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भारत-नेपाल सम्बंध – नए आयाम

(प्रारम्भिक परीक्षा- राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ ; मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2 : भारत एवं इसके पड़ोसी सम्बंध, द्विपक्षीय, क्षेत्रीय व वैश्विक समूह)

भूमिका

हाल ही में, सम्बंधों को सामान्य बनाने के क्रम में भारतीय विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने नेपाल की यात्रा की। विनाशकारी भूकम्प के बाद नेपाल में वर्ष 2015 में पांच महीने की नाकेबंदी के बाद से भारत और नेपाल के सम्बंध तनावपूर्ण रहे हैं। नेपाल के आर्थिक और राजनीतिक मामलों में चीन के बढ़ते हस्तक्षेप और भारत के साथ सीमा-विवाद के कारण भी दोनों देशों के मध्य सम्बंध सामान्य नहीं हैं।

एक-दूसरे के प्रति अपरिवर्तनशील दृष्टिकोण

  • भारत- नेपाल सम्बंध कभी भी विवाद मुक्त नहीं रहे हैं, क्योंकि दोनों पक्षों के दृष्टिकोण में अभी तक बदलाव नहीं आया हैं।
  • नेपाल के राजनेता और राजनीतिक दल राष्ट्रवादी होने और स्वंय को भारत-विरोधी दिखाने के लिये प्रयत्नशील रहते हैं, विशेषकर चुनाव से पहले ये इस तरह की भावना को बढ़ाते हैं और इस प्रतिस्पर्धा में लगे रहते हैं कि कौन अधिक राष्ट्रवादी हो सकता है।
  • वर्ष 2017 के चुनाव में प्रधानमंत्री के.पी. ओली ने स्वयं को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश किया जो नाकेबंदी के दौरान भारत के विरुद्ध खड़ा था और इससे चुनाव में उनको फायदा भी पहुँचा।
  • साथ ही, नेपाल के नक्शे में नया क्षेत्र जोड़कर उन्होंने फिर से राष्ट्रवादी भावनाओं को हवा दी। यह उनकी सरकार का कोविड-19 महामारी के दौरान खराब प्रबंधन से ध्यान हटाने का एक अच्छा प्रयास था।
  • भारत की सोच है कि वह नेपाल में सहायता व विकास परियोजनाओं को गति प्रदान करके नेपालियों के दिल में जगह बना सकता है, परंतु नेपाल में दशकों से अरबों रुपए लगाने के बावज़ूद भी ऐसा नहीं हो पाया है।

भारत और चीन द्वारा नेपाल को दी जाने वाली सहायता में नीतिगत अंतर

  • भारत और चीन द्वारा नेपाल को प्रदान की जाने वाली सहायता में नीतिगत अंतर के लिये दो मुद्दों को समझना जरूरी है।
  • सबसे पहले, भारत और चीन के अलावा अन्य देशों द्वारा नेपाल को दी जाने वाली सभी प्रकार की सहायता नेपाल सरकार की योजनाओं के माध्यम से दी जाती है। नेपाल में भारतीय सहायता को ऐसे रूप में देखा जाता है, जैसे भारत, नेपाल के नियोजित विकास में योगदान देने की बजाय उसका समर्थन प्राप्त करना चाहता है।
  • दूसरा, भारत को नेपाल के सरकारी बजट के बाहर सहायता प्रदान करने में चीन के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है और इसके लिये चीन धरातल पर दिखाई देने वाली व मूर्त परियोजनाओं के साथ-साथ रणनीतिक अवस्थिति की परियोजनाओं को चुनता है।
  • अप्रैल, 2015 के भूकम्प के बाद से नेपाल में चीनी भागीदारी बढ़ी है और नेपाल निश्चित रूप से चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव में रणनीतिक प्रभाव वाला एक क्षेत्र है।

