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भारत-अमेरिका समझौता

संदर्भ 

  • 11वीं क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान, भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका ने महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए एक ऐतिहासिक द्विपक्षीय समझौते को अंतिम रूप दिया है। 
  • इसके साथ ही, क्वाड के चारों साझेदार देशों (ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान और अमेरिका) के बीच महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करने के लिए एक अन्य बहुपक्षीय ढाँचागत समझौते पर भी हस्ताक्षर किए गए हैं।   

समझौते की पृष्ठभूमि और वैश्विक प्रेरक कारक 

यह रणनीतिक कदम वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बढ़ते व्यवधानों और चीन के एकाधिकार के प्रत्युत्तर के रूप में देखा जा रहा है: 

  • चीनी निर्यात नियंत्रण का संकट: वर्ष 2025 में चीन द्वारा दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (Rare Earth Elements - REE) और रणनीतिक धातुओं पर कड़े निर्यात नियंत्रण लागू करने के बाद वैश्विक बाजार में इन खनिजों की भारी कमी हो गई थी।   
  • तनावपूर्ण वैश्विक बाजार: यह संकट तब और गहरा गया जब संयुक्त राज्य अमेरिका ने कई सहयोगी देशों पर टैरिफ (शुल्क) लगा दिए, जिससे आपूर्ति श्रृंखलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गईं। 
  • निरंतर कूटनीति का परिणाम: भारत और अमेरिका के बीच इस द्विपक्षीय समझौते की रूपरेखा फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वाशिंगटन डीसी यात्रा के दौरान रखी गई थी, जहाँ सुरक्षित खनिज मार्गों को साझा रणनीतिक प्राथमिकता घोषित किया गया था। इसके बाद, 20 फरवरी 2026 को भारत ने अमेरिका के नेतृत्व वाली पैक्स सिलिका पहल (Pax Silica Initiative) पर हस्ताक्षर किए, जिसने इस साझेदारी को और मजबूत किया।   

भारत-अमेरिका द्विपक्षीय फ्रेमवर्क के मुख्य स्तंभ 

“महत्वपूर्ण खनिजों और दुर्लभ पृथ्वी धातुओं के खनन और प्रसंस्करण में आपूर्ति सुनिश्चित करना” शीर्षक वाले इस द्विपक्षीय समझौते के निम्नलिखित मुख्य उद्देश्य हैं:  

  • व्यापक सहयोग: इसके तहत खनन (Mining), प्रसंस्करण (Processing), पुनर्चक्रण (Recycling) और इससे जुड़े निवेशों में भारत-अमेरिका सहयोग को गहरा किया जाएगा। 
  • लचीली आपूर्ति श्रृंखला: इसका प्राथमिक लक्ष्य वैश्विक स्तर पर विविध और लचीली आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करना है, ताकि किसी एक देश पर निर्भरता कम की जा सके।  
  • स्क्रैप प्रबंधन और वित्तपोषण: महत्वपूर्ण खनिजों और दुर्लभ पृथ्वी धातुओं के स्क्रैप (कचरे) के प्रभावी प्रबंधन और इसके लिए आवश्यक वित्तीय सहायता (Financing) को बढ़ावा देना।  
  • संसाधन जुटाना: इस दिशा में अमेरिकी दूतावास के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी में 30 अरब डॉलर से अधिक के लेटर ऑफ़ इंटरेस्ट (Letters of Interest), निवेश और ऋण जैसी वित्तीय सहायता परियोजनाओं के लिए जुटा रहा है।   

क्वाड क्रिटिकल मिनरल्स इनिशिएटिव फ्रेमवर्क (Quad Framework)

चारों देशों (भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान) के बीच हस्ताक्षरित इस बहुपक्षीय समझौते के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं: 

  • वित्तीय प्रतिबद्धता: महत्वपूर्ण खनिजों की स्थिर आपूर्ति श्रृंखला स्थापित करने के लिए सरकारी और निजी क्षेत्रों के माध्यम से लगभग 20 अरब डॉलर का समर्थन जुटाने का लक्ष्य रखा गया है। 
  • क्वाड कंपनियों को प्रोत्साहन: यह ढाँचा उन परियोजनाओं को विशेष बढ़ावा देगा जो क्वाड भागीदार देशों में स्थित हैं या जिनका संचालन क्वाड देशों में मुख्यालय वाली कंपनियों द्वारा किया जा रहा है। इससे आपूर्ति श्रृंखला की मौजूदा कमियों को दूर किया जा सकेगा। 
  • कानूनी सामंजस्य: इस तंत्र से चारों देशों के घरेलू कानूनों, नियमों और विनियमों में अधिक तालमेल (Alignment) स्थापित होगा, जिससे खनिजों तक पहुँच सुगम हो जाएगी। 
  • राष्ट्रीय सुरक्षा: यह समझौता राष्ट्रीय सुरक्षा आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए रणनीतिक धातुओं के नियंत्रण को और मजबूत करने में साझेदार देशों की मदद करेगा।   

सर्कुलर इकोनॉमी और सतत विकास (पुनर्चक्रण पर विशेष बल) 

इस रणनीतिक सहयोग का एक महत्वपूर्ण आयाम पर्यावरण और संसाधन स्थिरता से जुड़ा है: 

  • ई-कचरा पुनर्चक्रण (E-Waste Recycling): क्वाड के साझेदार देश ई-कचरे (E-waste) और अन्य स्क्रैप सामग्रियों से महत्वपूर्ण खनिजों को निकालने (Recovery) और उनके पुनः उपयोग में सुधार करने के लिए मिलकर काम करेंगे। 
  • समान विचारधारा वाले देशों में सहयोग: इसका उद्देश्य क्वाड देशों और अन्य समान विचारधारा वाले राष्ट्रों के भीतर ही महत्वपूर्ण खनिजों के पुनर्चक्रण को बढ़ावा देना है, जिससे प्राथमिक खनन पर निर्भरता कम हो सके और आपूर्ति श्रृंखला को संधारणीय (Sustainable) बनाया जा सके।

आगे की राह 

  • भारत के लिए यह समझौता अपनी घरेलू मेक इन इंडिया और राष्ट्रीय सेमीकंडक्टर जैसी रणनीतिक पहलों को सुरक्षित करने का एक अभूतपूर्व अवसर है। 
  • भारत को अमेरिका की 30 अरब डॉलर की वित्तीय प्रतिबद्धता और क्वाड के 20 अरब डॉलर के कोष का लाभ उठाकर अपने घरेलू तकनीकी बुनियादी ढांचे को मजबूत करना चाहिए। 
  • साथ ही, घरेलू नियामक प्रणाली को वैश्विक मानकों के अनुरूप ढालकर, भारत खुद को महत्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण के एक प्रमुख वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित कर सकता है। 

निष्कर्ष 

यह दोहरे स्तर का समझौता (द्विपक्षीय और बहुपक्षीय) केवल आर्थिक विनिमय का साधन नहीं है, बल्कि यह हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में एक नए खनिज कूटनीति (Mineral Diplomacy) के युग की शुरुआत है। वस्तुतः स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण (Green Energy Transition), सेमीकंडक्टर विनिर्माण, रक्षा उपकरणों और डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए ये खनिज रीढ़ की हड्डी के समान हैं।   

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