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गरीबी रेखा का निर्धारण  

(प्रारंभिक परीक्षा : राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाओं से संबंधित प्रश्न)

(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र – 2; गरीबी एवं भूख से संबंधित विषय)

संदर्भ

हाल ही में प्रकाशित एक मीडिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि देश में वर्ष 2012 से 2020 के मध्य गरीबी में वृद्धि हुई है। इसके अनुसार, वर्ष 2020 में 7.6 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे चले गए हैं तथा गरीबों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है।

भारत में गरीबी रेखा

  • गरीबी रेखा का निर्धारण आय या उपभोग व्यय के आधार पर किया जाता है। इसका तात्पर्य एक ऐसे न्यूनतम उपभोग स्तर से है जो मूल मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये प्रत्येक व्यक्ति या परिवार को उपलब्ध होना चाहिये। यह रेखा जनसंख्या को निर्धन और गैर-निर्धन श्रेणियों के मध्य विभाजित करती है। भारत जैसे अपेक्षाकृत गरीब देश में यह रेखा सामान्यतः भुखमरी के स्तर को दर्शाती है।
  • भारत में गरीबी रेखा के निर्धारण का पहला आधिकारिक प्रयास योजना आयोग द्वारा वर्ष 1962 में किया गया। इसमें प्रतिव्यक्ति प्रतिमाह 20 रुपए से कम उपभोग व्यय करने वालों को गरीबी रेखा से नीचे माने जाने का सुझाव दिया गया।
  • आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992 -1997) में योजना आयोग ने कैलोरी मान के आधार पर गरीबी रेखा का निर्धारण किया। इसके अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन तथा शहरी क्षेत्रों में 2100 कैलोरी से कम प्राप्त करने वाले को गरीब माना गया।
  • वर्ष 2005 में सुरेश तेंदुलकर समिति का गठन किया गया। इसने वर्ष 2009 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसके अनुसार, भारत की 269 मिलियन की आबादी (कुल जनसंख्या का 21.9 प्रतिशत) गरीबी रेखा के नीचे है।
  • योजना आयोग द्वारा वर्ष 2012 में गठित रंगराजन समिति के अनुसार, वर्ष 2011-12 में देश की 29.5 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे थी। इस समिति ने ग्रामीण क्षेत्रों में 972 रुपए तथा शहरी क्षेत्रों में 1407 रुपए प्रतिव्यक्ति मासिक उपभोग को गरीबी रेखा के रूप में परिभाषित किया था।
  • सरकार द्वारा रंगराजन समिति के सुझावों पर विचार न किये जाने के कारण वर्तमान में तेंदुलकर समिति की अवधारणाओं का प्रयोग किया जा रहा है।

दोष 

गरीबी रेखा के अंतर्गत सभी निर्धनों को एक वर्ग माना जाता है। इससे निर्धनों एवं अति-निर्धनों के मध्य विभाजन संभव नही हो पाता। इसकी सहायता से सरकारी सेवाओं के लिये पात्र व्यक्तियों की पहचान तो हो जाती है परंतु यह ज्ञात नहीं हो पाता कि सबसे अधिक सहायता की आवश्यकता किन निर्धनों को है।

गरीबी रेखा के निर्धारण का उद्देश्य

  • गरीबी रेखा के निर्धारण से निर्धनों के विकास के लिये नीतियों के उचित निर्धारण में सहायता मिलती है। इससे गरीबों की आवश्यकताओं को लक्षित कर नीतियों का निर्माण किया जा सकता है। ऐसी नीतियाँ प्रकृति में प्रायः पुनर्वितरणकारी होती हैं, जैसे- रियायती दरों पर खाद्यान्न उपलब्ध कराना और मनरेगा जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का संचालन इत्यादि।
  • गरीबी रेखा का उचित निर्धारण न किये जाने से वास्तव में गरीबों की प्राथमिकताओं को लक्षित करने की सरकार की नीतियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इससे सरकार की नीति का फोकस एवं उद्देश्य परिवर्तित हो सकता है। साथ ही, गरीबी रेखा के उचित निर्धारण से उन लोगों की चिंताओं को दूर करने का एक उचित अवसर प्राप्त होता है जो समाज में आर्थिक रूप से अत्यंत पिछड़ी स्थिति में हैं।
  • सरकार द्वारा बनाई गई नीतियाँ गरीबों के लिये कितनी हितकारी हैं, सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि का गरीबी रेखा पर क्या प्रभाव पड़ा और इससे कितने निर्धन गरीबी रेखा से बाहर आए इत्यादि के मूल्यांकन में गरीबी रेखा सहायक सिद्ध होती है।

मीडिया रिपोर्ट के अंतर्गत वर्तमान आँकड़े

  • तेंदुलकर समिति के अनुसार, वर्ष 2004 से 2011 के मध्य, जब भारत ने तीव्र विकास दर प्राप्त की, गरीबी में 15 प्रतिशत की कमी देखी गई। यह 37 प्रतिशत से घटकर 22 प्रतिशत हो गई। इस अवधि में लगभग 14 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर आए।
  • वर्तमान आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2012 से 2020 के मध्य लगभग 76 मिलियन लोग गरीबी रेखा के अंदर आए हैं। इन आठ वर्षों में इतनी बड़ी संख्या में लोगों के गरीबी रेखा से नीचे आने के प्रमुख तीन कारण अधोलिखित हैं –
    • भारत की विकास दर में कमी – इसके लिये वर्ष 2016 में किये गए विमुद्रीकरण को विशेष रूप से ज़िम्मेदार माना गया है। वर्ष 2017 से 2020 के मध्य भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी की स्थिति भी बनी रही।
    • बेरोजगारी में वृद्धि -  वर्ष 2017-18 के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के अनुसार, इस अवधि में बेरोजगारी 45 वर्षों के उच्चतम स्तर पर थी। यह उपभोक्ता व्यय में गिरावट को दर्शाता है।
    • मजदूरी की दर में गिरावट वर्ष 2004 से 2011 के मध्य लाखों लोगों का गरीबी रेखा से बाहर निकलने का एक प्रमुख कारण गैर-कृषि क्षेत्र में रोज़गार एवं संबंधित मजदूरी में तीव्र वृद्धि थी। परंतु पिछले 8 वर्षों में, श्रमिकों के लिये वास्तविक मजदूरी में कमी आई है।
    • चूँकि यह आँकड़ें कोविड महामारी के प्रकोप के पहले के हैं, अतः गरीबी के आँकड़ों में और वृद्धि हो सकती है तथा यह संख्या बढ़कर 90 मिलियन हो सकती है।

निष्कर्ष     

गरीबी रेखा के निर्धारण में आय एवं उपभोग के अतिरिक्त अन्य कारकों, जैसे- बुनियादी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, पेयजल एवं स्वच्छता आदि की सुलभता तथा उन सामाजिक कारकों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिये, जो निर्धनता को जन्म देते हुए इसे निरंतर बनाए रखते हैं। इसके आलावा, सरकार द्वारा गरीबी से संबंधित आँकड़ों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिये और इन आँकड़ों के आधार पर गरीबी को कम करने से संबंधित उपाय किये जाने चाहिये। इसके लिये सरकार को वस्त्र एवं खाद्य प्रसंस्करण जैसे श्रम-गहन क्षेत्रो में रोज़गार सृजन पर ध्यान केंद्रित  करने की आवश्यकता है।  

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