संदर्भ
वैश्विक आर्थिक एवं भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय बॉन्ड बाजार ने उल्लेखनीय लचीलापन और स्थिरता प्रदर्शित की है। 14 अगस्त 2026 तक छह महीनों में भारत की 10-वर्षीय बेंचमार्क बॉन्ड यील्ड में केवल 8 बेसिस पॉइंट की वृद्धि हुई, जबकि अमेरिका में 60, जापान में 66, यूनाइटेड किंगडम में 56, दक्षिण कोरिया में 72, इंडोनेशिया में 78 तथा फिलीपींस में 61 बेसिस पॉइंट की वृद्धि हुई। यह अंतर बताता है कि वैश्विक ब्याज दरों में वृद्धि के बावजूद भारतीय बॉन्ड बाजार पर दबाव अपेक्षाकृत सीमित रहा।
बॉन्ड यील्ड का महत्व
- सरकारी बॉन्ड सरकार द्वारा निश्चित अवधि के लिए लिया गया ऋण है, जबकि बॉन्ड यील्ड निवेशक को प्राप्त प्रभावी वार्षिक प्रतिफल को दर्शाती है। बॉन्ड की कीमत और यील्ड में विपरीत संबंध होता है - मांग घटने पर कीमत गिरती है और यील्ड बढ़ती है। सरकारी बॉन्ड यील्ड वित्तीय प्रणाली में एक महत्वपूर्ण बेंचमार्क ब्याज दर है, जो सरकार, कंपनियों, बैंकों और परिवारों की उधारी लागत को प्रभावित करती है।
- सामान्यतः बढ़ती यील्ड उच्च मुद्रास्फीति, कड़ी मौद्रिक नीति अथवा राजकोषीय जोखिम की आशंका को दर्शाती है, जबकि स्थिर यील्ड निवेशकों के विश्वास का संकेत देती है।
भारतीय बॉन्ड बाजार की स्थिरता के प्रमुख कारण
अनुकूल मुद्रास्फीति-वृद्धि संतुलन:
- भारत में मुद्रास्फीति अपेक्षाकृत नियंत्रित रही और आर्थिक वृद्धि में मजबूती बनी रही। विशेष रूप से कोर मुद्रास्फीति के नरम रहने से आरबीआई को तत्काल मौद्रिक सख्ती की आवश्यकता नहीं पड़ी। आपूर्ति-पक्षीय उपायों तथा मुद्रास्फीति के दूसरे दौर के प्रभावों के बेहतर प्रबंधन ने ऊर्जा कीमतों के झटके को व्यापक मुद्रास्फीति में बदलने से सीमित किया।
आरबीआई का तटस्थ मौद्रिक नीति रुख:
- मौद्रिक नीति समिति ने लगातार तीन बैठकों में तटस्थ रुख बनाए रखा। जहाँ कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं ने मुद्रास्फीति अथवा अपनी मुद्राओं पर दबाव को देखते हुए ब्याज दरें बढ़ाईं, वहीं भारत ने नीति दरों को स्थिर रखते हुए परिस्थितियों का आकलन करने का विकल्प चुना। इससे बॉन्ड बाजार को स्थिरता मिली।
लक्षित विदेशी मुद्रा उपाय:
- आरबीआई ने व्यापक ब्याज दर वृद्धि के बजाय विदेशी मुद्रा बाजार में लक्षित उपायों को प्राथमिकता दी। विदेशी मुद्रा अनिवासी बैंक (FCNR(B)) के तहत एनआरआई जमा, बाह्य वाणिज्यिक उधार तथा विदेशों से विदेशी मुद्रा में उधारी जैसे माध्यमों से डॉलर प्रवाह को बढ़ावा दिया गया। 8 जून से 13 अगस्त के बीच इन उपायों से लगभग 56.8 अरब डॉलर का प्रवाह आया, जिसमें FCNR(B) के माध्यम से लगभग 52.3 अरब डॉलर शामिल थे।
बैंकिंग प्रणाली में पर्याप्त तरलता:
- विदेशी मुद्रा प्रवाह से बैंकिंग प्रणाली में पर्याप्त तरलता आई। 1–13 अगस्त के दौरान औसत अधिशेष तरलता लगभग ₹3.2 लाख करोड़ रही, जबकि जुलाई की समान अवधि में यह ₹1.3 लाख करोड़ थी। इससे बैंकों का फंडिंग आधार मजबूत हुआ और सर्टिफिकेट ऑफ़ डिपॉज़िट (CD) जैसे महंगे बाजार-आधारित उधारी साधनों पर निर्भरता कम हुई।
विदेशी ऋण निवेश को प्रोत्साहन:
- सरकार द्वारा विदेशी ऋण निवेशकों के लिए कर प्रोत्साहन तथा आरबीआई द्वारा निवेश प्रतिबंधों को सरल बनाने और निवेश योग्य प्रतिभूतियों का दायरा बढ़ाने के प्रयासों से जून में भारतीय ऋण बाजार में 5.6 अरब डॉलर का विदेशी पूंजी प्रवाह हुआ, जो जनवरी 2020 के बाद किसी एक महीने का सर्वाधिक प्रवाह था। हालांकि, भारतीय सरकारी बॉन्ड को ब्लूमबर्ग ग्लोबल एग्रीगेट इंडेक्स में शामिल करने का निर्णय टलने से सकारात्मक धारणा को कुछ झटका लगा।
