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संवैधानिक नैतिकता और आधुनिक भारत की संकल्पना

(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ और बुनियादी संरचना)

संदर्भ 

हाल ही में, भारतवर्ष ने संविधान लागू होने की 72वीं वर्षगाँठ मनाई है। इसके माध्यम से भारतीय राष्ट्रवाद के सार तत्व की पुष्टि की जाती है, जो लगभग तीन वर्षों के वैचारिक मंथन के माध्यम से संविधान के रूप में परिणत हुआ। इसी क्रम में 'भारत के विचार' (Idea of India) का उदय हुआ, जो कि राष्ट्रीय आंदोलन और गणराज्य के संस्थागत होने का प्रतिफल है।

संविधान : एक जीवंत दस्तावेज़

आधुनिक भारत का विचार

  • एक आधुनिक राष्ट्र के तौर पर ‘भारत का विचार’ मानवाधिकारों और नागरिकता की एक निश्चित व्याख्या पर आधारित, विधि की उचित प्रक्रिया और विधि के समक्ष समानता के सिद्धांत द्वारा समर्थित संविधान प्रदत्त एक उपहार है।
  • विदित है कि पूर्व में भारत की संकल्पना पौराणिक कथाओं और धर्मशास्त्रों की प्रेरणा पर आधारित थी। किंतु आधुनिक भारत का विचार, टैगोर के रहस्यवादी प्रभाव और गांधीजी के आध्यात्मिक एवं नैतिक चिंतन के साथ-साथ आंबेडकर, नेहरू और पटेल की दूरदर्शिता तथा विवेकशीलता का एक मज़बूत पंथनिरपेक्ष एवं विधिक परिणाम है। प्रस्तावना इस दृष्टिकोण का सबसे स्पष्ट प्रतिबिंब है।
  • भारतीय गणराज्य के परिभाषित लक्षणों में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता की अवधारणा यह स्पष्ट करती है कि ‘कानून’ राष्ट्र के संचालन का मूलभूत आधार होगा।

सामाजिक उत्थान और आधुनिकीकरण

  • उदार संविधानवाद की भूमिका पिछली शताब्दी के दौरान भारत के नागरिक राष्ट्रवाद को दशा और दिशा दे कर सामाजिक उत्थान और आधुनिकीकरण को पोषित करने में परिलक्षित होती है। 
  • संविधान का मुख्य कार्य विधि को सुपरिभाषित करने हेतु साझा मूल्यों, मानदंडों और व्यवस्थाओं को निर्धारित करना है। जिनके आधार पर राज्य कार्य करे और राष्ट्र का विकास सुनिश्चित हो सके।
  • स्पष्ट है कि जिस प्रकार के संवैधानिक आदर्शों के माध्यम से नागरिक राष्ट्रवाद की भावना को स्वतंत्रता के प्रारंभिक 25 वर्षों में विकसित किया गया, उसका ही परिणाम है कि भारत विश्व का सबसे बड़ा कार्यात्मक लोकतंत्र है। 

नए नागरिक समाज का जन्म : संविधान की भूमिका 

  • प्रत्येक समाज का उसे अभिशासित करने वाली कानूनी प्रणाली के साथ परस्पर निर्भरतापूर्ण संबंध होता है, जो कठिन राजनीतिक समय में और जटिल हो जाता है तथा जिसके लिये नागरिक समाज को निरंतर लड़ना पड़ता है। इस अंतःक्रिया का परिणाम है कि समुदाय समाज का स्वरुप धारण कर लेता है एवं समाज सभ्यताओं का तथा सभ्यताएँ राष्ट्रीय और ऐतिहासिक महत्त्व का स्वरूप धारण कर लेती हैं।
  • डॉ आंबेडकर इस बात से आशावान थे कि संविधान एक नए प्रकार के नागरिक समाज को जन्म देगा। उन्हीं के शब्दों में, “मैं नहीं चाहता कि भारतीय होने के नाते हमारी निष्ठा किसी भी मामूली प्रकृति की प्रतिस्पर्धात्मक निष्ठा से प्रभावित हो,' वह निष्ठा चाहे हमारे धर्म, संस्कृति या भाषा से ही उत्पन्न क्यों न हो। मैं चाहता हूँ कि सभी व्यक्ति पहले भारतीय बनें, अंतिम रूप से भारतीय बने रहें और भारतीय के सिवाए और कुछ भी नहीं”। 
  • भारत के संदर्भ में यह किसी अन्य देश की तुलना में अधिक बड़ी चुनौती थी क्योंकि यहाँ भारतीयों को अलग पहचान देने वाले धर्म, संस्कृति और भाषा के तत्वों का ही उल्लेख मात्र नहीं है बल्कि एक ‘साझा नागरिकता’ का विचार भी प्रस्तुत किया गया है। 
  • आंबेडकर ने ‘एक व्यक्ति एक वोट’ के सिद्धांत को राजनीति में मान्यता देने और सामाजिक, आर्थिक जीवन में असमानताओं के कारण, ‘समान व्यक्ति, समान मूल्य’ के सिद्धांत को नकारने के विरोधाभास पर भी प्रश्न किया। 

