(प्रारंभिक परीक्षा: लोकनीति, अधिकारों संबंधी मुद्दे) (मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 1: भारतीय समाज की मुख्य विशेषताएँ, जनसंख्या एवं संबद्ध मुद्दे, गरीबी व विकासात्मक विषय, शहरीकरण, उनकी समस्याएँ और उनके रक्षोपाय, सामाजिक सशक्तीकरण) |
संदर्भ
भारत में बाल तस्करी आज भी एक गंभीर व अत्यधिक चिंताजनक सामाजिक समस्या के रूप में मौजूद है। हाल ही में के. पी. किरण कुमार बनाम राज्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रकार के अपराधों पर रोक लगाने के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी किए और स्पष्ट किया है कि तस्करी बच्चों के संविधान प्रदत्त जीवन के मौलिक अधिकार का गंभीर उल्लंघन है।
बाल तस्करी से संबंधित आँकड़े
- राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022 में 18 वर्ष से कम आयु के लगभग 3,098 बच्चों को विभिन्न परिस्थितियों से मुक्त कराया गया।
- इसके अलावा अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच देशभर में बाल श्रम, तस्करी एवं अपहरण के मामलों से 53,000 से अधिक बच्चों को बचाया गया।
- इसके बावजूद वर्ष 2018 से 2022 की अवधि में इन अपराधों में दोषसिद्धि की दर केवल 4.8% रही हैं जो न्यायिक प्रक्रिया की गंभीर चुनौतियों को उजागर करती है।
क्या है बाल तस्करी
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पलेर्मो प्रोटोकॉल, 2000 (संयुक्त राष्ट्र मानव तस्करी रोकथाम, दमन एवं दंड प्रोटोकॉल) बाल तस्करी को ‘शोषण के उद्देश्य से किसी बच्चे की भर्ती, परिवहन, स्थानांतरण, शरण देना या प्राप्त करना’ के रूप में परिभाषित करता है।
भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 143 के तहत परिभाषा
- यदि कोई व्यक्ति शोषण के उद्देश्य से किसी को धमकी, बलपूर्वक, अपहरण, धोखाधड़ी, छल, सत्ता के दुरुपयोग या किसी प्रकार के प्रलोभन अथवा भुगतान के माध्यम से भर्ती, परिवहन, शरण, स्थानांतरण या प्राप्त करता है तो वह तस्करी का अपराध करता है।
- यह प्रावधान उन स्थितियों पर भी लागू होता है जहाँ किसी ऐसे व्यक्ति की सहमति हासिल की जाती है जो पीड़ित पर नियंत्रण रखता हो।
- यहाँ शोषण शब्द का अर्थ अत्यंत व्यापक है जिसमें शारीरिक और यौन शोषण के साथ-साथ गुलामी, दासता व जबरन अंग निकासी जैसे कृत्य भी शामिल किए गए हैं।
क्या हैं बच्चों के अधिकार
- भारतीय संविधान में बच्चों की सुरक्षा एवं कल्याण के लिए व्यापक प्रावधान किए गए हैं।
- अनुच्छेद 23 व 24: बच्चों को मानव तस्करी, भिक्षावृत्ति, जबरन श्रम तथा खतरनाक उद्योगों में काम कराने से संरक्षण प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त, राज्य पर यह संवैधानिक जिम्मेदारी भी डाली गई है कि बच्चों के साथ किसी प्रकार का शोषण या दुर्व्यवहार न हो और उन्हें स्वतंत्रता व गरिमा के वातावरण में स्वस्थ विकास के लिए आवश्यक अवसर एवं सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।
- अनुच्छेद 39 (e) एवं (f): बच्चों को शोषण के साथ-साथ नैतिक एवं भौतिक परित्याग से सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 98 व 99: इसके अंतर्गत नाबालिगों की ‘खरीद-बिक्री’ को विशेष रूप से अपराध घोषित किया गया है।
- अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 : यह यौन शोषण के उद्देश्य से होने वाली तस्करी को रोकने का प्रावधान करता है।
