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हॉर्सशू क्रैब

प्रारंभिक परीक्षा 

(सामान्य विज्ञान)

मुख्य परीक्षा

(सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3 : विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- विकास एवं अनुप्रयोग और रोज़मर्रा के जीवन पर इसका प्रभाव)

संदर्भ 

  • हाल ही में भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) और ओडिशा वन विभाग ने ओडिशा राज्य के तट पर हॉर्सशू क्रैब (Horseshoe Crabs) की टैगिंग के लिए समझौता किया है।
  • यह देश में इस तरह का यह पहला प्रयास है। इसके तहत वैज्ञानिक अगले तीन वर्षों में हॉर्सशू क्रैब की को टैगिंग करेंगे। 

टैगिंग के लाभ  

  • इससे हॉर्सशू क्रैब के संरक्षण एवं प्रबंधन के लिए उनकी आबादी व आवास उपयोग से संबंधित समझ में वृद्धि होगी।
  • इससे मछली पकड़ने वाले हानिकारक जालों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
    • यद्यपि यह केकड़ा लोगों के आहार में शामिल नहीं है किंतु इसकी मौत मुख्यत: मछली पकड़ने वाले जालों के कारण होती है। अवैध तस्करी एवं जलवायु परिवर्तन भी इनके समक्ष मौजूद खतरे हैं। 

हॉर्सशू क्रैब के बारे में

  • ये केकड़े बिना किसी रूपात्मक परिवर्तन के पृथ्वी पर सबसे पुराने जीवित प्राणियों में से एक हैं।
  • ये केकड़े 450 मिलियन वर्षों से अधिक समय से अस्तित्व में हैं, अर्थात ये डायनासोर से भी पूर्ववर्ती हैं।

विशेषताएँ

  • हॉर्सशू क्रैब प्रागैतिहासिक केकड़ों की तरह दिखते हैं किंतु बिच्छुओं व मकड़ियों से ज़्यादा मिलते-जुलते हैं।
  • इनका शरीर तीन भागों में विभाजित होता है, जिसका पहला भाग सिर या प्रोसोमा (Prosoma), मध्य भाग उदर या ओपिसथोसोमा (Opisthosoma) और तीसरा भाग पूंछ या टेल्सन (Telson) है।
  • इस केकड़े का नाम ‘हॉर्सशू क्रैब’ घोड़े की नाल की तरह उसके सिर के गोल और यू-आकार के होने के कारण पड़ा है। 
  • इन केकड़ों के पूरे शरीर में नौ आंखें होती हैं और पूंछ के पास कई अन्य प्रकाश रिसेप्टर्स होते हैं।
  • इनका एक कठोर बाह्यकंकाल और 10 पैर होते हैं, जिनका उपयोग यह समुद्र तल पर चलने के लिए करते हैं।
  • मादा हॉर्सशू क्रैब नर से लगभग एक-तिहाई बड़ी होती हैं।

विस्तार 

  • दुनिया भर में हॉर्सशू क्रैब की तीन अन्य प्रजातियाँ हैं : अमेरिका के आसपास पाई जाने वाली ‘लिमुलस पॉलीपेमस’ (Limulus Polyphemus) और भारत की दो प्रजातियाँ ‘टैचीप्लस गिगास’ (Tachypleus Gigas) और ‘कार्सिनोस्कॉर्पियस रोटुंडिकाडा’ (Carcinoscorpius Rotundicauda) हैं।
    • ओलिव रिडले समुद्री कछुओं की तरह ये केकड़े मूलत: गहरे समुद्री जीव हैं। 
  • भारत में पाई जाने वाली दोनों प्रजातियाँ उत्तरपूर्वी तट पर, विशेष रूप से ओडिशा एवं पश्चिम बंगाल के तट पर पाई जाती हैं।
    • कार्सिनोस्कोर्पियस रोटुंडिकाडा पश्चिम बंगाल के सुंदरबन मैंग्रोव में पाए जाते हैं जबकि ओडिशा में टैचीप्लस गिगास और कार्सिनोस्कॉर्पियस रोटुंडिकाडा दोनों पाए जाते हैं। वस्तुतः ओडिशा तट पर हॉर्सशू क्रैब की अधिकतम आबादी पाई जाती है और बालासोर इनका सबसे बड़ा प्रजनन स्थल है। 

औषधीय दृष्टि से मूल्य  

  • हॉर्सशू क्रैब अपनी मजबूत प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए जाने जाते हैं और त्वरित निदान अभिकर्मकों (Rapid Diagnostic Reagents) की तैयारी के लिए इनका रक्त बहुत महत्वपूर्ण है। साथ ही, इन केकड़ों की मदद से इंजेक्शन व दवाओं का परीक्षण किया जाता है।
  • हॉर्सशू क्रैब के अभिकर्मक से एक अणु विकसित किया गया है जो प्री-एक्लेमप्सिया के इलाज में मदद करेगा और गर्भ में ही कई शिशुओं की जान बचाई जा सकेगी।

निदान अभिकर्मक

ये ऐसे रसायन होते हैं जिनका उपयोग प्रयोगशालाओं में विशिष्ट प्रकार के रोगजनकों, चयापचय असामान्यताओं, शारीरिक विसंगतियों एवं आनुवंशिक रोगों के निर्धारण में किया जाता है।

संरक्षण 

  • वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत अनुसूची 2 में शामिल  
  • IUCN स्थिति : आंकड़े पर्याप्त नहीं (DD) के रूप में सूचीबद्ध
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