उपेक्षितों को शामिल करना

जाति व्यवस्था पर चोट और व्यक्तिगत अधिकारों पर ज़ोर 

  • एक राष्ट्रवादी तथा जातिगत शोषण के प्रखर विरोधी के रूप में आंबेडकर का विचार था कि दलितों को ब्रिटिश शासन से भारतीय स्वाधीनता की प्राप्ति का समर्थन करना चाहिये, किंतु नव संविधान के ढाँचे में समान अधिकारों की प्राप्ति हेतु अपने संघर्षों को भी निरंतर जारी रखना चाहिये।
  • उनका यह समाधान फलदायी साबित हुआ और भारतीय नागरिक राष्ट्रवाद का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान संविधान में ‘व्यक्ति’ आधारित प्रतिनिधित्त्व की संकल्पना के रूप में परिणत हुआ। 
  • संवैधानिक लोकतंत्र की स्थापना का एक उद्देश्य भारतीयों को जाति व्यवस्था की बेड़ियों से मुक्त करना भी था तथा प्रत्येक नागरिक को व्यक्तिगत तौर पर जन्म आधारित अपरिवर्तनीय पहचान के दायरे से मुक्त करना था। इस प्रकार संविधान में उन सभी पहचानों को जो भारतीयों को परिभाषित रूप से विभाजित करती हैं, उन्हें सीमित करने का प्रयास किया गया।

विविधता में एकता 

  • संविधान ने भारतभूमि के समावेशी विचार को विधिक संरचना प्रदान की। यह प्रतिबिंबित करता है कि एक राष्ट्र जाति, पंथ, रंग, संस्कृति, भाषा, विश्वास, पोशाक और परंपराओं के भेदों को स्वीकार करते हुए एक लोकतांत्रिक आम सहमति निर्मित कर सकता है।
  • इस सहमति का मूल सिद्धांत यह है कि विधि के शासन द्वारा संचालित लोकतंत्र में, कोई भी व्यक्ति किसी मत पर असहमति रख सकता है। 
  • दरअसल जिस असहमति के आधार पर 1950 और 1960 के दशक में भारत के विघटन की भविष्यवाणी की गई थी, उसे भारत ने 75 वर्षों से तनावों के बावजूद भी ख़ारिज किया है, जिसका कारण यह है कि भारत ने आम सहमति के बिना, लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली पर आम सहमति बनाए रखी है।

विधि का शासन

  • ‘भारत प्राचीन सभ्यता से प्रेरित, साझा इतिहास द्वारा एकजुट, विधि द्वारा संचालित, एक बहुलतावादी लोकतंत्र है’ राष्ट्रीयता की इस सम्यक परिभाषा को एक सूत्र में पिरोने वाली डोर संविधान में वर्णित ‘विधि के शासन’ की संकल्पना है।
  • भारतीय स्वतंत्रता का संघर्ष विदेशी शासन से मुक्ति का संघर्ष मात्र नहीं था। बल्कि यह ‘साम्राज्यवादी निरंकुशता’ पर आधारित कानून और व्यवस्था के अभिशासन में बदलाव की लड़ाई भी थी। 'संवैधानिक नैतिकता' की अवधारणा का जन्म भी यहीं से हुआ।
  • संवैधानिक नैतिकता से अभिप्राय है कि संवैधानिक साधनों के माध्यम से वांछित लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु संविधान की ‘प्रक्रियाओं एवं संरचनाओं’ को बनाए रखना तथा पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता की भावना से इसके सम्मान की एक राष्ट्रीय प्रतिबद्धता को सुनिश्चित करना। इसके लिये वाक् स्वातंत्र्यता, सरकारी कार्यों की सार्वजनिक जाँच और सत्ता के प्रयोग पर विधिक सीमाएँ आरोपित की गईं, जिससे भारतीय स्वाधीनता का विचार साकार हो सके। 

संविधान की आत्मा

  • डॉ आंबेडकर के अनुसार संविधान को विकृत किये बिना, प्रशासन के स्वरूप को बदलकर संविधान की भावना को अक्षुण्ण रखना संभव है। उन्होंने तर्क दिया कि संवैधानिक नैतिकता कोई स्वाभाविक संकल्पना नहीं है, इसे आत्मसात करना पड़ता है। जिसे भारत ने अभी तक आत्मसात नहीं किया है।
  • हालाँकि भारत की तत्कालीन परिस्थितियों के लिये लोकतंत्र एक आरोपित व्यवस्था थी, परंतु लोकतंत्र में सत्ता संचालक का निर्वाचन जनता द्वारा किया जाता है, यह इस पद्धति का अनिवार्य नियम है। इस परिप्रेक्ष्य में नीति निदेशक तत्व को भारतीय संविधान की आत्मा कहा जा सकता है जो यह निर्धारित करता है कि सत्ता संचालक स्वेछाचारी शासन संचालन नहीं कर सकता।
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