संदर्भ
भारत में खनिज संसाधन आर्थिक विकास, औद्योगिकीकरण और आधारभूत संरचना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। साथ ही, खनिज-समृद्ध राज्यों के लिए इनसे प्राप्त राजस्व विकास एवं कल्याणकारी योजनाओं के वित्तपोषण का प्रमुख स्रोत है। ऐसे में खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 द्वारा राज्यों की खनिज अधिकारों एवं खनिज-युक्त भूमि पर कुछ लेवी लगाने की शक्ति को सीमित करना राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism) और केंद्र-राज्य संबंधों के संदर्भ में महत्वपूर्ण बहस को जन्म देता है।
विधेयक के प्रमुख प्रावधान
- राज्यों को खनिज अधिकारों एवं खनिज-युक्त भूमि पर कुछ निर्दिष्ट लेवी लगाने से प्रतिबंधित किया गया है।
- विधेयक लागू होने से पूर्व ऐसी लेवी से संबंधित बकाया अथवा अप्राप्त राशि को समाप्त करने का प्रावधान है।
- खनिज क्षेत्र में मौजूद लगभग 14 प्रकार की लेवी को जारी रखते हुए उनके कुल वित्तीय बोझ को एक निर्धारित सीमा के भीतर रखने का प्रस्ताव है।
- इस सीमा का निर्धारण राज्यों के साथ परामर्श के बाद किया जाना है।
- इसका उद्देश्य खनिज क्षेत्र में कर एवं लागत संबंधी निश्चितता सुनिश्चित करना तथा खनिजों की कीमतों में अनिश्चित वृद्धि को रोकना है।
सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले की पृष्ठभूमि
- जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के खनिज अधिकारों एवं खनिज-युक्त भूमि पर कर लगाने के अधिकार को मान्यता दी तथा 1989 के इंडिया सीमेंट लिमिटेड बनाम स्टेट ऑफ तमिलनाडु फैसले की व्याख्या को पलट दिया।
- 1989 के फैसले में रॉयल्टी को कर मानते हुए इसे संघ सूची के अंतर्गत माना गया था। इसके विपरीत, 2024 के निर्णय ने राज्यों के राजस्व अधिकार को व्यापक आधार प्रदान किया।
- इस निर्णय के बाद झारखंड, तमिलनाडु और अन्य खनिज-समृद्ध राज्यों ने अतिरिक्त राजस्व जुटाने के लिए Mineral-Bearing Land Tax/Cess जैसे उपाय किए। परिणामस्वरूप केंद्र और राज्यों के बीच खनिज संसाधनों से प्राप्त राजस्व के बंटवारे तथा कराधान की शक्तियों को लेकर विवाद पुनः उभरा।
केंद्र सरकार के पक्ष में तर्क
1. खनिजों की लागत में वृद्धि रोकना
- अलग-अलग राज्यों द्वारा अतिरिक्त लेवी लगाए जाने से खनिजों की लागत बढ़ सकती है, जिसका प्रभाव महंगाई, विनिर्माण लागत और आधारभूत संरचना परियोजनाओं पर पड़ सकता है।
2. उद्योग को कर संबंधी निश्चितता
- खनन कंपनियां रॉयल्टी के अतिरिक्त ज़िला खनिज फ़ाउंडेशन (डीएमएफ), नेशनल मिनरल एक्सप्लोरेशन ट्रस्ट (एनएमईटी) तथा पर्यावरण एवं प्रदूषण संबंधी शुल्कों का भुगतान करती हैं। अतिरिक्त और अलग-अलग राज्य स्तरीय लेवी से उद्योग के लिए लागत का पूर्वानुमान कठिन हो सकता है।
3. राष्ट्रीय स्तर पर एकरूपता
- खनिज एक राष्ट्रीय आर्थिक संसाधन हैं। इसलिए उनके कराधान और लागत संरचना में अत्यधिक क्षेत्रीय विविधता खनन एवं विनिर्माण क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता को प्रभावित कर सकती है।
4. लंबे समय से लंबित कानूनी विवादों का समाधान
- कई लेवी लंबे समय से न्यायिक विवादों में रही हैं। लंबित देनदारियों को समाप्त करने से उद्योग को वित्तीय एवं कानूनी स्पष्टता मिल सकती है।
राज्यों की प्रमुख चिंताएं
- राजस्व स्वायत्तता पर प्रभाव: खनिज-समृद्ध राज्यों के लिए खनन राजस्व का महत्व राष्ट्रीय औसत की तुलना में काफी अधिक है। उदाहरणतः ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में खनिज राजस्व राज्य की वित्तीय क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- सहकारी संघवाद पर प्रश्न: यदि केंद्र राज्यों के खनिज राजस्व से जुड़े निर्णयों में अत्यधिक हस्तक्षेप करता है, तो इससे सहकारी संघवाद की भावना प्रभावित हो सकती है।
