संदर्भ
पश्चिम एशिया में उत्पन्न परिस्थितियों, अल नीनो के प्रभाव से बढ़ती मांग और यूरिया जैसे रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक इस्तेमाल को लेकर उठ रही चिंताओं के बीच केंद्र सरकार ने चालू खरीफ सीजन में उर्वरक उपलब्धता सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाया है। इसी क्रम में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) ने हाल ही में नेशनल इन्वेस्टमेंट पॉलिसी फॉर यूरिया (NIPU)-2026 को मंजूरी प्रदान की है।
नीति से संबंधित प्रमुख बिंदु
- नई नीति का प्रमुख उद्देश्य देश को यूरिया उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना है, क्योंकि वर्तमान में यह क्षेत्र काफी हद तक आयात पर निर्भर है। सरकार का मानना है कि इस नीति के लागू होने से यूरिया क्षेत्र में नए निवेश को बढ़ावा मिलेगा और देश में गैस आधारित यूरिया विनिर्माण इकाइयों की स्थापना को प्रोत्साहन मिलेगा।
प्रमुख बदलाव:
- नई नीति में मौजूदा व्यवस्था की तुलना में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। इनमें लागत व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए निश्चित लागत (Fixed Cost) और परिवर्तनशील लागत (Variable Cost) को अलग करना शामिल है।
- इसके अलावा, निवेशकों के लिए व्यावहारिक रिटर्न ऑन इक्विटी (RoE) व्यवस्था लागू की गई है, जिसमें न्यूनतम सीमा 12 प्रतिशत और अधिकतम सीमा 16 प्रतिशत निर्धारित की गई है।
- साथ ही, विदेशी मुद्रा जोखिम को कम करने के लिए चार वर्ष बाद निश्चित लागत को उस समय की प्रचलित विनिमय दर के आधार पर भारतीय रुपये में परिवर्तित करने का प्रावधान किया गया है।
भारत में यूरिया नीति का विकास
- केंद्र सरकार ने यूरिया क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2012 और 2013 में नीतियां घोषित की थीं। इसके बाद अक्टूबर 2014 में इन नीतियों में संशोधन किया गया, ताकि नए निवेश को आसान बनाया जा सके।
- केंद्रीय उर्वरक मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2012 की नीति के तहत देश में छह नई यूरिया इकाइयों की स्थापना की गई। इनमें चार इकाइयां नामित सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) की संयुक्त उद्यम कंपनियों (JVCs) के माध्यम से स्थापित की गईं, जबकि दो इकाइयां निजी कंपनियों द्वारा स्थापित की गईं।
- वर्तमान समय में देश में कुल 33 यूरिया विनिर्माण इकाइयां संचालित हैं, जिनकी पुनर्मूल्यांकित/स्थापित क्षमता 269.42 लाख मीट्रिक टन (LMT) है।
- सरकार का कहना है कि देश में यूरिया की घरेलू मांग और स्वदेशी उत्पादन के बीच अभी भी अंतर मौजूद है, जिसे आयात के माध्यम से पूरा किया जाता है। इसलिए घरेलू उत्पादन क्षमता में वृद्धि करना आवश्यक है।
सरकारी आंकड़े:
- सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कुल स्वदेशी यूरिया उत्पादन क्षमता (पुनर्मूल्यांकित क्षमता-RAC) वर्ष 2014-15 में 207.54 लाख मीट्रिक टन प्रति वर्ष थी, जो बढ़कर वर्ष 2026-27 में 269.42 लाख मीट्रिक टन प्रति वर्ष हो गई है।
- इसके अलावा, मई 2015 में सरकार ने मौजूदा 25 गैस आधारित यूरिया इकाइयों के लिए नीति में संशोधन किया था। इस संशोधन के परिणामस्वरूप वर्ष 2014-15 के वार्षिक उत्पादन की तुलना में प्रतिवर्ष 20-25 लाख मीट्रिक टन अतिरिक्त यूरिया उत्पादन संभव हुआ।
- वर्ष 2014-15 में इन इकाइयों का उत्पादन 225 लाख मीट्रिक टन प्रति वर्ष था, जो बढ़कर वर्ष 2023-24 में 314.07 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गया। सरकार के अनुसार, वर्ष 2025-26 में देश में कुल 293.30 लाख मीट्रिक टन यूरिया का उत्पादन किया गया।
