसाइल है जो उड़ान के दौरान लगातार अपने इंजन से संचालित रहती है और पूर्व-निर्धारित मार्ग का अनुसरण करते हुए लक्ष्य तक पहुँचती है। 
  • इसकी क्षमताओं को देखते हुए इसे टॉमहॉक-श्रेणी की मिसाइलों के समकक्ष माना जाता है। 

उड़ान परीक्षण और उपलब्धियाँ : 

  • हाल ही में किए गए उड़ान परीक्षण में मिसाइल की प्रमुख प्रणालियों का सफल मूल्यांकन किया गया। 
  • इसमें प्रणोदन तंत्र, मार्गदर्शन व्यवस्था, नौवहन एवं नियंत्रण प्रणाली तथा वारहेड को लक्ष्य तक पहुँचाने की क्षमता की जाँच शामिल थी। 

मारक क्षमता: 

  • लगभग 450 किलोग्राम भार वाले वारहेड से लैस यह मिसाइल करीब 1,000 किलोमीटर दूर स्थित लक्ष्यों पर सटीक प्रहार करने की क्षमता रखती है। 
  • इसकी उच्च सटीकता इसे महत्वपूर्ण सैन्य और रणनीतिक ठिकानों, जैसे कमांड एवं नियंत्रण केंद्रों, रसद (लॉजिस्टिक्स) सुविधाओं, रडार नेटवर्क तथा नौसैनिक संसाधनों के विरुद्ध प्रभावी बनाती है। 
  • इसके अलावा, यह भू-आकृति का लाभ उठाते हुए कम ऊँचाई पर उड़ान भर सकती है, जिससे दुश्मन की निगरानी और वायु रक्षा प्रणालियों से बचते हुए लक्ष्य तक पहुँचने की इसकी क्षमता बढ़ जाती है। 

स्वदेशी रूप से निर्मित मिसाइल:

  • एलआरएलएसीएम एक पूर्णतः स्वदेशी रूप से विकसित लंबी दूरी की क्रूज़ मिसाइल प्रणाली है। 
  • इसके विभिन्न प्रमुख घटकों और उप-प्रणालियों का विकास डीआरडीओ की कई प्रयोगशालाओं ने भारतीय उद्योग जगत के सहयोग से किया है। 
  • इस परियोजना के समन्वय और नेतृत्व की जिम्मेदारी बेंगलुरु स्थित वैमानिकी विकास प्रतिष्ठान (एडीई) ने निभाई, जिसने कार्यक्रम की प्रमुख (नोडल) प्रयोगशाला के रूप में कार्य किया।  

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के बारे में 

  • भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के अंतर्गत रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की स्थापना भारत को अत्याधुनिक रक्षा प्रौद्योगिकियों से सशक्त बनाने और महत्वपूर्ण रक्षा प्रौद्योगिकियों एवं प्रणालियों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के उद्देश्य से की गई है।
  • डीआरडीओ का गठन 1958 में भारतीय सेना के तत्कालीन कार्यरत तकनीकी विकास प्रतिष्ठान (टीडीई) और रक्षा विज्ञान संगठन (डीएसओ) के साथ तकनीकी विकास एवं उत्पादन निदेशालय (डीटीडीपी) के विलय से हुआ था। 

उद्देश्य:

  • थल, वायु, समुद्र, अंतरिक्ष और साइबर के रक्षा एवं सुरक्षा क्षेत्रों में अत्याधुनिक सेंसर, हथियार प्रणालियाँ, प्लेटफॉर्म और संबद्ध उपकरण डिजाइन एवं विकसित करना।
  • विभाग के अनुसंधान एवं विकास तंत्र के माध्यम से विकसित प्रणालियों और प्रौद्योगिकियों के उत्पादन और कार्यान्वयन को सुगम बनाना।
  • युद्ध क्षमता बढ़ाने के लिए सेनाओं को तकनीकी समाधान प्रदान करना।
  • सहयोग के माध्यम से भारतीय उद्योग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी (एस एंड टी) संस्थानों और अकादमिक जगत में रक्षा अनुसंधान एवं विकास क्षमता को पोषित और मजबूत करना।
  • बुनियादी ढाँचे और परीक्षण एवं मूल्यांकन सुविधाओं का विकास; डिजाइन प्रमाणीकरण; कौशल विकास और मानव संसाधनों को मजबूत करना।
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