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राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन : पर्यावरण संरक्षण, प्रशासनिक विफलता और सर्वोच्च न्यायालय की चिंता

  • हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में जारी अवैध रेत खनन के मामले पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लेते हुए राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकारों को कड़ी फटकार लगाई। 
  • न्यायालय ने कहा कि वर्षों से प्रतिबंधित होने के बावजूद अभयारण्य क्षेत्र में अवैध खनन का लगातार जारी रहना न केवल पर्यावरणीय कानूनों की अवहेलना है, बल्कि यह शासन-प्रशासन की विफलता तथा कानून के शासन (Rule of Law) के कमजोर पड़ने का भी संकेत है। 
  • न्यायालय ने विशेष रूप से राजस्थान सरकार के रवैये को "उदासीन, निष्क्रिय और गैर-जिम्मेदाराना" बताया तथा राज्यों को संरक्षण उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करने का निर्देश दिया।

अवैध रेत खनन क्या है ?

  • रेत को खनिज एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 (MMDR Act) के अंतर्गत "लघु खनिज" (Minor Mineral) की श्रेणी में रखा गया है। 
  • किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा आवश्यक लाइसेंस, खनन पट्टा, अन्वेषण अनुमति अथवा राज्य सरकार द्वारा निर्धारित नियमों का पालन किए बिना रेत या अन्य खनिजों का उत्खनन, भंडारण, परिवहन अथवा बिक्री करना अवैध खनन कहलाता है।
  • खनिज रियायत नियम, 2016 (Minerals Concession Rules, 2016) के अनुसार बिना वैध खनिज रियायत (Mineral Concession) के किसी भी प्रकार की खनन गतिविधि को अवैध माना जाता है। 
  • इसके अतिरिक्त MMDR अधिनियम की धारा 23C के तहत राज्य सरकारों द्वारा बनाए गए नियमों का उल्लंघन करते हुए खनिजों का उत्खनन या परिवहन भी अवैध खनन की श्रेणी में आता है।

अवैध रेत खनन के दुष्परिणाम

  • अवैध रेत खनन केवल एक आर्थिक अपराध नहीं है, बल्कि इसके व्यापक पर्यावरणीय, सामाजिक और प्रशासनिक प्रभाव होते हैं। 
  • नदी तल से अत्यधिक मात्रा में रेत निकालने से नदी की प्राकृतिक संरचना प्रभावित होती है, जिससे जल प्रवाह में परिवर्तन आता है और नदी किनारों का कटाव बढ़ जाता है। 
  • इससे जलीय जीवों के प्रजनन स्थलों का विनाश होता है तथा जैव विविधता को गंभीर क्षति पहुंचती है।
  • इसके अतिरिक्त अवैध खनन से सरकार को राजस्व की भारी हानि होती है। कई क्षेत्रों में खनन माफियाओं का प्रभाव इतना बढ़ जाता है कि वे प्रशासनिक अधिकारियों, वन कर्मियों और पुलिस बल पर हमले तक कर देते हैं। 
  • परिणामस्वरूप कानून-व्यवस्था की स्थिति प्रभावित होती है और स्थानीय समुदायों की आजीविका तथा सुरक्षा भी संकट में पड़ जाती है।

राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य : National Chambal Gharial Sanctuary

  • राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य की स्थापना वर्ष 1979 में चंबल नदी और उसके आसपास के पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण के उद्देश्य से की गई थी। यह अभयारण्य राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमाओं के संगम क्षेत्र में स्थित है तथा भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदी आधारित संरक्षित पारिस्थितिकियों में से एक माना जाता है।
  • चंबल नदी का जल अपेक्षाकृत स्वच्छ और प्रदूषणमुक्त है, जिसके कारण यह अनेक दुर्लभ और संकटग्रस्त जलीय जीवों के लिए आदर्श आवास प्रदान करती है। इस अभयारण्य में घड़ियाल, गंगा डॉल्फिन, रेड-क्राउन्ड रूफ्ड टर्टल, इंडियन स्किमर, सारस क्रेन, ब्लैक-बेलीड टर्न तथा कई अन्य संकटग्रस्त जीव प्रजातियाँ पाई जाती हैं।

