संदर्भ
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भारत अपनी समृद्ध सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और बौद्धिक विरासत के लिए विश्वभर में जाना जाता है। इस विरासत में प्राचीन पांडुलिपियाँ, पुरातात्विक स्थल, स्मारक तथा अभिलेखीय दस्तावेज महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन धरोहरों के संरक्षण, प्रलेखन और प्रसार के लिए भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा कई महत्वपूर्ण पहलें की जा रही हैं। केंद्रीय बजट 2025–26 में घोषित ज्ञान भारतम पहल, पुरातात्विक स्थलों के संरक्षण के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग, स्मारकों के प्रबंधन में निजी सहभागिता तथा अभिलेखों के डिजिटलीकरण जैसे कदम इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास हैं।
ज्ञान भारतम पहल के बारे में
- केंद्रीय बजट 2025–26 के दौरान घोषित ज्ञान भारतम संस्कृति मंत्रालय की एक प्रमुख पहल है।
- इस कार्यक्रम का उद्देश्य भारत की विशाल पांडुलिपि विरासत की पहचान करना, उसका संरक्षण करना तथा उसे व्यापक रूप से उपलब्ध कराना है।
- इस पहल के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए स्थायी वित्त समिति (SFC) ने वर्ष 2025 से 2031 की अवधि के लिए 491.66 करोड़ रुपये की स्वीकृति प्रदान की है। इस राशि का उपयोग पांडुलिपियों से संबंधित विभिन्न गतिविधियों के लिए किया जाएगा।
- इन गतिविधियों में पांडुलिपियों का सर्वेक्षण और पंजीकरण, प्रौद्योगिकी अवसंरचना को मजबूत करना, संस्थागत साझेदारी का निर्माण, पांडुलिपियों का प्रलेखन और संरक्षण, डिजिटलीकरण एवं प्रकाशन, तथा क्षमता निर्माण और अनुसंधान जैसे कार्य शामिल हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के लिए बजटीय प्रावधान
- सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की महत्वपूर्ण भूमिका है। वर्ष 2026–27 के बजट में एएसआई के लिए बजटीय वृद्धि का प्रस्ताव रखा गया है। हालांकि, इसके संबंध में विनियोग विधेयक (2026–27) को अभी संसद की स्वीकृति और राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त होना शेष है।
पुरातात्विक अनुसंधान में आधुनिक तकनीकों का उपयोग
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एएसआई द्वारा पुरातात्विक स्थलों की खोज और उत्खनन के दौरान आधुनिक तकनीकों का व्यापक उपयोग किया जा रहा है। इनमें लिडार (LiDAR), ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (GPR) और ड्रोन सर्वेक्षण जैसी उन्नत तकनीकें शामिल हैं।
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इन तकनीकों के माध्यम से उत्खनन से पहले स्थल की संरचना और संभावित पुरातात्विक अवशेषों का अध्ययन किया जाता है। उदाहरण के रूप में राजगीर (बिहार), राखीगढ़ी (हरियाणा), भीष्मक नगर (अरुणाचल प्रदेश) और वारंगल किला (तेलंगाना) जैसे स्थलों पर खुदाई से पहले इन आधुनिक सर्वेक्षण तकनीकों का उपयोग किया गया है। आवश्यकता के अनुसार भविष्य में भी इन तकनीकों का प्रयोग किया जाता रहेगा।
संरक्षित स्मारकों से अतिक्रमण हटाने के प्रयास
- देश भर में केंद्र द्वारा संरक्षित स्मारकों के आसपास अतिक्रमण एक गंभीर चुनौती है। इसे रोकने के लिए एएसआई द्वारा सख्त कानूनी और प्रशासनिक कदम उठाए जाते हैं।
- एएसआई नियमित निरीक्षण करता है और अनधिकृत निर्माण या अतिक्रमण पाए जाने पर नोटिस जारी करता है। इसके लिए मुख्य रूप से प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल तथा अवशेष अधिनियम, 1958 तथा प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल तथा अवशेष नियम, 1959 के प्रावधानों के अंतर्गत कार्रवाई की जाती है। इसके अतिरिक्त सार्वजनिक परिसर (अनाधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम, 1971 के अंतर्गत भी अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया अपनाई जाती है।
एडॉप्ट ए हेरिटेज 2.0 कार्यक्रम
- राष्ट्रीय महत्व के संरक्षित स्मारकों में आगंतुक सुविधाओं को बेहतर बनाने के उद्देश्य से ‘एडॉप्ट ए हेरिटेज 2.0’ कार्यक्रम सितंबर 2023 में प्रारंभ किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों, गैर-सरकारी संगठनों, ट्रस्टों तथा सोसाइटियों के साथ साझेदारी स्थापित करना है, ताकि संरक्षित स्मारकों में पर्यटक सुविधाओं का विकास किया जा सके।
- इस कार्यक्रम के अंतर्गत साझेदार संस्थाओं की भूमिका केवल गैर-संरक्षण संबंधी गतिविधियों तक सीमित रहती है। इनमें स्मारक परिसर की स्वच्छता, शौचालय, पेयजल, बच्चों की देखभाल कक्ष, बैठने की व्यवस्था, मार्ग, कूड़ेदान, संकेतक पट्ट, ध्वनि-प्रकाश कार्यक्रम तथा प्रकाश व्यवस्था जैसी सुविधाओं का विकास और रखरखाव शामिल है। ये सभी कार्य एएसआई के मार्गदर्शन और परामर्श के तहत किए जाते हैं, जबकि स्मारकों के वास्तविक संरक्षण का कार्य एएसआई के विशेषज्ञों द्वारा ही किया जाता है।
अभिलेखों का डिजिटलीकरण और अभिलेख-पटल पोर्टल
- भारत की दस्तावेजी विरासत के संरक्षण और उसे व्यापक रूप से सुलभ बनाने के लिए भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार (NAI) ने एक महत्वपूर्ण डिजिटलीकरण पहल शुरू की है। इसके तहत ‘अभिलेख-पटल’ नामक ऑनलाइन पोर्टल विकसित किया गया है।
- इस पोर्टल के माध्यम से ऐतिहासिक दस्तावेजों और अभिलेखों को डिजिटल रूप में सुरक्षित किया जा रहा है और उन्हें वैश्विक स्तर पर उपलब्ध कराया जा रहा है। फरवरी 2026 तक इस पोर्टल पर 0.73 करोड़ संदर्भ सामग्री, 0.38 करोड़ डिजिटल अभिलेख तथा 18.23 करोड़ से अधिक पृष्ठ उपलब्ध कराए जा चुके हैं। इसके अतिरिक्त इस मंच पर 1,87,961 अद्वितीय आगंतुक और 35,167 पंजीकृत उपयोगकर्ता मौजूद हैं।
निष्कर्ष
- भारत सरकार द्वारा पांडुलिपियों के संरक्षण, पुरातात्विक स्थलों के वैज्ञानिक अध्ययन, स्मारकों के बेहतर प्रबंधन और अभिलेखों के डिजिटलीकरण के लिए कई महत्वपूर्ण पहलें की जा रही हैं। ज्ञान भारतम पहल, आधुनिक तकनीकों का उपयोग, अतिक्रमण के विरुद्ध सख्त कार्रवाई और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से अभिलेखों की उपलब्धता जैसे कदम देश की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।