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प्रतिचक्रीय पूंजी बफर

चर्चा में क्यों

हाल ही में, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने ‘प्रतिचक्रीय पूंजी बफर’ (Countercyclical Capital Buffer : CCyB) को सक्रिय नहीं करने का निर्णय लिया है।

प्रतिचक्रीय पूंजी बफर

  • 5 फरवरी 2015 को जारी दिशानिर्देशों के अनुसार, रिज़र्व बैंक द्वारा प्रतिचक्रीय पूंजी बफर (सी.सी.वाई.बी.) की रूपरेखा तैयार की गई थी, जिसमें यह सूचित किया गया था कि सी.सी.वाई.बी. को उन परिस्थितियों में सक्रिय किया जाएगा, जब इसकी आवश्यकता होगी।
  • भारत में इसकी संरचना में मुख्य संकेतक के रूप में सकल घरेलू उत्पाद अंतराल के अनुपात में ऋण (क्रेडिट टू जी.डी.पी. गैप) की परिकल्पना की गई है, जिसका उपयोग अन्य अनुपूरक संकेतकों के साथ किया जा सकता है।
  • सी.सी.वाई.बी. संकेतकों की समीक्षा और अनुभवजन्य विश्लेषण के आधार पर आर.बी.आई. ने यह निर्णय लिया गया है कि वर्तमान में इसको सक्रिय करना आवश्यक नहीं है।

उद्देश्य

  • वर्ष 2015 में जारी दिशानिर्देशों के अनुसार, सी.सी.वाई.बी. व्यवस्था के दो प्रमुख उद्देश्य होते हैं। पहला, बैंकों से यह अपेक्षा होती है कि वे अच्छे समय के दौरान पूंजी बफर का निर्माण करें जिसका उपयोग कठिन समय में वस्तु क्षेत्र (Real Sector) में ऋण के प्रवाह को बनाए रखने के लिये किया जा सकता है।
  • दूसरा, यह बैंकिंग क्षेत्र को ऋण संवृद्धि के समय अंधाधुंध या अविवेकी ऋण देने से प्रतिबंधित करता है।

अन्य बिंदु

  • इन्हीं दिशानिर्देशों के अनुसार, सी.सी.वाई.बी. को केवल सामान्य इक्विटी टियर 1 (CET 1) पूंजी अथवा पूर्णत: हानि अवशोषण करने वाली अन्य पूंजी के रूप में ही रखा जा सकता है तथा इसकी राशि बैंक की कुल जोखिम भारित आस्तियों के 0 से 5% के बीच हो सकती है।
  • सामान्यतया सी.सी.वाई.बी. निर्णय की घोषणा चार तिमाहियों की समय सीमा के साथ पहले ही कर दी जाएगी। तथापि, बैंकों को अल्पावधि में भी अपेक्षित बफर तैयार करने के लिये कहा जा सकता है ।
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