संदर्भ
- कोविड-19 महामारी के अपवाद को छोड़ दें, तो विगत एक दशक में भारत में मुद्रास्फीति का स्तर अपेक्षाकृत नियंत्रित एवं न्यून बना रहा था। तथापि, हालिया रुझान भारत की समष्टिगत अर्थव्यवस्था (Macroeconomy) के समक्ष पुनः एक गंभीर चुनौती प्रस्तुत कर रहे हैं। जून माह में थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित मुद्रास्फीति का 10% के समीप पहुँचना तथा विगत वर्ष दिसंबर की तुलना में मार्च से इसमें दर्ज की गई तीव्र वृद्धि, मुद्रास्फीति के पुनर्उभार का स्पष्ट संकेत देती है।
- पारंपरिक अर्थशास्त्रीय दृष्टिकोण के अनुसार मुद्रास्फीति को केवल मांग और पूर्ति के असंतुलन (Overheating) के परिप्रेक्ष्य में देखा जाता है। परंतु वर्तमान भारतीय संदर्भ में यह प्रश्न विचारणीय है कि क्या मांग-पूर्तिकारी कारक ही इस मुद्रास्फीति के एकमात्र निर्धारक हैं?
थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति के संघटक
डब्ल्यूपीआई मुद्रास्फीति में हालिया उछाल के कारणों को समझने के लिए इसके तीन मुख्य घटकों के योगदान का विश्लेषण आवश्यक है:
- प्राथमिक वस्तुएँ (Primary Articles): खाद्य, खनिज आदि।
- ईंधन एवं ऊर्जा (Fuel and Power): मुख्य रूप से आयातित कच्चे तेल पर निर्भर।
- निर्मित उत्पाद (Manufactured Products): औद्योगिक उत्पादन।
- विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि हालिया मुद्रास्फीतिकारी दबावों में सर्वाधिक योगदान ईंधन एवं ऊर्जा तथा निर्मित उत्पादों की श्रेणियों का रहा है। जहाँ एक ओर ईंधन एवं ऊर्जा की कीमतें बाह्य वैश्विक झटकों (अंतर्राष्ट्रीय कच्चे तेल के दाम) से संचालित होती हैं, वहीं दूसरी ओर निर्मित उत्पादों की कीमतों को समझने के लिए मूल्य-निर्धारण के संरचनात्मक सिद्धांतों का विश्लेषण आवश्यक है।
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थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) क्या है?
- थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) लेन-देन के प्रारंभिक चरण में थोक बिक्री के लिए वस्तुओं की कीमतों में औसत परिवर्तन को मापता है।
- डब्ल्यूपीआई के सूचकांक में तीन प्रमुख समूहों के अंतर्गत आने वाली वस्तुएं शामिल हैं: प्राथमिक वस्तुएं, ईंधन और बिजली तथा विनिर्मित उत्पाद। (वर्तमान 2011-12 श्रृंखला के सूचकांक में कुल 697 वस्तुएं शामिल हैं, जिनमें प्राथमिक वस्तुओं के लिए 117 वस्तुएं, ईंधन और बिजली के लिए 16 वस्तुएं और विनिर्मित उत्पादों के लिए 564 वस्तुएं शामिल हैं।)
- विनिर्मित उत्पादों के लिए बाजार-पूर्व मूल्य, कृषि उत्पादों के लिए मंडी मूल्य और खनिजों के लिए खान-पूर्व मूल्य को ट्रैक किया जाता है।
- डब्ल्यूपीआई में शामिल प्रत्येक वस्तु को दिया गया भार शुद्ध आयात के लिए समायोजित उत्पादन मूल्य पर आधारित होता है।
- थोक मूल्य सूचकांक में सेवाएं शामिल नहीं हैं।
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मूल्य-निर्धारण के संरचनात्मक अंतर: कालेकी का सिद्धांत
