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पश्चिमी विक्षोभ : उत्तर-पश्चिम भारत के मौसम पर प्रभाव

(प्रारंभिक परीक्षा: समसामयिक घटनाक्रम)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र-1: भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखीय हलचल, चक्रवात आदि जैसी महत्त्वपूर्ण भू-भौतिकीय घटनाएँ, भौगोलिक विशेषताएँ)

संदर्भ

भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, 4 और 5 नवंबर को एक नया पश्चिमी विक्षोभ उत्तर-पश्चिम भारत, विशेषकर दिल्ली-एनसीआर के मौसम को प्रभावित करेगा। इससे तापमान, हवा की दिशा और बादलों की स्थिति में परिवर्तन देखने को मिलेगा।

क्या है पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) ?

  • पश्चिमी विक्षोभ एक प्रकार की अ-मानसूनी तूफ़ानी प्रणाली (शीतोष्ण चक्रवाती प्रणाली) है, जो भूमध्य सागर  से उत्पन्न होती है। 
  • यह प्रणाली सर्दियों के महीनों में भारत, पाकिस्तान और हिमालयी क्षेत्रों में बारिश और बर्फबारी लेकर आती है।
  • यह मुख्य रूप से पश्चिमी जेट धाराओं के प्रभाव से पूर्व की ओर बढ़ती है।

पश्चिमी विक्षोभ कैसे बनता है

  • उत्पत्ति (Origin) : यह भूमध्य सागर क्षेत्र में तब बनता है जब यूरोप से आने वाली ठंडी ध्रुवीय हवा और उष्णकटिबंधीय गर्म व नम हवा आपस में टकराती हैं।
  • चक्रीय गठन (Cyclogenesis) : इन दोनों वायु प्रवाहों के बीच तापमान में अंतर के कारण ऊपरी वायुमंडल में निम्न दाब क्षेत्र बनता है, जिससे चक्रवातीय गति उत्पन्न होती है।
  • गति (Movement) : यह प्रणाली पश्चिमी जेट धारा के साथ पूर्व की ओर बढ़ती है और भूमध्य सागर, कैस्पियन सागर व काला सागर से नमी लेकर आती है।
  • वर्षा और क्षीणन (Dissipation) : जब यह भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग में हिमालय से टकराती है, तो अपनी नमी को बारिश या बर्फबारी के रूप में छोड़ देती है और धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाती है।

पश्चिमी विक्षोभ को प्रभावित करने वाले कारक

  • जेट स्ट्रीम की स्थिति : पश्चिमी विक्षोभ की आवृत्ति और तीव्रता जेट स्ट्रीम की ताकत और स्थान पर निर्भर करती है।
  • हिमालयी स्थलाकृति : हिमालय पर्वत नमी से भरी हवा को ऊपर उठाकर वर्षा करवाता है।
  • तापमान भिन्नता : ध्रुवीय और उष्णकटिबंधीय वायु के बीच तापमान का अधिक अंतर विक्षोभ को मजबूत बनाता है।
  • सागरीय परिस्थितियाँ : भूमध्य सागर और यूरेशिया क्षेत्र के समुद्री तापमान में बदलाव भी इनके मार्ग और तीव्रता को प्रभावित करते हैं।

भारत पर प्रभाव

  • कृषि पर प्रभाव : पश्चिमी विक्षोभ उत्तर भारत की रबी फसलों (गेहूं, सरसों) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सर्दियों की आवश्यक नमी प्रदान करता है।
  • वर्षा और हिमपात : यह उत्तर भारत, जम्मू-कश्मीर, हिमांचल और उत्तराखंड में बारिश व बर्फबारी लाता है, जिससे नदियाँ और भूजल स्रोत पुनर्भरित होते हैं।
  • मौसम में परिवर्तन : इन दिनों में आसमान बादलों से ढका रहता है, दिन ठंडे और रातें अपेक्षाकृत गर्म हो जाती हैं। विक्षोभ के गुजरने के बाद कोहरा और ठंडी लहरें भी बढ़ सकती हैं।
  • प्राकृतिक आपदाएँ : अत्यधिक विक्षोभ की स्थिति में बाढ़, हिमस्खलन, भूस्खलन और फसल क्षति जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। 
  • वायु गुणवत्ता में सुधार : पश्चिमी विक्षोभ के साथ आने वाली वर्षा और तेज़ हवाएँ प्रदूषकों को साफ करती हैं, जिससे दिल्ली-एनसीआर जैसे क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता में अस्थायी सुधार होता है।

मानसून से संबंध 

  • पूर्व-मानसून भूमिका : अप्रैल-मई के दौरान, पश्चिमी विक्षोभ पूर्व-मानसून वर्षा लाकर उत्तर भारत की गर्मी को नियंत्रित करता है।
  • मानसून से परस्पर क्रिया : कभी-कभी यह मानसून धारा (Monsoon Trough) से टकराकर अत्यधिक वर्षा का कारण बनता है, जैसे 2013 उत्तराखंड आपदा में हुआ।
  • मानसून संक्रमण : वसंत के अंत में जब पश्चिमी विक्षोभ कमजोर पड़ता है, तो यह दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगमन का मार्ग प्रशस्त करता है।

वर्तमान स्थिति

  • IMD के अनुसार, 4–5 नवंबर 2025 को आने वाला पश्चिमी विक्षोभ उत्तर-पश्चिम भारत के मौसम में बदलाव लाएगा।
  • दिल्ली-एनसीआर : असमान आंशिक रूप से बादलों से घिरा रहेगा, हल्का धुंध या स्मॉग बने रहने की संभावना है।
  • तापमान: अधिकतम तापमान 31°C से 33°C और न्यूनतम तापमान 17°C से 19°C के बीच रहेगा।
  • हवा की दिशा: शुरुआत में दक्षिण-पूर्वी, फिर पश्चिमोत्तर दिशा में बदल जाएगी।

निष्कर्ष

पश्चिमी विक्षोभ भारत की जलवायु प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह न केवल रबी फसलों के लिए जीवनदायी वर्षा लाता है, बल्कि पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र को भी संतुलित रखता है। हालाँकि, इसके बढ़ते प्रभाव और अस्थिरता जलवायु परिवर्तन से जुड़ी नई चुनौतियों की ओर संकेत करते हैं। इसलिए, वैज्ञानिक पूर्वानुमान और जलवायु अनुकूल कृषि नीतियाँ भविष्य में पश्चिमी विक्षोभ से होने वाले प्रभावों को समझने और प्रबंधित करने की दिशा में अत्यंत आवश्यक हैं।

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