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रुपये का अवमूल्यन: भारतीय मुद्रा की वैश्विक प्रतिस्पर्धा

संदर्भ  

पिछले लगभग डेढ़ वर्ष में भारतीय रुपये में आई तेज़ गिरावट ने इसकी स्थिति में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। जो रुपया पहले वास्तविक रूप से अधिक मूल्यांकित (Overvalued) माना जाता था, वह अब कम मूल्यांकित (Undervalued) मुद्रा बन गया है। कुछ आकलनों के अनुसार, वर्तमान में रुपया प्रतिस्पर्धात्मकता के मामले में चीनी युआन से भी आगे निकल चुका है, जिससे भारत के निर्यात और व्यापार को संभावित लाभ मिल सकता है।   

हाल के दिनों में रुपये की चाल  

  • अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव के कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई। इसका असर भारतीय मुद्रा पर भी पड़ा और 14 जुलाई को रुपया डॉलर के मुकाबले 96 प्रति डॉलर के स्तर से नीचे चला गया तथा 24 जुलाई तक इसी दायरे में बना रहा।
  • इसके बाद क्षेत्रीय तनाव में कुछ कमी आने और ब्रेंट क्रूड की कीमत 95 डॉलर प्रति बैरल से घटकर 85 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आने पर रुपये में कुछ सुधार हुआ और यह लगभग 95.9 प्रति डॉलर के स्तर पर पहुंच गया। 
  • इससे पहले 20 मई को रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर 96.96 प्रति डॉलर तक पहुंच गया था, जबकि 30 अप्रैल को ब्रेंट क्रूड की कीमत 126.4 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई थी। 
  • भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा के अनुसार, वर्तमान में रुपया अपने वास्तविक मूल्य से नीचे है। यदि पश्चिम एशिया की स्थिति सामान्य होती है, तो पहले की तरह बाहरी झटकों के समाप्त होने पर रुपये में फिर से मजबूती देखने को मिल सकती है। 

प्रभावी विनिमय दर (Effective Exchange Rate) क्या है? 

  • किसी मुद्रा का वास्तविक मूल्यांकन करने के लिए केवल डॉलर के मुकाबले उसकी कीमत देखना पर्याप्त नहीं होता। इसके लिए दो प्रमुख संकेतकों का उपयोग किया जाता है -
    • नाममात्र प्रभावी विनिमय दर (Nominal Effective Exchange Rate - NEER)
    • वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (Real Effective Exchange Rate - REER) 
    • ये दोनों सूचकांक भारत के लगभग 88 प्रतिशत विदेशी व्यापार का प्रतिनिधित्व करने वाले 40 देशों की मुद्राओं के मुकाबले रुपये की स्थिति का आकलन करते हैं। इनका आधार वर्ष 2015-16 है, जिसका मान 100 निर्धारित किया गया है। 
  • प्रत्येक देश को दिया गया भार (Weight) भारत के कुल विदेशी व्यापार में उसकी हिस्सेदारी के आधार पर तय किया जाता है। यह व्यवस्था उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) की तरह है, जहाँ वस्तुओं को उनके उपभोग के अनुपात के अनुसार भार दिया जाता है।
  • नाममात्र प्रभावी विनिमय दर (Nominal Effective Exchange Rate - NEER): यह सूचकांक केवल विभिन्न विदेशी मुद्राओं के मुकाबले रुपये की विनिमय दर को दर्शाता है और इसमें मुद्रास्फीति (Inflation) का प्रभाव शामिल नहीं होता।
  • वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (Real Effective Exchange Rate - REER): REER, NEER को भारत और उसके व्यापारिक साझेदार देशों के बीच मुद्रास्फीति के अंतर के अनुसार समायोजित करता है। इसलिए इसे किसी मुद्रा के वास्तविक मूल्य का अधिक विश्वसनीय संकेतक माना जाता है। 
  • यदि भारत में महंगाई व्यापारिक साझेदार देशों की तुलना में अधिक तेज़ी से बढ़ती है, तो विनिमय दर स्थिर रहने पर भी REER बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में भारतीय वस्तुएँ अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपेक्षाकृत महंगी हो जाती हैं और उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता घट सकती है।

