संदर्भ
हाल ही में हुए देशव्यापी हड़तालों में गिग वर्कर्स, संविदा शिक्षक और आशा/आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की भागीदारी ने भारत में अधिशेष श्रम जाल (Surplus Labour Trap) की गंभीरता को सामने रखा। यह स्थिति दर्शाती है कि लाखों लोग निम्न उत्पादकता और असुरक्षित नौकरियों में फंसे हुए हैं।
अधिशेष श्रम जाल का अर्थ
- अधिशेष श्रम जाल वह आर्थिक संरचना है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग कम वेतन और कम उत्पादकता वाली नौकरियों (जैसे गिग वर्क या अस्तित्व आधारित खेती) में फंसे रहते हैं। इसका मुख्य कारण औपचारिक अर्थव्यवस्था द्वारा पर्याप्त गुणवत्ता वाली नौकरियों का सृजन न होना है।
भारत के श्रम बाजार की स्थिति
- अनौपचारिक क्षेत्र का प्रभुत्व: 65 करोड़ श्रमिकों में लगभग 90% अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं, जिनके पास औपचारिक अनुबंध या सामाजिक सुरक्षा नहीं है।
- श्रम भागीदारी में कमी: लगभग 35 करोड़ लोग काम की तलाश नहीं कर रहे हैं, जो मानव पूंजी के बड़े हिस्से के अप्रयुक्त रहने को दर्शाता है।
- कम वेतन: आशा/आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का मासिक वेतन ₹7,000–₹12,000 है, जो अक्सर न्यूनतम वेतन से भी कम होता है।
- सार्वजनिक क्षेत्र में भीड़: हजारों स्नातक कम स्तर के सरकारी पदों (जैसे चौकीदार, ड्राइवर) के लिए आवेदन करते हैं, यह दर्शाता है कि सम्मानजनक निजी क्षेत्र की नौकरियाँ पर्याप्त नहीं हैं।
श्रम बाजार में संभावनाएँ
- जनसांख्यिकीय लाभ: भारत की युवा आबादी विश्व स्तर पर सबसे बड़ी है, जो सही प्रशिक्षण के साथ उत्पादकता बढ़ा सकती है। उदाहरण: बेंगलुरु में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) भारतीय प्रतिभा को उच्च गुणवत्ता वाली वैश्विक सेवाओं में योगदान देने में सक्षम बनाते हैं।
- डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार: डिजिटल प्रणाली नई और लचीली रोजगार संभावनाएँ प्रदान कर सकती है। उदाहरण: ONDC (ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स) छोटे विक्रेताओं और डिलीवरी पार्टनर्स को सशक्त करने का प्रयास है।
- निर्माण और विनिर्माण क्षेत्र (China Plus One): वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव अधिशेष कृषि श्रमिकों के लिए औद्योगिक रोजगार के अवसर पैदा करता है। उदाहरण: तमिलनाडु और कर्नाटक में Apple के इकोसिस्टम का विस्तार (Foxconn/Tata) हजारों महिलाओं के लिए औपचारिक नौकरियाँ सृजित कर रहा है।
- हरित ऊर्जा संक्रमण: नवीनीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव नई हरित कार्य शक्ति की मांग बढ़ाएगा। उदाहरण: PM-Surya Ghar Muft Bijli Yojana ग्रामीण भारत में सोलर तकनीशियनों और इंस्टॉलर की मांग को बढ़ावा देगी।
- सामाजिक अवसंरचना का विकास: स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्रों का विस्तार अधिशेष श्रम को उत्पादक देखभाल पेशेवरों में बदल सकता है। उदाहरण: राज्यों में AIIMS जैसी संस्थाओं और मेडिकल कॉलेजों का विस्तार स्वास्थ्य क्षेत्र में औपचारिक रोजगार पैदा कर रहा है।
प्रमुख चुनौतियाँ
- नौकरी की असुरक्षा (Gig-ification): अल्गोरिदमिक प्रबंधन और तेज़ डिलीवरी मॉडल श्रमिक सुरक्षा से अधिक गति पर केंद्रित हैं। उदाहरण: गुड़गांव में Zomato और Blinkit हड़तालों ने दुर्घटना बीमा की कमी और जोखिम उजागर किए।
- मजदूरी में स्थिरता का अभाव: महंगाई ने कम वेतन वाले श्रमिकों की क्रय शक्ति को कम किया है। उदाहरण: कई राज्यों में MNREGA का वेतन कृषि मजदूरी से कम है।
- कौशल असंगति: स्नातकों में तकनीकी दक्षता की कमी आधुनिक उद्योग की मांगों को पूरा नहीं कर पाती। उदाहरण: 2024 इंडिया स्किल्स रिपोर्ट के अनुसार केवल 50% स्नातक वास्तव में रोजगार योग्य पाए गए।
- लिंग आधारित असमानता: महिलाएँ अनौपचारिक और स्वयंसेवी कार्यों में असमान वेतन और अवसर का सामना करती हैं। उदाहरण: दिल्ली और महाराष्ट्र में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा विरोध प्रदर्शन।
- कमज़ोर श्रम कानून प्रवर्तन: जटिल उप-ठेकेदारी के कारण मौजूदा कानूनों का पालन अक्सर नहीं होता। उदाहरण: सिलक्यारा सुरंग दुर्घटना में उप-ठेकेदार श्रमिकों की सुरक्षा और बीमा की कमी सामने आई।
समाधान और मार्गदर्शन
- अनौपचारिक क्षेत्र को औपचारिक बनाना: सोशल सिक्योरिटी कोड लागू कर गिग और प्लेटफ़ॉर्म वर्कर्स के लिए स्वास्थ्य और दुर्घटना बीमा सुनिश्चित करना।
- मानव पूंजी में निवेश: भौतिक अवसंरचना की बजाय मानव अवसंरचना में निवेश, नियमित और स्थायी शिक्षकों और स्वास्थ्य कर्मियों की भर्ती।
- जीवन योग्य वेतन सुनिश्चित करना: आशा/आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को सिविल पद या औपचारिक कर्मचारी बनाना।
- संगठित सामूहिक वार्ता को सशक्त करना: श्रमिकों को यूनियन बनाने और वार्ता करने का अधिकार बिना भय के देना।
- विकेंद्रीकृत औद्योगिकीकरण: ग्रामीण क्षेत्रों में MSMEs को बढ़ावा देकर अधिशेष श्रम का स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन, जिससे मजबूरी से शहरी प्रवासन कम हो।
निष्कर्ष
भारत उस मोड़ पर है, जहाँ उसका विशाल श्रम बल उसकी सबसे बड़ी संपत्ति भी हो सकता है और एक सामाजिक-आर्थिक समय बम भी। आर्थिक संरचना को “बदली जाने योग्य श्रमिक” से “सम्मानजनक रोजगार” की दिशा में ले जाना अनिवार्य है। केवल निचले स्तर के श्रमिकों को सशक्त करके ही भारत दीर्घकालिक और स्थायी आर्थिक विकास के लिए आवश्यक समग्र मांग पैदा कर सकता है।