उर्वरक सब्सिडी पर बढ़ता खर्च
- सरकार द्वारा वर्ष 2025-26 के लिए कुल उर्वरक सब्सिडी का प्रावधान ₹2,17,281.10 करोड़ रखा गया है। इसकी तुलना में वर्ष 2024-25 में यह राशि ₹1,77,162.06 करोड़ थी।
- वर्ष 2025-26 में अकेले यूरिया सब्सिडी ₹1,42,175.74 करोड़ रही, जबकि वर्ष 2024-25 में यह ₹1,24,319.50 करोड़ थी।
- फॉस्फोरस और पोटेशियम आधारित उर्वरकों के लिए सब्सिडी राशि क्रमशः ₹74,999.99 करोड़ और ₹52,810 करोड़ निर्धारित की गई है।
- इसके अलावा, जैविक उर्वरकों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सरकार ने पिछले दो वित्तीय वर्षों में क्रमशः ₹105.37 करोड़ और ₹32.56 करोड़ की सब्सिडी उपलब्ध कराई है।
खरीफ सीजन में यूरिया की उपलब्धता
- संसद में सरकार द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, 3 मार्च 2026 तक देश में खरीफ सीजन के लिए यूरिया की कुल आवश्यकता 370.84 लाख मीट्रिक टन (LMT) है।
- इसके मुकाबले देश में यूरिया की उपलब्धता 432.44 लाख मीट्रिक टन है। इसमें से 381.59 लाख मीट्रिक टन यूरिया प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) प्रणाली के तहत बिक्री के लिए उपलब्ध कराया जाएगा।
- प्रत्यक्ष लाभ अंतरण व्यवस्था के तहत सब्सिडी वाले उर्वरकों की बिक्री प्रत्येक खुदरा विक्रेता की दुकान पर स्थापित पॉइंट ऑफ सेल (PoS) मशीनों के माध्यम से की जाती है। लाभार्थियों की पहचान आधार कार्ड, किसान क्रेडिट कार्ड (KCC), मतदाता पहचान पत्र आदि दस्तावेजों के माध्यम से की जाती है।
- वर्ष 2024-25 में खरीफ सीजन के लिए यूरिया की आवश्यकता 364.01 लाख मीट्रिक टन थी, जबकि उपलब्धता 443.83 लाख मीट्रिक टन रही।
संतुलित उर्वरक उपयोग पर सरकार का जोर
- सरकार का कहना है कि वह उर्वरकों के संतुलित और प्रभावी उपयोग को बढ़ावा देने के लिए लगातार कदम उठा रही है।
- कृषि मंत्रालय के अनुसार, सरकार एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (Integrated Nutrient Management-INM) को बढ़ावा दे रही है। इसके तहत जैविक स्रोतों, रासायनिक उर्वरकों और जैविक इनपुट के वैज्ञानिक एवं संतुलित उपयोग को प्रोत्साहित किया जाता है, ताकि पोषक तत्वों का बेहतर प्रबंधन सुनिश्चित किया जा सके।
- मंत्रालय के अनुसार, आईएनएम का उद्देश्य फसलों की पोषण संबंधी आवश्यकताओं को आर्थिक और पर्यावरण के अनुकूल तरीके से पूरा करना है, साथ ही मिट्टी की दीर्घकालिक उर्वरता को बनाए रखना भी इसका लक्ष्य है।
- सरकार ने नैनो यूरिया को भी बढ़ावा देने का प्रयास किया है, लेकिन इसकी वैज्ञानिक प्रभावशीलता और परिणामों को लेकर उठे सवालों के कारण यह अभी तक किसानों के बीच व्यापक स्तर पर लोकप्रिय नहीं हो पाया है।
आगे की राह
नेशनल इन्वेस्टमेंट पॉलिसी फॉर यूरिया (NIPU)-2026 सरकार की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत भारत यूरिया आयात पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है। हालांकि, केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। नीति की सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि नए निवेश कितने प्रभावी तरीके से आते हैं, उत्पादन लागत कितनी नियंत्रित रहती है और क्या देश रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग की दिशा में आगे बढ़ पाता है। यद्यपि यूरिया में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य केवल आपूर्ति सुरक्षा का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह कृषि स्थिरता, राजकोषीय प्रबंधन और पर्यावरणीय संतुलन से भी जुड़ा हुआ है।