अधिक मूल्यांकन से कम मूल्यांकन तक 

  • नवंबर 2024 में रुपये का REER 108.03 था। इसका अर्थ था कि वास्तविक रूप से रुपया अपने उचित स्तर से लगभग 8 प्रतिशत अधिक मूल्यांकित था।
  • इसके विपरीत, जून 2026 में REER घटकर 91.26 रह गया। इसका अर्थ है कि रुपया वास्तविक रूप से लगभग 8.7 प्रतिशत कम मूल्यांकित हो चुका है।
  • गौरतलब है कि जुलाई 2025 तक REER लगातार 100 से ऊपर बना हुआ था। इसके बाद पहली बार इसमें स्पष्ट गिरावट दर्ज हुई, जिससे यह संकेत मिला कि रुपये की स्थिति में हाल के समय में बड़ा परिवर्तन आया है।
  • विश्लेषकों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव स्थायी रूप से कम होता है, समुद्री व्यापार मार्ग सामान्य रूप से संचालित होने लगते हैं और ऊर्जा बाजार में नए भू-राजनीतिक संकट या अमेरिका की ओर से अतिरिक्त व्यापारिक प्रतिबंध नहीं लगते, तो रुपया धीरे-धीरे अपने संतुलित स्तर (REER = 100) की ओर लौट सकता है।

क्या रुपया अब युआन से भी अधिक प्रतिस्पर्धी है? 

  • इस प्रवृत्ति की पुष्टि एक अन्य वैश्विक सूचकांक रियल ब्रॉड इफेक्टिव एक्सचेंज रेट (Real Broad Effective Exchange Rate - RBEER) से भी होती है, जिसे फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ सेंट लुइस तैयार करता है।
  • यह सूचकांक 64 व्यापारिक साझेदार देशों की मुद्राओं के मुकाबले किसी देश की मुद्रा का मूल्यांकन करता है और इसका आधार वर्ष 2020 है।
  • नवंबर 2024 में रुपये का RBEER 106.1 था, जो बाद में घटकर जून 2026 में 90.15 रह गया।
  • उसी अवधि में चीनी युआन का RBEER लगभग 92.24 दर्ज किया गया।
  • इसका अर्थ है कि वर्तमान में रुपये का वास्तविक मूल्य युआन से भी कम है। इसलिए प्रतिस्पर्धात्मक दृष्टि से भारतीय मुद्रा अब चीनी मुद्रा की तुलना में अधिक अनुकूल मानी जा रही है।

इसका आर्थिक महत्व 

यदि कोई मुद्रा अपने वास्तविक मूल्य से कम पर कारोबार करती है, तो सामान्यतः उसके कुछ संभावित लाभ हो सकते हैं -

  • भारतीय निर्यात अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपेक्षाकृत सस्ता और अधिक प्रतिस्पर्धी हो सकता है।
  • आयातित वस्तुओं की तुलना में घरेलू उत्पादन को बढ़ावा मिल सकता है।
  • विनिर्माण क्षेत्र को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलने की संभावना बढ़ती है।  

हालांकि, केवल मुद्रा का कम मूल्यांकित होना पर्याप्त नहीं है। इन संभावित लाभों का वास्तविक प्रभाव कई अन्य कारकों पर भी निर्भर करेगा, जैसे -

  • वैश्विक मांग की स्थिति,
  • आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) की मजबूती,
  • अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीतियाँ तथा
  • भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ। 

निष्कर्ष 

  • भारतीय रुपया पिछले डेढ़ वर्ष में अधिक मूल्यांकित मुद्रा से कम मूल्यांकित मुद्रा में परिवर्तित हुआ है। कुछ प्रमुख वैश्विक सूचकांकों के अनुसार यह अब चीनी युआन की तुलना में भी अधिक प्रतिस्पर्धी स्थिति में है।
  • यदि वैश्विक परिस्थितियाँ अनुकूल रहती हैं और भारत अपनी उत्पादन क्षमता, निर्यात अवसंरचना तथा व्यापारिक अवसरों का प्रभावी उपयोग कर पाता है, तो यह परिवर्तन भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण अवसर सिद्ध हो सकता है। दूसरी ओर, यदि भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताएँ बनी रहती हैं, तो केवल मुद्रा की प्रतिस्पर्धात्मकता से अपेक्षित आर्थिक लाभ प्राप्त करना आसान नहीं होगा। 
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