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नवीन जीडीपी श्रृंखला

हाल ही में सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने राष्ट्रीय आय के आँकड़ों में व्यापक संशोधन करते हुए GDP का आधार वर्ष 2011-12 से परिवर्तित कर 2022-23 निर्धारित किया है। इसके साथ ही गणना पद्धति में कई संरचनात्मक सुधार किए गए हैं, ताकि आँकड़ों की विश्वसनीयता और समकालीनता बढ़ाई जा सके।  

नई जीडीपी श्रृंखला (आधार वर्ष वित्तीय वर्ष 2023) के बारे में 

आधार वर्ष का अर्थ 

  • आधार वर्ष वह संदर्भ अवधि होती है, जिसकी स्थिर कीमतों पर वास्तविक GDP का आकलन किया जाता है।
  • अब 2022-23 की कीमतों को मानक मानकर महँगाई के प्रभाव को अलग किया जाएगा, जिससे अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं के वास्तविक उत्पादन की वृद्धि को अधिक सटीक रूप से मापा जा सके। 

संशोधित आधार वर्ष 

  • पूर्व आधार वर्ष: 2011-12
  • नया आधार वर्ष: 2022-23 (FY23)
  • अंतर्राष्ट्रीय सामंजस्य: भारत समय-समय पर आधार वर्ष में बदलाव करता है ताकि वह राष्ट्रीय लेखा प्रणाली (SNA) के वैश्विक मानकों के अनुरूप बना रहे। 

बदलाव का उद्देश्य 

  • बदलते उपभोग स्वरूप, डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार तथा नई उत्पादन तकनीकों को राष्ट्रीय आय आँकड़ों में सम्मिलित करना।
  • भारतीय राष्ट्रीय लेखा प्रणाली को वैश्विक सांख्यिकीय ढाँचों के साथ संतुलित और समन्वित करना। 

नई GDP श्रृंखला की प्रमुख विशेषताएँ 

1. उन्नत मुद्रास्फीति समायोजन

  • अधिक सूक्ष्म डिफ्लेटर: 
    • मूल्य सूचकांकों की संख्या लगभग 180 से बढ़ाकर करीब 600 कर दी गई है। इसमें CPI और WPI के विशिष्ट घटकों का उपयोग किया जाएगा, जिससे सामान्य औसत मूल्यों के कारण उत्पादन आँकड़ों में विकृति न आए। 
  • डबल डिफ्लेशन की पद्धति:
    • विशेष रूप से विनिर्माण और कृषि में इनपुट तथा आउटपुट को अलग-अलग समायोजित किया जाएगा। इससे कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव को उत्पादन वृद्धि के रूप में गिनने की त्रुटि समाप्त होगी।
  • क्षेत्र-विशिष्ट सूचकांक:
    • पूरी अर्थव्यवस्था के लिए एक समान सूचकांक के स्थान पर अब उद्योग-विशिष्ट और यूनिट-वैल्यू आधारित सूचकांकों का उपयोग किया जाएगा, ताकि प्रत्येक क्षेत्र की वास्तविक मूल्य प्रवृत्तियों को सटीक रूप से पकड़ा जा सके। 

2. घरेलू और असंगठित क्षेत्र का बेहतर प्रतिनिधित्व

  • अनुमान के बजाय वास्तविक डेटा:
    • अब पुराने सर्वेक्षणों पर आधारित आकलन के बजाय असंगठित क्षेत्र उद्यम सर्वेक्षण (ASUSE) और आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) से प्राप्त वार्षिक स्तर के आँकड़ों को शामिल किया जाएगा।
  • गिग अर्थव्यवस्था का समावेश:
    • डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कार्य करने वाले श्रमिकों—जैसे डिलीवरी एजेंट और एग्रीगेटर ड्राइवर के योगदान को नए डेटा वर्गीकरण के माध्यम से दर्ज किया जाएगा।

3. बिग डेटा और प्रशासनिक स्रोतों का उपयोग

  • GST आधारित सत्यापन:
    • GST आँकड़ों का प्रयोग अब कॉर्पोरेट गतिविधियों की पुष्टि और राज्यों के बीच आर्थिक गतिविधि के वितरण के आकलन में किया जाएगा।
  • अन्य प्रशासनिक डेटाबेस का समावेशन:
    • सड़क परिवहन सेवाओं के आकलन हेतु e-Vahan डेटा का उपयोग।
    • सरकारी व्यय की निगरानी के लिए पब्लिक फाइनेंस मैनेजमेंट सिस्टम (PFMS) के आँकड़ों का समावेशन। 

4. संरचनात्मक संतुलन और सांख्यिकीय परिशुद्धता

  • सप्लाई एंड यूज़ टेबल्स (SUT) का एकीकरण:
    • उत्पादन-आधारित और व्यय-आधारित GDP के बीच के अंतर को कम करने के लिए SUT ढाँचे को अपनाया गया है, जिससे आँकड़ों में असंगतियाँ घटेंगी।
  • निजी अंतिम उपभोग व्यय (PFCE) का नया आकलन:
    • PFCE का अनुमान अब सर्वेक्षण, कमोडिटी फ्लो और उत्पादन आँकड़ों के संयोजन से लगाया जाएगा तथा इसे COICOP 2018 (Classification of Individual Consumption According to Purpose) के नवीनतम अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाया गया है। 
  • त्रैमासिक आँकड़ों का समतलीकरण: 
    • Proportional Denton विधि अपनाकर त्रैमासिक GDP में दिखाई देने वाले कृत्रिम उतार-चढ़ाव को कम किया गया है, जिससे अल्पकालिक वृद्धि का रुझान अधिक यथार्थ और स्थिर दिखाई देगा। 

संभावित प्रभाव 

  • डिजिटल सेवाओं और गिग अर्थव्यवस्था जैसे उभरते क्षेत्रों का योगदान अब अधिक स्पष्ट रूप से परिलक्षित होगा, जो पूर्व आधार वर्ष में कम आंका गया था।
  • डबल डिफ्लेशन पद्धति से उद्योगों में वास्तविक मूल्य वर्धन का अधिक सटीक आकलन संभव होगा, क्योंकि इससे लाभ मार्जिन और वास्तविक उत्पादन मात्रा के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित किया जा सकेगा। 
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