चंबल नदी का पारिस्थितिक महत्व

  • चंबल नदी को गंगा बेसिन की सबसे महत्वपूर्ण और सर्वाधिक संरक्षित नदियों में गिना जाता है। ऐतिहासिक रूप से चंबल क्षेत्र बड़े शहरी और औद्योगिक विकास से अपेक्षाकृत दूर रहा, जिसके कारण इसकी प्राकृतिक स्थिति लंबे समय तक सुरक्षित बनी रही।
  • विशेषज्ञों के अनुसार चंबल नदी और इसके आसपास का वन क्षेत्र 550 से अधिक वन्यजीव प्रजातियों को आश्रय प्रदान करता है। यह नदी विश्व में घड़ियाल की सबसे बड़ी और सबसे व्यवहार्य प्रजनन आबादी (Breeding Population) का घर है। इसके अलावा यह रेड-क्राउन्ड रूफ्ड टर्टल तथा गंगा डॉल्फिन जैसी अत्यंत संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण के लिए भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है।
  • चंबल नदी कई संरक्षित क्षेत्रों के बीच वन्यजीव गलियारे (Wildlife Corridor) का भी कार्य करती है, जिससे विभिन्न प्रजातियों की आवाजाही और आनुवंशिक विविधता बनी रहती है।

घड़ियाल : चंबल का प्रमुख संरक्षित जीव

  • घड़ियाल भारतीय उपमहाद्वीप का एक अत्यंत विशिष्ट मगरमच्छ प्रजाति का सरीसृप है जिसकी पहचान इसकी लंबी और पतली थूथन से होती है। यह मुख्य रूप से मछलियाँ खाता है और स्वच्छ, गहरी तथा बहती हुई नदियों में निवास करता है।
  • आज घड़ियाल की अधिकांश शेष आबादी भारत की चंबल और गिरवा नदियों तथा नेपाल की राप्ती-नारायणी नदी प्रणाली में पाई जाती है।

संरक्षण स्थिति

  • IUCN रेड लिस्ट : Critically Endangered (अत्यंत संकटग्रस्त) 
  • CITES : Appendix-I 
  • वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 : अनुसूची-I 

घड़ियाल की संख्या में गिरावट के प्रमुख कारणों में नदी प्रदूषण, बांध निर्माण, मत्स्य संसाधनों में कमी तथा अवैध रेत खनन शामिल हैं।

सर्वोच्च न्यायालय की नाराजगी के कारण

  • मार्च 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया और राज्यों से जवाब तलब किया। 26 मई 2026 को दिए गए आदेश में न्यायालय ने पाया कि 2006 से अभयारण्य क्षेत्र में रेत खनन पर प्रतिबंध होने के बावजूद बड़े पैमाने पर अवैध खनन जारी है।
  • न्यायालय ने कहा कि यह स्थिति प्रशासन की निरंतर विफलता को दर्शाती है। विशेष रूप से राजस्थान सरकार के खिलाफ न्यायालय ने टिप्पणी की कि उसका रवैया "पूरी तरह से लापरवाह, उदासीन और निष्क्रिय" रहा है। न्यायालय ने यह भी कहा कि राज्यों द्वारा समय पर और प्रभावी कार्रवाई न किए जाने के कारण अभयारण्य की पारिस्थितिकी गंभीर खतरे में पड़ गई है।

खनन माफिया और कानून-व्यवस्था का संकट

  • चंबल क्षेत्र में अवैध रेत खनन का संचालन कई स्थानों पर संगठित खनन माफियाओं द्वारा किया जाता है। ये समूह आधुनिक मशीनों और वाहनों की सहायता से बड़ी मात्रा में रेत निकालते हैं तथा कई मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई का विरोध हिंसक तरीकों से करते हैं।
  • वर्ष 2012 में मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में एक भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारी की अवैध रेत ले जा रहे ट्रैक्टर द्वारा कुचलकर हत्या कर दी गई थी। इसके अतिरिक्त वर्ष 2025-26 में दो वन रक्षकों की हत्या भी अवैध खनन से जुड़े मामलों में हुई।
  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) द्वारा गठित समिति ने 2022 में अपनी रिपोर्ट में बताया था कि खनन माफिया अभयारण्य के भीतर स्थित आंतरिक मार्गों का उपयोग करते हैं, उन्हें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है तथा वे हथियारों से लैस रहते हैं। यह स्थिति प्रशासन के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी है।