भारत और नेपाल के मध्य जन-से-जन सम्पर्क

  • इस यात्रा के दौरान विदेश सचिव ने जन-से-जन सम्पर्क का मुद्दा उठाया, जो कि एक स्वागत योग्य कदम है। हालाँकि, इसमें पिछले दो दशकों में दो महत्त्वपूर्ण परिवर्तन देखे गए हैं।
  • पहला यह कि नेपाल के श्रम कार्यबल में भारत एक बड़ा हिस्सेदार है और उनके द्वारा प्रत्येक वर्ष लगभग 3 बिलियन डॉलर भारत भेजा जाता हैं। भारत को धन-प्रेषण के मामले में नेपाल आठवें स्थान पर है, इसलिये सरकार को यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि भारत में कई परिवारों की जीविका नेपाल से प्रेषित धन पर निर्भर करती है।
  • चूँकि पिछले 20 वर्षों में नेपालियों ने सौ से अधिक देशों में प्रवास किया है अत: यह भी समझने की आवश्यकता है कि अब नेपाली नौकरियों या शिक्षा के लिये भारत पर अधिक निर्भर नहीं रहे है।
  • नेपाल की लगभग तीन-चौथाई आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। इनसे जुड़ाव के लिये भारत को अब अलग तरीके से रणनीति बनाने की आवश्यकता है।
  • साथ ही, नेपाल को भी भारतीय युवाओं जुड़ने का प्रयास करना चाहिये।

जन-से-जन सम्पर्क (People-to-people ties)

  • 'पीपुल-टू-पीपल' सम्पर्क का अर्थ है दो देशों के आम नागरिकों के मध्य विभिन्न स्तरों पर बिना किसी आधिकारिक हस्तक्षेप और मार्गदर्शन के बातचीत। हालाँकि, इस तरह के सम्पर्क के लिये उन्हें उचित वीज़ा और यात्रा दस्तावेज प्राप्त करने होते हैं, परंतु उसके बाद राज्य की भूमिका वहीं समाप्त हो जाती है।
  • इस तरह के सम्पर्क पेशेवर निकायों, जैसे- बार काउंसिल, व्यापारिक मंडलों व संघों, उद्योगपतियों के समूहों, शैक्षिक संस्थानों व कलाकारों, संगीतकारों, गायकों, फिल्मी हस्तियों, खिलाड़ियों और महिलाओं आदि के माध्यम से हो सकते हैं।

प्रख्यात व्यक्तियों का समूह

  • पिछले पांच वर्षों में, सम्बंधों को सामान्य बनाने की दिशा में आशा की एकमात्र झलक ‘प्रख्यात व्यक्तियों के समूह’ (Eminent Persons Group) का निर्माण करना था। हालाँकि, इस समूह को रिपोर्ट प्रस्तुत करने के बाद भंग कर दिया गया था और इस रिपोर्ट पर आज तक कोई चर्चा नहीं हुई है।
  • विदेश सचिव ने अपने नवीनतम दौरे में ‘प्रख्यात व्यक्ति समूह’ के मुद्दे पर कोई बात नहीं की है। साथ ही, दोनों सरकारों द्वारा जारी किये गए संयुक्त बयान में भी कुछ नया नहीं है।

निष्कर्ष

कुछ बुनियादी बातों को ध्यान रखने की आवश्यकता है, जैसे दोनों देशों के भूगोल को नहीं बदला जा सकता है और दोनों देशों की सीमाएँ भी खुली रहेंगी, क्योंकि दोनों तरफ लाखों लोगों की आजीविकाएँ एक-दूसरे पर निर्भर हैं। इसके अतिरिक्त, चीन पड़ोस में विभिन्न हितों के साथ एक बड़ा वैश्विक नेता बनने की ओर अग्रसर है। इसी परिप्रेक्ष्य में भारत-नेपाल सम्बंधों को बेहतर करने के लिये विशेष रणनीति बनाने की आवश्यकता है।

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