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वैश्विक वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट

संदर्भ

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund : IMF) ने नवीनतम वैश्विक वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट जारी की है जिसमें निरंतर उच्च मुद्रास्फीति, अनियमित ऋण बाजार में बढ़ती उधारी एवं वित्तीय संस्थानों पर बढ़ते साइबर हमलों से वैश्विक वित्तीय प्रणाली के जोखिमों के संबंध में चेतावनी दी गई है।

मुद्रास्फीति से संबंधित मुद्दे

  • आई.एम.एफ. के अनुसार, हाल के महीनों में केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दर कम करने की आशंका से निवेशक स्टॉक जैसी वित्तीय परिसंपत्तियों की कीमतों में निरंतर वृद्धि कर रहे हैं।
    • समान्यत: जब मुद्रास्फीति घटती है तो केंद्रीय बैंक आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के प्रयास में अर्थव्यवस्था में अधिक निवेश करके ब्याज दरों को कम करने का प्रयास करते हैं। 
    • यद्यपि केंद्रीय बैंकों ने अभी तक ब्याज दरें कम नहीं की हैं, लेकिन निवेशक घटती मुद्रास्फीति को एक संकेत के रूप में देख रहे हैं कि केंद्रीय बैंक जल्द ही ब्याज दरों को कम करने के लिए बाज़ारों में अधिक पैसा लाएँगे।
  • आई.एम.एफ. ने चेतावनी दी है कि पश्चिम एशिया और यूक्रेन में चल रहे युद्ध जैसे भू-राजनीतिक जोखिम से कुल आपूर्ति के प्रभावित होने से कीमतों में वृद्धि हो सकती है। 
    • यह केंद्रीय बैंकों को निकट भविष्य में ब्याज दरें कम करने से रोक सकता है।
  • आई.एम.एफ. का मानना है कि यदि ये जोखिम बने रहते हैं, तो निवेशक निकट भविष्य में अपना मन बदल सकते हैं। 
    • इससे विभिन्न संपत्तियों की कीमतों में तेज गिरावट आने से कई निवेशकों को काफी नुकसान हो सकता है।

भारत के लिए निहितार्थ

  • आई.एम.एफ. के अनुसार केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दरों को कम करने की आशा के कारण वित्तीय बाजारों में पूँजी का प्रवाह मजबूत है। 
  • कैलेंडर वर्ष 2023 में अमेरिका के बाद भारत विदेशी पूँजी का दूसरा सबसे बड़ा प्राप्तकर्ता था। 
    • ऐसे में अगर पश्चिमी केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को दीर्घावधि तक उच्च स्तर बनाए रखने का संकेत देते हैं तो निवेशक भारत जैसे उभरते बाजारों से पैसा निकाल सकते हैं और उनकी मुद्राओं पर दबाव बढ़ सकता है।
  • भारतीय रुपया पहले से ही कमजोर हो रहा है और भारतीय रिज़र्व बैंक के संभावित हस्तक्षेप के बावजूद अमेरिकी डॉलर के मुकाबले नए निचले स्तरों कू छू रहा है।
  • यदि पश्चिमी केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को कम करने में विफल रहते हैं तो पूँजी का गंभीर बहिर्वाह रुपये के और अधिक मूल्यह्रास का कारण बन सकता है जो देश की वित्तीय प्रणाली पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा।
    • ऐसे परिदृश्य में भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा ब्याज दरें बढ़ाकर तरलता पर अंकुश लगाने जैसा कदम उठा सकता है, जिससे अर्थव्यवस्था धीमी हो सकती है।

निजी ऋण बाज़ार की स्थिति 

  • आई.एम.एफ. की रिपोर्ट के अनुसार बढ़ता अनियमित निजी ऋण, एक बढ़ती हुई चिंता का विषय है। बाजार में उत्पन्न विसंगति भविष्य में वित्तीय प्रणाली को व्यापक रूप से प्रभावित कर सकती है।
    • अनियमित ऋण बाज़ार में गैर-बैंक वित्तीय संस्थान कॉर्पोरेट उधारकर्ताओं को ऋण देते हैं।
  • कॉर्पोरेट उधारकर्ताओं को ऋण देने वाले गैर-बैंक वित्तीय संस्थानों में पेंशन फंड एवं बीमा कंपनियां जैसे संस्थागत निवेशक शामिल हैं।
    • वर्तमान में, संस्थागत निवेशक निजी ऋण बाजार में निवेश कर रहे हैं क्योंकि वे सामान्य निवेश की तुलना में अधिक रिटर्न देते हैं।
  • वैश्विक स्तर पर निजी ऋण बाजार पिछले साल बढ़कर 2.1 ट्रिलियन डॉलर हो गया।

निजी ऋण बाज़ार की चुनौतियाँ 

  • निजी ऋण अन्य प्रतिभूतियों के समान खुले तरल बाजार में कारोबार नहीं करते हैं, इसलिए निवेशकों के लिए इन ऋणों में शामिल जोखिम का आकलन करना मुश्किल हो सकता है। 
    • बाजार में तनाव के समय निजी ऋण परिसंपत्तियों के बाजार मूल्य में काफी कम गिरावट होती है। 
  • सामान्य स्थितियों में प्रतिभूतियों के कारोबार वाले अत्यधिक तरल बाजार में ऋण के पीछे वास्तविक जोखिम का मूल्य निवेशकों द्वारा त्वरित एवं अधिक सटीक रूप से तय किया जाता है। 
    • फिर भी ऐसा हो सकता है कि संस्थागत निवेशक उच्च रिटर्न के बदले में जोखिम उठाने को पूरी तरह तैयार हों।

भारत में निजी ऋण की स्थिति

  • भारत ने वैकल्पिक निवेश कोष (Alternate Investment Fund : AIF) के उदय के साथ एक छोटे निजी ऋण बाजार की वृद्धि भी देखी है। 
  • ये फंड उच्च जोखिम वाले उधारकर्ताओं को पैसा उधार देते हैं जिन्हें पारंपरिक बैंकिंग प्रणाली एवं गैर-बैंक वित्तीय कंपनियों द्वारा पूरा नहीं किया जाता है। 
  • इस कोष ने संकटग्रस्त परिसंपत्तियों में भी निवेश किया है जो दिवाला एवं दिवालियापन संहिता व्यवस्था के तहत बिक्री के लिए आई हैं। 
  • सेबी के अनुसार इन फंडों के माध्यम से किया गया निवेश वर्ष 2018-19 में 1.1 लाख करोड़ से तीन गुना से बढ़कर वर्ष 2022-23 में 3.4 लाख करोड़ हो गया है। 
  • वित्तीय नियामकों के रूप में आर.बी.आई. और सेबी दोनों इस प्रवृत्ति को का आंकलन कर रहे हैं।
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