अभयारण्य क्षेत्र को कम करने के प्रयास

  • अवैध खनन को रोकने में असफल रहने के बाद कुछ राज्यों ने अभयारण्य क्षेत्र को ही कम करने का प्रयास किया।
  • मध्य प्रदेश सरकार ने वर्ष 2021 में चंबल और पार्वती नदियों के पांच हिस्सों में लगभग 292 हेक्टेयर क्षेत्र को खनन के लिए खोलने का प्रस्ताव दिया था। राज्य का तर्क था कि नियंत्रित खनन की अनुमति देने से वन विभाग को अवैध खनन रोकने में कम संसाधन खर्च करने पड़ेंगे।
  • इसके बाद जनवरी 2023 में राज्य ने 207 हेक्टेयर क्षेत्र को अभयारण्य से बाहर कर दिया, किंतु NGT के समक्ष उचित औचित्य प्रस्तुत न कर पाने के कारण फरवरी 2025 में यह निर्णय वापस लेना पड़ा।
  • इसी प्रकार राजस्थान सरकार ने दिसंबर 2025 में 732 हेक्टेयर क्षेत्र को खनन और शहरी विकास परियोजनाओं के लिए अभयारण्य से बाहर घोषित किया, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगा दी।

चंबल नदी पर अन्य बढ़ते दबाव

  • रेत खनन के अतिरिक्त चंबल नदी पहले से ही अनेक विकास परियोजनाओं के दबाव का सामना कर रही है। वर्ष 1960 में गांधी सागर बांध के निर्माण के बाद से चंबल बेसिन में कई बड़े, मध्यम और छोटे सिंचाई तथा जल परियोजनाएँ विकसित की गई हैं।
  • गांधी सागर, राणा प्रताप सागर, जवाहर सागर और कोटा बैराज सहित कई प्रमुख बांधों के निर्माण ने नदी के प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित किया है। भविष्य में भी अनेक नई परियोजनाओं की योजना बनाई जा रही है, जिससे नदी पारिस्थितिकी पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की संभावना है।

भारत में रेत की बढ़ती मांग और अवैध खनन

  • भारत में तेजी से बढ़ते शहरीकरण, आधारभूत संरचना निर्माण और रियल एस्टेट क्षेत्र के विस्तार के कारण रेत की मांग लगातार बढ़ रही है। खनन मंत्रालय द्वारा प्रकाशित 2018 के सैंड माइनिंग फ्रेमवर्क के अनुसार वर्ष 2016-17 में देश में रेत की मांग लगभग 700 मिलियन टन थी और इसमें प्रतिवर्ष 6-7 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान लगाया गया था।
  • हालांकि वैध उत्पादन मांग की तुलना में काफी कम है। मांग और आपूर्ति के बीच मौजूद यह बड़ा अंतर अवैध खनन को बढ़ावा देता है। चूंकि निर्माण कार्यों में अभी भी नदी की रेत का व्यापक उपयोग होता है, इसलिए नदियों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।

अवैध रेत खनन रोकने के लिए सरकारी उपाय

अवैध रेत खनन की समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने विभिन्न दिशानिर्देश और तकनीकी निगरानी तंत्र विकसित किए हैं।

  • सतत रेत खनन प्रबंधन दिशानिर्देश (2016) तथा प्रवर्तन एवं निगरानी दिशानिर्देश (2020) राज्यों को वैज्ञानिक और पर्यावरण-अनुकूल खनन के लिए मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
  • इसके अतिरिक्त Mining Surveillance System (MSS) के माध्यम से उपग्रह चित्रों की सहायता से खनन गतिविधियों की निगरानी की जाती है। Mineral Conservation and Development Rules, 2017 खनिजों के उत्पादन से लेकर परिवहन तक संपूर्ण लेखांकन सुनिश्चित करते हैं।
  • MMDR संशोधन अधिनियम, 2015 के अंतर्गत अवैध खनन के लिए कठोर दंड, भारी जुर्माना, पांच वर्ष तक कारावास तथा त्वरित सुनवाई के लिए विशेष न्यायालयों का प्रावधान किया गया है।
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