संदर्भ
प्रत्येक वर्ष 29 जुलाई को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस दुनिया को बाघ संरक्षण के महत्व का संदेश देता है। भारत के लिए यह केवल एक जागरूकता दिवस नहीं, बल्कि विज्ञान-आधारित संरक्षण, सतत विकास और जैव विविधता के प्रति उसकी दीर्घकालिक प्रतिबद्धता का प्रतीक है। आज भारत विश्व के लगभग 70 प्रतिशत जंगली बाघों का घर है और यह उपलब्धि दशकों की दूरदर्शी नीतियों, वैज्ञानिक प्रबंधन तथा जनभागीदारी का परिणाम है। इसी कारण भारत आज वैश्विक स्तर पर बाघ संरक्षण का अग्रणी देश माना जाता है।
भारत और बाघ: संस्कृति से संरक्षण तक
- भारतीय सभ्यता में बाघ का विशेष स्थान रहा है। प्राचीन सिक्कों, शाही प्रतीकों, मंदिरों की नक्काशियों और लोक परंपराओं में बाघ को शक्ति, साहस और प्रभुत्व का प्रतीक माना गया है। इसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देते हुए वर्ष 1972 में रॉयल बंगाल टाइगर को भारत का राष्ट्रीय पशु घोषित किया गया। आज भी बाघ केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध जैव विविधता, प्राकृतिक संपदा और साझा सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधि है।
पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षक
- बाघ एक शीर्ष शिकारी (Top Predator) और अम्ब्रेला प्रजाति है। इसका संरक्षण केवल एक प्रजाति की रक्षा नहीं, बल्कि पूरे वन पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
- बाघों के प्राकृतिक आवासों की रक्षा से वन, नदियाँ, जल स्रोत और असंख्य वन्य प्रजातियाँ सुरक्षित रहती हैं। यही वन जल संरक्षण, मृदा संरक्षण, परागण, स्थानीय जलवायु संतुलन तथा आपदा जोखिम को कम करने जैसी महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी सेवाएँ प्रदान करते हैं। इस प्रकार बाघ संरक्षण ग्रामीण आजीविका, जल सुरक्षा और सतत विकास से भी सीधे जुड़ा हुआ है।
अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस की पृष्ठभूमि
- अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस की शुरुआत वर्ष 2010 में रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में आयोजित टाइगर समिट से हुई। भारत सहित 13 बाघ-आवास वाले देशों ने वर्ष 2022 तक जंगली बाघों की संख्या दोगुनी करने का महत्वाकांक्षी TX2 लक्ष्य अपनाया। उस समय विश्व में लगभग 3,200 जंगली बाघ थे। संरक्षण प्रयासों के कारण वर्ष 2022 तक यह संख्या लगभग 4,500 तक पहुँची और हालिया वैश्विक अनुमान लगभग 5,711 जंगली बाघों का संकेत देते हैं। यह पिछले डेढ़ दशक में संरक्षण प्रयासों की उल्लेखनीय सफलता को दर्शाता है।
भारत की उल्लेखनीय उपलब्धि
- भारत ने बाघ संरक्षण के क्षेत्र में दुनिया के सामने एक सफल मॉडल प्रस्तुत किया है। वर्ष 2006 से वैज्ञानिक पद्धति से की जाने वाली गणना के अनुसार देश में बाघों की संख्या दोगुनी से अधिक हो चुकी है।
- अखिल भारतीय बाघ अनुमान-2022 के अनुसार भारत में 3,682 बाघ हैं। इस सर्वेक्षण में 20 राज्यों के 6.41 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र का व्यापक अध्ययन किया गया, जिसे विश्व के सबसे बड़े और व्यापक वन्यजीव सर्वेक्षणों में गिना जाता है। यह सफलता प्रभावी नीतियों, वैज्ञानिक निगरानी, प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा और संस्थागत सहयोग का परिणाम है।
मजबूत प्रशासनिक ढाँचा
- भारत की बाघ संरक्षण नीति मजबूत संस्थागत व्यवस्था पर आधारित है, जिसमें प्रमुख भूमिका प्रोजेक्ट टाइगर, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) और राज्य सरकारों द्वारा तैयार की जाने वाली बाघ संरक्षण योजनाओं की है।
प्रोजेक्ट टाइगर:
- वर्ष 1973 में प्रारंभ किया गया प्रोजेक्ट टाइगर भारत सरकार की प्रमुख संरक्षण योजना है।
- इसका उद्देश्य बाघों और उनके प्राकृतिक आवासों की रक्षा करना है।
- यह योजना राज्यों को वित्तीय एवं तकनीकी सहायता उपलब्ध कराती है तथा आवास संरक्षण, वैज्ञानिक प्रबंधन और नियमित निगरानी को बढ़ावा देती है।
- वर्तमान में इसके अंतर्गत 18 राज्यों के 58 बाघ अभयारण्य लगभग 84,500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं।
