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सी.बी.आई. तथा ई.डी. के निदेशकों के कार्यकाल में वृद्धि की प्रक्रिया

(प्रारंभिक परीक्षा: सामायिक घटनाओं से सबंधित महत्ववपूर्ण प्रश्न)
(मुख्य परीक्षा: सांविधिक, विनियामक और विभिन्न अर्द्ध-न्यायिक निकाय तथा इनसे संबंधित विषय)

संदर्भ

हाल ही में, राष्ट्रपति द्वारा केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) जाँच एजेंसियों के निदेशकों के कार्यकाल को पाँच वर्ष तक बढ़ाने के लिये दो अध्यादेश प्रख्यापित किये गए हैं। विदित है कि वर्तमान में इन केंद्रीय एजेंसियों के प्रमुखों का कार्यकाल दो वर्ष है।

प्रमुख बिंदु

  • ‘केंद्रीय जाँच ब्यूरो’ कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के अंतर्गत केंद्र सरकार की प्रमुख जाँच एजेंसी है। इसकी स्थापना भ्रष्टाचार रोकथाम सुझाव के लिये गठित संथानम समिति (1962-1964) की सिफारिश के आधार पर वर्ष 1963 में गृह मंत्रालय द्वारा पारित एक प्रस्ताव के माध्यम से की गई थी। इसे दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 के प्रावधानों के तहत शक्तियाँ प्रदान की गई हैं।
  • सी.बी.आई. निदेशक की नियुक्ति का निर्णय एक समिति द्वारा लिया जाता है जिसमें प्रधानमंत्री,  लोकसभा में विपक्ष का नेता, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा लिया जाता है।
  • प्रवर्तन निदेशालय, वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग के अंतर्गत वित्तीय जाँच एजेंसी है। इसका गठन 1 मई, 1956 को विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1947 के तहत किया गया था। पूर्व में इसे आर्थिक मामलों के विभाग के अंतर्गत 'प्रवर्तन इकाई' के रूप में विनिमय नियंत्रण कानूनों के उल्लंघन से निपटने के लिये स्थापित किया गया था। वर्ष 1957 में इसका नाम बदलकर 'प्रवर्तन निदेशालय' कर दिया गया।
  • यह अपनी शक्तियों का उपयोग विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 तथा धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 जैसी विधियों के माध्यम से करता है।
  • ई.डी. निदेशक की नियुक्ति, समीक्षा और गठित समितियों की मंज़ूरी के बाद की जाती है। इस समिति में केंद्रीय सतर्कता आयुक्त, राजस्व विभाग, कार्मिक विभाग और गृह मंत्रालय के सचिव शामिल होते हैं।

अध्यादेश के माध्यम से संशोधन

  • सी.बी.आई. निदेशक के सेवा विस्तार हेतु अनुमति देते हुए, राष्ट्रपति ने दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम में आवश्यक संशोधन के लिये एक अध्यादेश जारी किया है। इसके अनुसार अधिनियम की धारा 4बी की उप-धारा (1) में, निम्नलिखित प्रावधान जोड़े गए हैं-:
    • अध्यादेश के अनुसार, निदेशकों की नियुक्ति दो वर्ष के लिये की जाएगी तथा बाद में इनके कार्यकाल को एक बार में एक वर्ष के लिये, कुल तीन बार बढ़ाया जा सकेगा।
    • परंतु किसी भी स्थिति में कार्यकाल 5 वर्ष से अधिक नहीं होगा। उल्लेखनीय है कि वर्तमान में इनके निदेशकों का कार्यकाल 2 वर्ष होता है।
  • ई.डी. निदेशक के मामले में भी केंद्रीय सतर्कता आयोग (संशोधन) अध्यादेश, 2021 को सी.वी.सी. अधिनियम की धारा 25 में इसी प्रकार के प्रावधानों को सम्मिलित करने के लिये लाया गया है। 

अन्य कार्यालय धारकों के साथ तुलना

  • सिविल सेवकों के लिये बनाए गए मूल नियम, 1922 के तहत, सेवानिवृत्ति की वर्तमान आयु 60 वर्ष है। हालाँकि, मूल नियम के खंड 56 में ऐसे सरकारी पदों की एक सूची दी गई है जो सेवा-विस्तार के लिये पात्र हैं।
  • अभी तक रक्षा सचिव, विदेश सचिव, गृह सचिव, अनुसंधान और विश्लेषण विंग (Research and Analysis Wing) के निदेशक और सचिव के अलावा, सी.बी.आई. निदेशक दो साल तक के विस्तार के लिये पात्र हैं। 
  • इसके अलावा, गृह सचिव और रक्षा सचिव का जनहित में तीन महीने का सेवा विस्तार हो सकता है। नवीनतम अध्यादेश के अनुसार ई.डी. निदेशक के पद को भी इस सूची में जोड़ा गया है।

चुनौतियाँ

  • लगभग एक वर्ष पूर्व सरकार द्वारा ई.डी. निदेशक को उनके निश्चित कार्यकाल (2 वर्ष)  के पश्चात् भूतलक्षी प्रभाव से एक वर्ष का सेवा विस्तार दिया गया था। इसके लिये ई.डी. प्रमुख के कार्यकाल संबंधी वर्ष 2018 के आदेश में संशोधन किया गया था। 
  • सरकार के उपरोक्त आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार के इस फैसले को बरक़रार रखा था, परंतु न्यायालय ने टिप्पणी की कि, “सरकार को ऐसे कठोर कदम उठाने से बचना चाहिये और सेवा-निवृत्ति के दौरान कार्यकाल का कोई भी विस्तार छोटी अवधि के लिये ही होना चाहिये”।
  • याचिकाकर्ताओं ने  ‘विनीत नारायण बनाम भारत संघ (1997) वाद’ में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का हवाला देते हुए दोनों अध्यादेशों को मनमाना एवं असंवैधानिक बताया हैं, क्योंकि उपरोक्त वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया था कि ई.डी. व सी.बी.आई. निदेशकों का न्यूनतम कार्यकाल 2 वर्ष होना चाहिये।
  • इस अध्यादेश में ‘सार्वजानिक हित’ के आधार पर कार्यकाल में वृद्धि का प्रावधान किया गया है परंतु इसकी स्पष्ट व्याख्या नहीं की गई है, यह सरकार की संतुष्टि पर आधारित है।
  • विपक्षी दलों का यह आरोप है कि सरकार द्वारा संसदीय व्यवस्था का उल्लंघन किया जा रहा है। उनके अनुसार इस अध्यादेश को 29 नवंबर से शुरू हो रहे शीतकालीन सत्र के दौरान प्रख्यापित किया जाना चाहिये।

निष्कर्ष 

सरकार द्वारा ई.डी. तथा सी.बी.आई. के प्रमुखों के कार्यकाल में विस्तार उचित मानदंडों के आधार पर किया जाना चाहिये। साथ ही, सार्वजनिक हित को स्पष्ट रूप से परिभाषित करते हुए इस संदर्भ में विपक्षी दलों के पक्ष को भी जानना चाहिये। जहाँ तक संभव हो अध्यादेश की प्रक्रिया को अंतिम विकल्प के रूप में अपनाया जाना चाहिये ताकि शासन में जवाबदेही एवं पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके।

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