हैदराबाद शहर से होकर गुजरने वाली मूसी नदी लगभग 55 किलोमीटर तक शहर के बीच से बहती है। वर्ष के अधिकांश समय यह नदी स्वच्छ जलधारा के बजाय एक खुले सीवेज नाले जैसी दिखाई देती है और केवल मानसून के दौरान इसमें पर्याप्त जल प्रवाह देखने को मिलता है। इस स्थिति को बदलने के उद्देश्य से तेलंगाना सरकार ने मूसी नदी को पुनर्जीवित करने और इसे साल भर बहने वाली नदी में परिवर्तित करने की योजना बनाई है। परियोजना के तहत नदी के किनारों को विकसित कर उन्हें मनोरंजन, पर्यटन और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में तैयार करने का प्रस्ताव है। हालांकि, इस योजना के साथ एक बड़ा सामाजिक मुद्दा भी जुड़ा है—नदी किनारे दशकों से रह रहे लोगों का संभावित विस्थापन।
मूसी नदी का भौगोलिक और ऐतिहासिक महत्व
मूसी नदी की कुल लंबाई लगभग 260 किलोमीटर है।
यह दो छोटी धाराओं—मूसा और एसी—के संगम से बनती है, जिनका उद्गम तेलंगाना के विकाराबाद जिले की अनंतगिरी पहाड़ियों में स्थित है।
वर्ष 1908 में आई विनाशकारी बाढ़ ने हैदराबाद शहर को भारी नुकसान पहुँचाया था। इसके बाद हैदराबाद रियासत के अंतिम आसफजाही शासक मीर उस्मान अली खान ने नदी के जल प्रवाह को नियंत्रित करने और बाढ़ की समस्या से निपटने के लिए उस्मान सागर और हिमायत सागर नामक दो जलाशयों का निर्माण कराया। ये दोनों जलाशय आज भी बाढ़ नियंत्रण और जल प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मूसी नदी विकास के पूर्व प्रयास
मूसी नदी को आधुनिक शहरी जलतट के रूप में विकसित करने का विचार नया नहीं है। इससे पहले भी कई सरकारों ने इस दिशा में पहल की है।
1997–98 में तेलुगु देशम पार्टी की सरकार ने नदी विकास की योजना बनाई।
2017 में भारत राष्ट्र समिति की सरकार ने भी इसी प्रकार का प्रस्ताव रखा।
वर्तमान में कांग्रेस सरकार इस परियोजना को व्यापक स्तर पर लागू करने की दिशा में काम कर रही है।
प्रस्तावित विकास योजना
सरकार की योजना के अनुसार नदी के 55 किलोमीटर लंबे हिस्से के दोनों किनारों पर बड़े पैमाने पर विकास कार्य किए जाएंगे। हालांकि, इस परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) अभी तक अंतिम रूप से स्वीकृत नहीं हुई है।
परियोजना के तहत गोदावरी नदी से मल्लन्ना सागर जलाशय के माध्यम से लगभग 2.5 टीएमसीएफटी पानी लाकर उस्मान सागर और हिमायत सागर जलाशयों में संग्रहित किया जाएगा। इसके बाद इस पानी को चरणबद्ध तरीके से छोड़ा जाएगा, ताकि मूसी नदी में पूरे वर्ष जल प्रवाह बना रहे।
प्रदूषण नियंत्रण के उपाय
मूसी नदी में प्रदूषण की समस्या को कम करने के लिए भी कई कदम प्रस्तावित किए गए हैं। वर्तमान में शहर के विभिन्न हिस्सों से बड़ी मात्रा में सीवेज सीधे नदी में गिरता है। इसे रोकने के लिए सरकार ने मौजूदा 31 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स के अतिरिक्त 39 नए संयंत्र स्थापित करने की योजना बनाई है, जिससे नदी में जाने वाले अपशिष्ट जल का उपचार किया जा सके।
अब तक की प्रगति
अक्टूबर 2024 में तेलंगाना सरकार ने परियोजना की विस्तृत योजना तैयार करने के लिए पाँच कंपनियों के एक कंसोर्टियम का गठन किया। इसके साथ ही नदी तल पर बसे झुग्गी बस्तियों के निवासियों को हटाने और उनके पुनर्वास की प्रक्रिया भी शुरू की गई, जिससे व्यापक विरोध सामने आया।
बाद में सरकार ने निर्णय लिया कि परियोजना की शुरुआत उन क्षेत्रों से की जाएगी जहाँ आबादी अपेक्षाकृत कम है। इस प्रारंभिक चरण में मूसा और एसी नदियों के लगभग 21 किलोमीटर लंबे हिस्से को शामिल किया गया है।
गांधी सरोवर परियोजना
परियोजना के अंतर्गत दोनों नदियों के संगम स्थल पर ‘गांधी सरोवर’ नामक एक विशाल सांस्कृतिक परिसर विकसित करने का प्रस्ताव है। इस परिसर के केंद्र में महात्मा गांधी की दुनिया की सबसे ऊँची प्रतिमा स्थापित करने की योजना भी प्रस्तुत की गई है।
मूसी रिवरफ्रंट विकास परियोजना के पहले चरण को एशियन डेवलपमेंट बैंक से सैद्धांतिक वित्तीय स्वीकृति मिल चुकी है, जबकि अंतिम स्वीकृति अभी लंबित है।
विरोध और विवाद
इस परियोजना को लेकर समाज के कई वर्गों में असंतोष भी देखने को मिल रहा है। वर्ष 2024 में झुग्गी बस्तियों के निवासियों की कथित जबरन बेदखली के बाद विरोध प्रदर्शनों ने संगठित रूप ले लिया।
नदी किनारे रहने वाले लोगों, सामाजिक संगठनों और कई कार्यकर्ताओं ने मिलकर ‘मूसी जन आंदोलन’ नामक मंच बनाया है। उनका कहना है कि नदी पुनर्जीवन की प्रक्रिया में स्थानीय निवासियों को समस्या के रूप में नहीं बल्कि सहभागी के रूप में देखा जाना चाहिए।
भूमि अधिग्रहण को लेकर नया विवाद
हाल ही में सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण की तीन अधिसूचनाएँ जारी किए जाने के बाद विवाद और बढ़ गया। नदी के संगम के पास स्थित एक गेटेड कम्युनिटी के निवासियों ने भी विरोध दर्ज कराया, क्योंकि उनकी संपत्तियों को ‘गांधी सरोवर’ परियोजना के लिए अधिग्रहण सूची में शामिल किया गया है।
आगे की संभावनाएँ
मूसी नदी पुनर्विकास परियोजना एक ओर शहरी सौंदर्यीकरण, पर्यटन और पर्यावरण संरक्षण की संभावनाएँ प्रस्तुत करती है, वहीं दूसरी ओर यह सामाजिक न्याय, पारदर्शिता और पुनर्वास से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठाती है। भविष्य में इस परियोजना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि विकास की प्रक्रिया में पर्यावरणीय संरक्षण और प्रभावित समुदायों के अधिकारों के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाता है।