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA):
- वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के अंतर्गत स्थापित राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण देश में बाघ संरक्षण गतिविधियों की निगरानी करता है। यह वैज्ञानिक दिशा-निर्देश जारी करता है, बाघ संरक्षण योजनाओं को स्वीकृति देता है, अभयारण्यों का मूल्यांकन करता है तथा राज्यों को तकनीकी और वित्तीय सहयोग प्रदान करता है। इसके विज्ञान-आधारित दृष्टिकोण ने देशभर में बाघ संरक्षण को नई मजबूती प्रदान की है।
टाइगर टास्क फोर्स:
- बाघ संरक्षण नीति की समीक्षा और सुधार के लिए गठित टाइगर टास्क फोर्स ने कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। इसकी अनुशंसाओं के आधार पर वर्ष 2006 में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम में संशोधन किए गए, जिनके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) तथा वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB) की स्थापना हुई। इससे संरक्षण व्यवस्था अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और प्रभावी बनी।
विज्ञान और तकनीक से सशक्त निगरानी:
भारत ने बाघ संरक्षण में आधुनिक तकनीकों का प्रभावी उपयोग किया है।
- अखिल भारतीय बाघ अनुमान (AITE) विश्व का सबसे बड़ा जैव विविधता सर्वेक्षण है, जो प्रत्येक चार वर्ष में आयोजित किया जाता है। इसमें कैमरा ट्रैप, डीएनए विश्लेषण, मैदानी सर्वेक्षण तथा वैज्ञानिक मॉडलिंग का उपयोग किया जाता है।
- एम-स्ट्राइप्स (M-STrIPES) प्रणाली जीपीएस, रिमोट सेंसिंग और डिजिटल तकनीक के माध्यम से वन क्षेत्रों की निगरानी करती है। वहीं कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित CaTRAT और ExtractCompare जैसे उपकरण कैमरा ट्रैप से प्राप्त चित्रों के आधार पर अलग-अलग बाघों की पहचान करने में सहायता करते हैं।
- इसके अतिरिक्त प्रबंधन प्रभावशीलता मूल्यांकन (MEE) के माध्यम से बाघ अभयारण्यों के प्रबंधन की गुणवत्ता का नियमित आकलन किया जाता है, जिससे संरक्षण रणनीतियों में आवश्यक सुधार किए जा सकें।
वैश्विक संरक्षण में भारत की भूमिका
- भारत केवल अपने देश में ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी बाघ संरक्षण का नेतृत्व कर रहा है। नेपाल, भूटान, म्यांमार, रूस और चीन सहित कई देशों के साथ सीमा-पार संरक्षण, वैज्ञानिक अनुसंधान और वन्यजीव अपराध नियंत्रण के क्षेत्र में सहयोग स्थापित किया गया है।
- भारत ने इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस (IBCA) की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जो विश्वभर की सात बड़ी बिल्ली प्रजातियों के संरक्षण के लिए कार्य कर रहा है। इसके अतिरिक्त ग्लोबल टाइगर फोरम (GTF) तथा एकीकृत बाघ आवास संरक्षण कार्यक्रम (ITHCP) के माध्यम से भारत वैश्विक संरक्षण प्रयासों को नई दिशा प्रदान कर रहा है।
भविष्य की दिशा
- जलवायु परिवर्तन, बढ़ती मानव गतिविधियाँ और आवासों का विखंडन आज भी बाघ संरक्षण के सामने बड़ी चुनौतियाँ हैं। इन परिस्थितियों में भारत का लक्ष्य ऐसे जुड़े हुए और जलवायु-अनुकूल वन परिदृश्य विकसित करना है, जहाँ वन्यजीव और मानव दोनों सुरक्षित एवं संतुलित रूप से रह सकें। इसके लिए डेटा-आधारित निगरानी, आधुनिक तकनीक, वन कर्मियों का प्रशिक्षण तथा स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी को निरंतर मजबूत किया जा रहा है।
निष्कर्ष
भारत की बाघ संरक्षण यात्रा यह सिद्ध करती है कि मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, प्रभावी प्रशासन और जनभागीदारी के माध्यम से संकटग्रस्त वन्यजीवों का सफल संरक्षण संभव है। आज भारत विश्व के लिए एक प्रेरणादायी उदाहरण बन चुका है। अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस केवल एक प्रतीकात्मक अवसर नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का स्मरण कराता है। यदि हम बाघों और उनके प्राकृतिक आवासों की रक्षा करेंगे, तो वास्तव में हम अपनी जैव विविधता, जल संसाधनों, पर्यावरणीय संतुलन और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की रक्षा करेंगे।