भारतीय बॉन्ड बाजार के समक्ष जोखिम
- भारत की वर्तमान स्थिरता के बावजूद कई बाहरी एवं घरेलू जोखिम मौजूद हैं। पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव ऊर्जा कीमतों को बढ़ा सकता है। अल नीनो और मानसून संबंधी जोखिम खाद्य मुद्रास्फीति को प्रभावित कर सकते हैं। वहीं, अमेरिकी फेडरल रिज़र्व की मौद्रिक नीति वैश्विक पूंजी प्रवाह, डॉलर और उभरते बाजारों की वित्तीय स्थितियों को प्रभावित कर सकती है।
- घरेलू स्तर पर खाद्य एवं ईंधन कीमतों में वृद्धि, बढ़ता राजकोषीय व्यय, सरकारी उधारी तथा मुद्रास्फीति के पुनः बढ़ने की स्थिति में मौद्रिक नीति को सख्त करने की आवश्यकता प्रमुख जोखिम हैं।
ब्याज दरों का भावी परिदृश्य
- आगे ब्याज दरों की दिशा डेटा-आधारित और क्रमिक रहने की संभावना है। पश्चिम एशिया के घटनाक्रम, मानसून एवं अल नीनो तथा अमेरिकी फेड की नीति इसके प्रमुख निर्धारक होंगे। वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी छमाही में एक से दो प्रतिशत ब्याज दर वृद्धि की संभावना का आकलन किया जा रहा है। हालांकि, वास्तविक निर्णय मुद्रास्फीति, आर्थिक वृद्धि, पूंजी प्रवाह और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्व
भारतीय बॉन्ड बाजार की स्थिरता के कई व्यापक प्रभाव हैं।
- प्रथम, यह भारत की समष्टिगत आर्थिक स्थिरता और निवेशकों के विश्वास को दर्शाती है।
- द्वितीय, स्थिर यील्ड सरकार की उधारी लागत को अधिक अनुमानित बनाती है, जो सब्सिडी एवं ऊर्जा कीमतों से जुड़े राजकोषीय दबाव के बीच महत्वपूर्ण है।
- तृतीय, सरकारी बॉन्ड यील्ड में स्थिरता कंपनियों की उधारी लागत में अनिश्चितता घटाकर निजी निवेश को समर्थन दे सकती है।
- चतुर्थ, पर्याप्त तरलता से बैंकिंग क्षेत्र का फंडिंग आधार मजबूत होता है और ऋण विस्तार की क्षमता बढ़ती है। अंततः, नियंत्रित मुद्रास्फीति और स्थिर वृद्धि आरबीआई को तत्काल दर वृद्धि के बजाय ‘प्रतीक्षा और निगरानी’ की नीति अपनाने की गुंजाइश देती है।
आगे की राह
- स्थिरता बनाए रखने के लिए भारत को मुद्रास्फीति नियंत्रण, राजकोषीय अनुशासन और विश्वसनीय ऋण प्रबंधन पर निरंतर ध्यान देना होगा। साथ ही, घरेलू बॉन्ड बाजार को गहरा करना, सरकारी प्रतिभूति बाजार में निवेशकों का आधार व्यापक करना, कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार को विकसित करना, पर्याप्त प्रणालीगत तरलता बनाए रखना तथा वैश्विक पूंजी प्रवाह के उतार-चढ़ाव से निपटने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा बफर रखना आवश्यक होगा।
निष्कर्ष
- वैश्विक अस्थिरता के बीच भारतीय बॉन्ड बाजार की स्थिरता भारत की मजबूत समष्टिगत आर्थिक बुनियाद और प्रभावी लक्षित नीति-निर्माण का सकारात्मक संकेत है। नियंत्रित मुद्रास्फीति, मजबूत आर्थिक वृद्धि, अपेक्षाकृत स्थिर राजकोषीय स्थिति तथा आरबीआई के लक्षित विदेशी मुद्रा उपायों ने बाहरी दबावों को सीमित किया है।
- हालाँकि, पश्चिम एशिया, वैश्विक ब्याज दरें, मानसून और पूंजी प्रवाह जैसे जोखिम बने हुए हैं। अतः भारत को मुद्रास्फीति नियंत्रण, राजकोषीय अनुशासन, गहरे घरेलू बॉन्ड बाजार और विवेकपूर्ण मौद्रिक नीति के बीच संतुलन बनाए रखना होगा। इस प्रकार, वर्तमान बॉन्ड बाजार स्थिरता केवल वित्तीय क्षेत्र की उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की समष्टिगत स्थिरता, नीतिगत विश्वसनीयता और आर्थिक लचीलेपन का प्रमाण है।