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डिफ़ॉल्ट जमानत 

(प्रारंभिक परीक्षा- राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ, भारतीय राज्यतंत्र और शासन- संविधान)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2: न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्य, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान)

संदर्भ 

हाल ही में, बॉम्बे उच्च न्यायालय ने एल्गार परिषद मामले में आरोपी सुधा भारद्वाज को जमानत दे दी है। 

जमानत का आधार  

  • बॉम्बे उच्च न्यायालय के अनुसार, गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत सत्र न्यायालय के पास सुधा भारद्वाज की हिरासत बढ़ाए जाने का उपयुक्त क्षेत्राधिकार नहीं थी।
  • बॉम्बे उच्च न्यायालय ने माना कि जब ‘राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) अधिनियम, 2008’ के तहत नामित एक विशेष अदालत पुणे में मौजूद थी, तो सत्र न्यायाधीश के पास 90 दिनों की निर्धारित अवधि से अधिक हिरासत बढ़ाने का अधिकार नहीं था। अतंत: उच्च न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि भारद्वाज को ‘डिफ़ॉल्ट जमानत’ दी जा सकती है।

क्या होती है डिफ़ॉल्ट जमानत?

  • आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सी.आर.पी.सी.) किसी जाँच को पूरा करने के लिये जाँच एजेंसियों द्वारा लिये जाने वाले समय-सीमा का निर्धारण करती है और इस दौरान आरोपी को हिरासत में रखा जा सकता है।
  • यदि जाँच एजेंसी निर्दिष्ट समय-सीमा का पालन करने में विफल रहती है, तो आरोपी जमानत का हकदार हो जाता है, जिसे साधारणतः 'डिफ़ॉल्ट' या 'रेगुलर' जमानत कहा जाता है। 
  • आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 167 के अंतर्गत उच्चतम श्रेणी के अपराधों के लिये हिरासत की अधिकतम अवधि 90 दिन है, जिसमें मृत्युदंड, आजीवन कारावास या कम से कम 10 वर्ष की सजा का प्रावधान हो। 
  • हालाँकि, ‘यू.ए.पी.ए. के अंतर्गत’ यदि जाँच एजेंसी किसी मामले की जाँच के लिये अतिरिक्त समय की माँग करती है तो न्यायालय आरोपी की हिरासत 180 दिनों तक बढ़ा सकती है।
  • वर्ष 2020 के ‘बिक्रमजीत सिंह बनाम पंजाब राज्य’ मामले में उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा था कि केवल किसी ‘विशेष न्यायालय’ के पास ही यू.ए.पी.ए. के तहत 180 दिनों तक हिरासत बढ़ाने का अधिकार क्षेत्र है।
  • इस प्रकार, यदि हिरासत में विस्तार कानूनी रूप से युक्तिसंगत नहीं था, तो आरोपपत्र दायर करने से पूर्व आरोपी को ‘डिफ़ॉल्ट जमानत’ प्राप्त करने का अधिकार था।

यू.ए.पी.ए. के तहत हिरासत की अवधि बढ़ाने सम्बंधी कानूनी प्रश्न और ‘विशेष न्यायाधीश’

  • वर्ष 2008 से पूर्व यू.ए.पी.ए. के तहत, सात वर्ष से अधिक के कारावास के लिये दंडनीय अपराधों की सुनवाई का अधिकार क्षेत्र सत्र न्यायालय के पास और सात वर्ष से कम के कारावास सम्बंधी अपराधों की सुनवाई का अधिकार क्षेत्र मजिस्ट्रेट के पास था। 
  • वर्ष 2008 में एन.आई.ए. अधिनियम के पारित होने के साथ-साथ यू.ए.पी.ए. में भी संशोधन किया गया। इसके अनुसार, सभी अनुसूचित (सूचीबद्ध) अपराधों की सुनवाई एन.आई.ए. अधिनियम के तहत केवल विशेष न्यायालयों के माध्यम से ही की जाएगी, चाहे जाँच एन.आई.ए. कर रही हो या राज्य सरकार की कोई जाँच एजेंसी।
  • यदि कोई निर्दिष्ट विशेष न्यायाधीश (न्यायालय) मौजूद नहीं हैं, तो इन मामलों पर सत्र न्यायालय (जो आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिये सर्वोच्च न्यायालय है) का अधिकार क्षेत्र होगा। 
  • एल्गर परिषद मामले में इस कानूनी प्रश्न का निर्धारण किया जाना था कि क्या हिरासत की अवधि में विस्तार का निर्णय उपयुक्त न्यायाधीश (विशेष न्यायाधीश) ने दिया था। आरोपी का तर्क था कि हिरासत में विस्तार का निर्णय उस अदालत (सत्र न्यायालय) के क्षेत्राधिकार से बाहर था क्योंकि जिन सत्र न्यायाधीशों ने अपराधों का संज्ञान लेते हुए हिरासत को बढ़ाया था, उन्हें केंद्र या महाराष्ट्र सरकार ने एन.आई.ए. अधिनियम के तहत ‘विशेष न्यायाधीश’ नियुक्त नहीं किया था।
  • जबकि उसी समय महाराष्ट्र सरकार ने पुणे ज़िले के लिये कुछ अतिरिक्त सत्र न्यायाधीशों को एन.आई.ए. अधिनियम की धारा 22 के तहत मामलों की सुनवाई के लिये विशेष न्यायाधीश/अतिरिक्त विशेष न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया था।
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