संदर्भ
हाल ही में, वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण अध्ययन में पाया है कि अत्यधिक विकिरण और सूखे के प्रति सहनशीलता के लिए प्रसिद्ध बैक्टीरिया ‘डाइनोकोकस रेडियोड्यूरान्स’ (Deinococcus radiodurans) ग्रह की सतह से विस्फोट के दौरान उत्पन्न होने वाले अत्यधिक दबाव को भी सहन कर सकता है।
अध्ययन के निष्कर्ष
- अध्ययन के अनुसार यह सूक्ष्मजीव लगभग 14,000 से 24,000 पृथ्वी वायुमंडलीय दबाव तक के तीव्र दबाव को झेलने में सक्षम है।
- यह खोज इस संभावना की ओर संकेत करती है कि कुछ सूक्ष्मजीव ग्रहों के बीच होने वाली अत्यंत कठोर परिस्थितियों में भी जीवित रह सकते हैं।
डाइनोकोकस रेडियोड्यूरान्स (Deinococcus radiodurans) बैक्टीरिया के बारे में
- डाइनोकोकस रेडियोड्यूरान्स (Deinococcus radiodurans) को विशेष रूप से आयनकारी विकिरण (Ionizing Radiation) के विनाशकारी प्रभावों के प्रति असाधारण प्रतिरोध के लिए जाना जाता है।
- यह एक ग्राम-पॉजिटिव बैक्टीरिया है अर्थात इसकी कोशिका भित्ति की संरचना विशेष प्रकार की होती है। साथ ही, यह स्वतः गति नहीं कर सकता (Non-motile) है और इसका रंग हल्का लाल या गुलाबी दिखाई देता है।
- इसकी खोज पहली बार 1956 में ऐसे डिब्बाबंद मांस में हुई थी जिसे जीवाणुओं को नष्ट करने के लिए विकिरणित किया गया था किंतु यह जीव उस प्रक्रिया के बावजूद जीवित पाया गया।
- इसकी असाधारण सहनशक्ति के कारण इसे प्राय: ‘Conan the Bacterium’ भी कहते हैं। यह इतनी अधिक विकिरण मात्रा को सहन कर सकता है जो मनुष्यों के लिए घातक मात्रा से हजारों गुना अधिक होती है।
- इसी कारण इसे पृथ्वी का सर्वाधिक विकिरण-सहिष्णु जीव माना जाता है।
असाधारण सहनशीलता का वैज्ञानिक कारण
- इसकी मजबूती के पीछे एक प्रमुख कारण सरल मेटाबोलाइट्स का समूह है जो मैंगनीज़ के साथ मिलकर एक अत्यंत शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट प्रणाली बनाता है। यह संयोजन विकिरण से होने वाली कोशिकीय क्षति को कम करने में मदद करता है।
- इसके अतिरिक्त इस बैक्टीरिया में डी.एन.ए. की मरम्मत करने की विशेष क्षमता होती है जिससे यह गंभीर क्षति के बाद भी स्वयं को पुनर्स्थापित कर सकता है।
- इसमें मौजूद थायोरेडॉक्सिन रिडक्टेज (Thioredoxin reductase) नामक एंजाइम टूटे हुए डी.एन.ए. तंतुओं को जोड़ने में सहायता करता है।
- यह क्षतिग्रस्त डी.एन.ए. के हिस्सों को हटाकर कोशिका को पुनः सामान्य बनाने में भी सक्षम है। इसके महत्वपूर्ण जीनों की अनेक प्रतियाँ भी मौजूद रहती हैं जिससे इसकी पुनर्प्राप्ति क्षमता अधिक बढ़ जाती है।
अत्यधिक परिस्थितियों में जीवित रहने की क्षमता
- इन विशेष जैविक गुणों के कारण यह बैक्टीरिया कई प्रकार की कठोर परिस्थितियों में भी जीवित रह सकता है, जैसे—
- अत्यधिक शुष्कन (Desiccation)
- भोजन की कमी या भूखमरी (Starvation)
- अत्यंत निम्न तापमान
- निर्जलीकरण
- निर्वात वातावरण (Vacuum)
- अम्लीय परिस्थितियाँ
- इन्हीं असाधारण क्षमताओं के कारण वैज्ञानिक चरम परिस्थितियों में जीवन (Extremophile Life) के अध्ययन और अंतरिक्ष में जीवन की संभावनाओं को समझने के लिए इस बैक्टीरिया को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं। यह शोध भविष्य में ग्रहों के बीच जीवन के संभावित प्रसार (Panspermia) जैसी अवधारणाओं को समझने में भी उपयोगी साबित हो सकता है।