संदर्भ
हाल ही में, भारत स्थित रक्षा स्टार्ट-अप डी-प्रोपल्स (D-Propulse) ने घोषणा की है कि उसने हैदराबाद स्थित रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की एक सुविधा में रोटेटिंग डेटोनेशन इंजन (Rotating Detonation Engine - RDE) का सफल प्रदर्शन किया है।
रोटेटिंग डेटोनेशन इंजन के बारे में
- यह एक प्रकार की प्रणोदन (Propulsion) प्रणाली है। यह प्रणाली ईंधन के उपयोग और दहन की प्रक्रिया के मामले में पारंपरिक गैस टर्बाइन और रैमजेट इंजनों से भिन्न प्रकार की है।
- सामान्य तौर पर इंजन में डिफ्लैग्रेशन (Deflagration) का उपयोग होता है। यह ईंधन के दहन की एक उपध्वनिक (Subsonic) और स्थिर प्रक्रिया है, जिसमें लौ के माध्यम से ईंधन जलता है।
- इसके विपरीत, आरडीई में डेटोनेशन (Detonation) का उपयोग किया जाता है। इसमें इंजन के दहन कक्ष के अंदर तीव्र अतिध्वनिक (Supersonic) विस्फोट जैसी दहन तरंगें घूमती रहती हैं और ईंधन को बहुत तेजी से जलाती हैं। यह तीव्र डेटोनेशन समान मात्रा के ईंधन से अधिक थ्रस्ट (Thrust/प्रणोद) उत्पन्न करता है।
डी-प्रोपल्स (D-Propulse) के बारे में:
- डी-प्रोपल्स एक डीप-टेक कंपनी है जो अगली पीढ़ी के प्रणोदन प्रणालियों के निर्माण के लिए मौलिक इंजीनियरिंग सिद्धांतों पर केंद्रित है, जहां प्रदर्शन ही मिशन की सफलता निर्धारित करता है।
- यह कंपनी प्रमुख अनुसंधान संस्थानों और उद्योग जगत के दशकों के अनुभव का लाभ उठाकर ऐसी प्रौद्योगिकियाँ विकसित करती है जो निर्णायक रणनीतिक लाभ प्रदान करती हैं। साथ ही कंपनी मूलभूत भौतिकी पर ध्यान केंद्रित करते हुए ऐसी प्रणालियाँ तैयार करते हैं जो तीव्र गति की उड़ान और अंतरिक्ष तक पहुँच की सीमाओं को पुनर्परिभाषित करती हैं।
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- इंजन के आकार और आयतन में होने वाली इस बचत का उपयोग अधिक ईंधन और पेलोड रखने के लिए किया जा सकता है। इससे पारंपरिक रॉकेट, रैमजेट और गैस टर्बाइन की तुलना में कम लागत में संभावित रूप से अधिक रेंज, अधिक गति जैसे लाभ मिल सकते हैं।
- ये आरडीई यांत्रिक रूप से सरल होते हैं और इनमें कोई गतिशील पुर्जे (Moving Parts) नहीं होते। इसलिए ये गैस टर्बाइन इंजनों की तुलना में कम जटिल होते हैं और इनके निर्माण की लागत कम होने तथा इन्हें सरलता से निर्मित करने की संभावना रहती है।
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के बारे में
- रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय का अनुसंधान एवं विकास विभाग है।
- इसका लक्ष्य भारत को अत्याधुनिक रक्षा प्रौद्योगिकियों से सशक्त बनाना तथा महत्वपूर्ण रक्षा प्रौद्योगिकियों और प्रणालियों में आत्मनिर्भरता हासिल कर हमारे सशस्त्र बलों को तीनों सेनाओं की निर्धारित आवश्यकताओं के अनुसार अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों और उपकरणों से सुसज्जित करना है।
लक्ष्य:
- थल, वायु, समुद्र, अंतरिक्ष और साइबर सुरक्षा क्षेत्रों में विश्व स्तर के अत्याधुनिक सेंसर, हथियार प्रणालियाँ, प्लेटफॉर्म और संबद्ध उपकरण डिजाइन और विकसित करना।
- विभाग के अनुसंधान एवं विकास पद्धति द्वारा विकसित प्रणालियों और प्रौद्योगिकियों के उत्पादन और प्रवर्तन को सुगम बनाना।
- युद्ध क्षमता/प्रभावशीलता को तीव्र करने के लिए सेनाओं को तकनीकी समाधान प्रदान करना।
- भारतीय उद्योग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी (एस एंड टी) संस्थानों और अकादमी जगत के सहयोग के माध्यम से रक्षा अनुसंधान एवं विकास क्षमताओं को पोषित और मजबूत करना।