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कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश त्यागपत्र देकर राजनीति जुड़ेंगे

प्रारंभिक परीक्षा- समसामयिकी, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति, कॉलेजियम प्रणाली का विकास, उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की पदमुक्ति
मुख्य परीक्षा- सामान्य अध्ययन, पेपर-2

संदर्भ:

हाल ही में कलकत्ता उच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय ने घोषणा की कि वह 5 फरवरी, 2024 को न्यायाधीश के पद से त्यागपत्र देकर राजनीति में शामिल होंगे।

Abhijit-Gangopadhyay

मुख्य बिंदु-

  • जनवरी, 2024 में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद न्यायमूर्ति गंगाओपाध्याय के रोस्टर को 4 फरवरी, 2024 को बदल दिया गया।
  • कुछ महत्वपूर्ण केस को भी उनके न्यायालय से वापस ले लिया गया। 
  • वह श्रम और औद्योगिक विवादों की सुनवाई कर रहे थे।

पहला मामला नहीं:  

  • किसी न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश का राजनीति में शामिल होने के लिए त्यागपत्र देना कोई नई बात नहीं है।
  • उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति कोका सुब्बा राव ने 1967 में अपनी सेवानिवृत्ति से तीन महीने पहले त्यागपत्र दे दिया था।
    • उन्होंने अपना त्यागपत्र जाकिर हुसैन के खिलाफ विपक्षी उम्मीदवार के रूप में राष्ट्रपति चुनाव लड़ने के लिए दिया था।
  • अपनी सेवानिवृत्ति से छह सप्ताह पहले उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति बहारुल इस्लाम ने लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए 1983 में इस्तीफा दे दिया था।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर बहस:

  • पद पर रहते हुए न्यायिक अनुशासन और राजनीति में प्रवेश के बीच की रेखा को पार करने वाले न्यायाधीशों से निपटने के लिए कोई तंत्र नहीं है।
  • एक सप्ताह पहले तक मामलों की सुनवाई करना, सरकार के पक्ष या विपक्ष में निर्णय लेना और फिर चुनाव की घोषणा होने पर इस्तीफा देकर राजनीति में शामिल होना न्यायिक स्वभाव में नहीं है। 
    • यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठाता है।
  • यंह घटना ऐसे समय में सामने आया है, जब प. बंगाल की राजनीति को लेकर राज्य के बार कौंसिल में बहुत अधिक विभाजन देखा जा रहा है। 
  • कलकत्ता उच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय द्वारा त्यागपत्र देकर राजनीति से जुड़ने की घटना ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर बहस छेड़ दिया है।
  • जब कोई न्यायाधीश ऐसा करता है, तो वह निस्संदेह एक बुरा संदेश देता है। 
    • न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय अदालत में शायद ही कभी तटस्थ रहे, जो कि एक अच्छे न्यायाधीश के लिए महत्वपूर्ण है।
  • अपने कार्यकाल के दौरान अपने न्यायिक आदेशों और मीडिया साक्षात्कारों में न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय ने सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और उसके नेताओं पर आक्षेप लगाया है।
  • न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय ने अपने वरिष्ठ न्यायधीशों पर आरोप लगाया था कि वे किसी राजनीतिक दल के लिए काम कर रहे हैं।

उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति:

  • अनु. 217 के अनुसार, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और राज्य के राज्यपाल के परामर्श से की जाएगी।
  • मुख्य न्यायाधीश के अलावा अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श की जाएगी
  • न्यायाधीशों की पदोन्नति के मुद्दे पर निर्णय एक कॉलेजियम लेती है।
  • इस कॉलेजियम में CJI और दो वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
  • मुख्य न्यायाधीशों की पदोन्नति के लिए मुख्य न्यायाधीश से नीचे के न्यायाधीशों की वरिष्ठता उनके अपने उच्च न्यायालयों में उनके रैंक के आधार पर होगी।
  • वे अन्य उच्च न्यायालयों में मुख्य न्यायाधीश के रूप में विचार के पात्र होंगे जब उनके अपने उच्च न्यायालयों में विचार की बारी होगी।
  • उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को उच्च न्यायालय में नियुक्ति के लिए किसी नाम की सिफारिश करने से पहले अपने दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों से परामर्श करना आवश्यक है।
  • यह सिफारिश मुख्यमंत्री को भेजी जाती है।
  • मुख्यमंत्री इस सिफारिश को राज्यपाल के पास भेजते हैं।

नियुक्ति के लिए पत्रता:

  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए किसी व्यक्ति को,
    • भारत का नागरिक होना चाहिए।
    • कम से कम दस वर्षों तक भारत के क्षेत्र में न्यायिक पद पर रहा हो; या
      • पहली अनुसूची में निर्दिष्ट किसी भी राज्य के उच्च न्यायालय या लगातार दो या अधिक ऐसे न्यायालयों में कम से कम दस वर्षों तक वकील रहा हो।

कॉलेजियम प्रणाली का विकास:

  • यह न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण की प्रणाली है, जो उच्चतम न्यायालय के निर्णयों के माध्यम से विकसित हुई है।
    • वर्ष 1981 के ‘प्रथम न्यायाधीश मामले’ (First Judges Case) में निर्णय दिया गया कि न्यायिक नियुक्तियों और स्थानांतरण पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के परामर्श का अर्थ सहमति नहीं है।
  • सरकारों द्वारा 12 वर्षों तक न्यायिक नियुक्तियों में न्यायपालिका पर कार्यपालिका को प्राथमिकता दी गई।
  • वर्ष 1993 के ‘द्वितीय न्यायाधीश मामले’ (Second Judges Case) में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से ‘कॉलेजियम प्रणाली’ की शुरुआत हुई।
    • इसमें यह निर्णय दिया गया कि कॉलेजियम के परामर्श का अर्थ सहमति है। 
    • यह CJI की व्यक्तिगत राय नहीं है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों के परामर्श से गठित एक संस्थागत राय है।
  • वर्ष 1998 में ‘तीसरे न्यायाधीश मामले’ (Third Judges Case) में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि; 
    • राष्ट्रपति को दिया गया परामर्श बहुसंख्यक न्यायाधीशों का परामर्श माना जाएगा।
    • इसमें मुख्य न्यायाधीश के साथ सुप्रीम कोर्ट के 4 वरिष्ठतम न्यायाधीशों के परामर्श शामिल होंगे।

उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की पदमुक्ति:

  • 62 वर्ष की आयु पूरी होने पर।
  • राष्ट्रपति को पत्र लिखकर त्यागपत्र द्वारा।
  • संसद की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा महाभियोग की प्रक्रिया द्वारा।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए प्रश्न-

प्रश्न- निम्नलिखित में से किस/किन न्यायाधीश/न्यायाधीशों ने राजनीतिक दलों में शामिल होने के लिए अपने पद से त्यागपत्र दिए हैं?

  1. न्यायमूर्ति कोका सुब्बा राव
  2. न्यायमूर्ति बहारुल इस्लाम
  3. न्यायमूर्ति रंजन गोगोई

नीचे दिए गए कूट की सहायता से सही उत्तर का चयन कीजिए

(a) केवल 1

(b) केवल 1 और 2

(c) केवल 2 और 3

(d) केवल 1 और 3

(e) 1, 2 और 3

उत्तर- (b)

मुख्य परीक्षा के लिए प्रश्न-

प्रश्न- हाल ही में न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय द्वारा अपने पद से त्यागपत्र देकर राजनीति में शामिल होने की घोषणा ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। विवेचना करें।

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