- बाल यौन अपराध संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012: यह अधिनियम यौन उत्पीड़न, यौन दुर्व्यवहार एवं बाल अश्लील सामग्री जैसे अपराधों को परिभाषित करने के साथ-साथ कठोर दंड का प्रावधान करता है जिनमें आजीवन कारावास व अत्यंत गंभीर मामलों में मृत्युदंड तक शामिल है। इस कानून की एक प्रमुख विशेषता इसका लैंगिक रूप से तटस्थ होना है।
- त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से देशभर में लगभग 400 विशेष फास्ट ट्रैक अदालतें POCSO अधिनियम के तहत कार्यरत हैं जिनका लक्ष्य प्रति अदालत प्रति वर्ष लगभग 165 मामलों का निपटारा करना है।
- आपराधिक विधि संशोधन अधिनियम, 2013: इस अधिनियम ने तस्करी की परिभाषा को अधिक व्यापक बनाते हुए इसमें यौन शोषण, गुलामी, दासता, जबरन श्रम व अंग निकासी जैसे कृत्यों को शामिल किया है तथा सहमति की परवाह किए बिना इन्हें अपराध की श्रेणी में रखा है।
- किशोर न्याय (देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015: बाल तस्करी के शिकार बच्चों की देखभाल, संरक्षण एवं पुनर्वास की व्यवस्था करता है।
न्यायिक दृष्टिकोण
- बाल तस्करी और बाल शोषण के मामलों में भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर सक्रिय व संवेदनशील रुख अपनाया है।
- विशाल जीत बनाम भारत संघ (1990) के निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि मानव तस्करी और बाल वेश्यावृत्ति गंभीर सामाजिक-आर्थिक समस्याएँ हैं, जिनसे निपटने के लिए केवल दंडात्मक नहीं बल्कि निवारक व मानवीय दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
- एम.सी. मेहता बनाम तमिलनाडु राज्य (1996) के मामले में न्यायालय ने खतरनाक उद्योगों में बच्चों के नियोजन पर प्रभावी रोक लगाने के उद्देश्य से विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए।
- बचपन बचाओ आंदोलन बनाम भारत संघ (2011) में सर्वोच्च न्यायालय ने बच्चों के व्यापक शोषण और तस्करी की समस्या को गंभीरता से लेते हुए इसे रोकने और पीड़ित बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए।
आगे की राह
- नवीन दिशा-निर्देश इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि तस्करी के शिकार बच्चों की सामाजिक-आर्थिक कमजोरियों, विशेषकर हाशिए पर स्थित समुदायों से आने वाले पीड़ितों की परिस्थितियों को गंभीरता से समझना आवश्यक है। आज भी समाज बच्चों एवं किशोरों को अपराध की ओर धकेले जाने या स्वयं अपराध का शिकार बनने से पूरी तरह सुरक्षित नहीं कर पा रहा है।
- गरीबी, बेरोजगारी, पलायन, प्राकृतिक आपदाएँ और पारिवारिक ढांचे का विघटन जैसे कारण बच्चों की संवेदनशीलता बढ़ा देते हैं जिससे मानव तस्करी का नेटवर्क व अधिक मजबूत होता है। हाल के वर्षों में सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार ने भी इस समस्या को नई दिशा दी है जहाँ नौकरी या ‘मॉडलिंग’ जैसे अवसरों का लालच देकर बच्चों की भर्ती की जा रही है।
- ऐसे में सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वह बच्चों के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकारों की प्रभावी सुरक्षा सुनिश्चित करे और इसके लिए गठित संस्थानों को सशक्त बनाए। साथ ही, तस्करी में संलिप्त अपराधियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करते हुए दोषसिद्धि की दर में उल्लेखनीय बढ़ोतरी सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि एक मजबूत निवारक प्रभाव पैदा हो सके।
- इसके अतिरिक्त, कानून-व्यवस्था एवं पुलिस का राज्य के अधिकार क्षेत्र में होने के कारण बाल तस्करी से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए केंद्र व राज्यों के बीच सुदृढ़ सहयोग और समन्वय भी अनिवार्य है।