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फ्लू गैस डी-सल्फराइज़ेशन

संदर्भ

हाल ही में, ऊर्जा मंत्रालय ने  तापीय शक्ति संयंत्रों (Thermal Power Plants) हेतु उत्सर्जन मानदंडों को अपनाने के लिये निर्धारित समयसीमा को आगे बढ़ा दिया है।

प्रमुख बिंदु

  • केंद्र सरकार ने इन संयंत्रों के लिये उत्सर्जन मानकों के पालन हेतु फ्लू गैस डी-सल्फराइज़ेशन (FGD) इकाइयों को स्थापित करने के लिये वर्ष 2017 की समयसीमा निर्धारित की थी।
  • एफ.जी.डी. इकाईयों को स्थापित करने का उद्देश्य थर्मल पावर प्लांटों से विषाक्त सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) को पृथक कर वायु की गुणवत्ता में वृद्धि करना है।
  • हालाँकि बाद में इस समयसीमा को विभिन्न क्षेत्रों के लिये (अलग-अलग समयसीमा के साथ) वर्ष 2022 तक बढ़ा दिया था।
  • नवीनतम प्रस्ताव के अनुसार अभी आगामी समयसीमा निर्धारित नहीं की गयी है।

फ्लू गैस डी-सल्फराइज़ेशन (FGD)

  • जीवाश्म ईंधन आधारित थर्मल प्लांटों तथा उत्सर्जक प्रक्रियायों में दहन के कारण निष्कासित सल्फर डाइऑक्साइड (SO2 ) तथा अन्य गैसीय प्रदूषकों को पृथक करने या उपचारित करने की प्रक्रिया फ्लू गैस डी-सल्फराइज़ेशन कहलाती है।
  • एफ.जी.डी. प्रक्रिया में आर्द्र स्क्रबिंग (Wet Scrubbing) तथा  ड्राई स्क्रबिंग (Dry Scrubbing) शामिल होती हैं।
  • आर्द्र स्क्रबिंग के अंतर्गत फ्लू गैसों को एक अवशोषक के संपर्क में लाया जाता है। यह अवशोषक तरल या ठोस सामग्री का घोल होता है, SO2 तथा अन्य गैसीय प्रदूषक इस अवशोषक में घुल जाते हैं।
  • ड्राई स्क्रबिंग में भी अवशोषण की प्रक्रिया होती है, जिसमें अवशोषक के रूप में चूना पत्थर के पाउडर का प्रयोग किया जाता है।
  • एफ.जी.डी. तकनीक गैसीय प्रदूषकों का उपचार कर वायु प्रदूषण की रोकथाम में प्रभावी योगदान देती है।
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