- प्राकृतिक संसाधनों पर राज्यों का दावा: खनिज संसाधनों का दोहन मुख्यतः राज्यों के भू-क्षेत्र में होता है। इसलिए राज्य यह तर्क दे सकते हैं कि खनन से होने वाले पर्यावरणीय, सामाजिक एवं अवसंरचनात्मक प्रभावों की भरपाई के लिए उन्हें पर्याप्त राजस्व प्राप्त होना चाहिए।
- विकासात्मक आवश्यकताएं: खनिज-समृद्ध क्षेत्रों में अक्सर विस्थापन, पर्यावरणीय क्षति, प्रदूषण और आधारभूत संरचना पर दबाव जैसी समस्याएं होती हैं। इसलिए खनिज राजस्व इन क्षेत्रों के समावेशी एवं सतत विकास के लिए महत्वपूर्ण है।
व्यापक संवैधानिक एवं संघीय परिप्रेक्ष्य
- यह विवाद केवल खनिज कराधान का प्रश्न नहीं है, बल्कि भारतीय संघवाद की प्रकृति से भी जुड़ा हुआ है।
- भारत के संविधान में शक्तियों का विभाजन संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची के माध्यम से किया गया है। खनिज संसाधनों का विनियमन, कराधान और उनसे प्राप्त राजस्व इस शक्तियों के संवैधानिक वितरण से संबंधित है। इसलिए ऐसी व्यवस्था आवश्यक है जिसमें राष्ट्रीय आर्थिक हित के साथ राज्यों की राजकोषीय स्वायत्तता और स्थानीय समुदायों के हित तथा पर्यावरणीय स्थिरता के बीच संतुलन स्थापित हो।
खनिज राजस्व और संघवाद के बीच संतुलन
- राज्यों के साथ वास्तविक परामर्श: केंद्र को एकतरफा निर्णय लेने के बजाय खनिज-उत्पादक राज्यों के साथ संस्थागत एवं नियमित परामर्श करना चाहिए।
- स्पष्ट एवं पारदर्शी लेवी सीमा: लेवी पर सीमा तय करते समय राज्यों की राजस्व आवश्यकताओं, खनिज के प्रकार, बाजार मूल्य तथा पर्यावरणीय लागत जैसे कारकों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
- राजस्व-साझाकरण तंत्र को मजबूत करना: खनिज-समृद्ध राज्यों तथा खनन प्रभावित जिलों को खनिज संसाधनों से प्राप्त राजस्व में उचित हिस्सेदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
- स्थानीय समुदायों का हित: डीएमएफ जैसे संस्थानों को अधिक प्रभावी बनाकर खनन प्रभावित समुदायों के स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका और आधारभूत संरचना में निवेश बढ़ाया जाना चाहिए।
- सतत खनन: खनिज राजस्व को केवल राजकोषीय आय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। खनन से होने वाली पर्यावरणीय क्षति की लागत को भी नीति निर्माण में शामिल किया जाना चाहिए।
- सहकारी संघवाद की संस्थाओं का उपयोग: जीएसटी परिषद जैसी संस्थागत व्यवस्थाओं से सीख लेते हुए केंद्र और राज्यों के बीच खनिज कराधान पर स्थायी संवाद एवं समन्वय की व्यवस्था विकसित की जा सकती है।
आगे की राह
- खनिज संसाधनों का प्रभावी उपयोग भारत की ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक विकास और अवसंरचना निर्माण के लिए आवश्यक है। किंतु इसके लिए ऐसी नीति की आवश्यकता है जो ईज ऑफ डूइंग बिजिनेस के साथ-साथ ईज ऑफ लिविंग और राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता को भी महत्व दे।
- केंद्र को उद्योग के लिए लागत की पूर्वानुमेयता सुनिश्चित करनी चाहिए, लेकिन इसके लिए राज्यों की राजस्व आवश्यकताओं की अनदेखी नहीं की जा सकती। विशेषकर खनिज-समृद्ध लेकिन विकास की दृष्टि से पिछड़े क्षेत्रों में खनिज राजस्व को समावेशी विकास और क्षेत्रीय असमानता कम करने के साधन के रूप में देखा जाना चाहिए।
निष्कर्ष
- खनिज एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 भारत में आर्थिक दक्षता और राजकोषीय संघवाद के बीच संतुलन की परीक्षा है। खनन उद्योग को स्थिर और पूर्वानुमेय कर व्यवस्था की आवश्यकता है, जबकि राज्यों को अपने प्राकृतिक संसाधनों से उचित राजस्व प्राप्त करने का अधिकार एवं आवश्यकता दोनों हैं।
- अतः समाधान केंद्र या राज्यों में से किसी एक की पूर्ण प्रधानता में नहीं, बल्कि सहकारी संघवाद, पारदर्शी राजस्व-साझाकरण, राज्यों के साथ सार्थक परामर्श और सतत खनन में निहित है। ऐसी संतुलित व्यवस्था ही भारत के खनिज संसाधनों को आर्थिक विकास के साथ-साथ न्यायसंगत और समावेशी विकास का आधार बना सकती है।