प्रसिद्ध पोलिश अर्थशास्त्री मिखाल कालेकी (Michal Kalecki) के संरचनावादी दृष्टिकोण (Structuralist Framework) के अनुसार:
- प्राथमिक वस्तुएँ (मांग-संचालित): कृषि एवं प्राथमिक उत्पादों का पूर्ति-वक्र (Supply Curve) अल्पकाल में लोचहीन (Inelastic) होता है। अतः इनकी कीमतें मांग और आपूर्ति के बेमेल होने से अत्यधिक प्रभावित होती हैं।
- औद्योगिक वस्तुएँ (लागत-संचालित): औद्योगिक/निर्मित उत्पादों के मामले में कीमतें मांग-पूर्तिकारी असंतुलन के बजाय उत्पादन लागत (Cost of Production) तथा उस पर तय लाभ-मार्जिन (Profit Markup) द्वारा निर्धारित होती हैं।
चूँकि अधिकांश कारखाने अपनी पूर्ण क्षमता (Full Capacity) से कम पर कार्य करते हैं, मांग में वृद्धि होने पर वे कीमतें बढ़ाने के बजाय उत्पादन में वृद्धि करते हैं। अतः औद्योगिक क्षेत्रक में मांग-प्रेरित मुद्रास्फीति (Demand-pull Inflation) के बजाय लागत-जन्य मुद्रास्फीति (Cost-push Inflation) का प्रभाव प्राथमिक होता है।
भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में व्यावहारिक निहितार्थ
सामग्री लागत का प्रभाव (Material Costs):
- भारतीय परिप्रेक्ष्य में, औद्योगिक लागत में वृद्धि का मुख्य कारण मजदूरी (Wage Cost) में वृद्धि न होकर सामग्री की लागत में वृद्धि होना है, क्योंकि भारतीय श्रम बाज़ार में श्रमिकों की मोलभाव क्षमता (Bargaining Power) सीमित है और वे अनिवार्यतः मूल्य-स्वीकारकर्ता (Price-takers) हैं।
तेल की कीमतों का संचार प्रभाव (Pass-through Effect):
- औद्योगिक उत्पादन में ऊर्जा एवं तेल सबसे महत्त्वपूर्ण इनपुट हैं। ईंधन और ऊर्जा की दरों में वृद्धि सीधे तौर पर निर्मित उत्पादों की उत्पादन लागत को बढ़ा देती है, जिससे लागत-जन्य मुद्रास्फीति का चक्र आरंभ होता है।
खाद्य मुद्रास्फीति एवं आपूर्ति संबंधी झटके:
- जलवायु परिवर्तन और अल नीनो (El Nino) के प्रभावस्वरूप अपर्याप्त मानसून जैसी प्रतिकूल परिस्थितियाँ कृषि आपूर्ति को बाधित करती हैं। ऐतिहासिक आंकड़े पुष्टि करते हैं कि देश में सूखा या प्रतिकूल मानसून सीधे तौर पर खाद्य मुद्रास्फीति को जन्म देता है।
नीतिगत अनुशंसाएँ (Policy Recommendations)
मुद्रास्फीति की संरचनात्मक प्रकृति को ध्यान में रखते हुए केवल पारंपरिक मौद्रिक नीतियों (Monetary Tools) पर निर्भर रहने के बजाय बहुआयामी एवं राजकोषीय रणनीतियों को अपनाना अनिवार्य है:
कृषि क्षेत्र का अव-युग्मन (Decoupling Agriculture):
- खाद्य सुरक्षा को मानसून की अनिश्चितताओं से मुक्त करने हेतु देश को कृषि अवसंरचना, विशेष रूप से बारहमासी सिंचाई प्रणालियों में भारी सार्वजनिक निवेश करने की आवश्यकता है।
प्रति-चक्रीय अप्रत्यक्ष कर नीति (Countercyclical Tax Policy):
- केवल मौद्रिक मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (Inflation Targeting) के भरोसे रहने के स्थान पर, सरकार को ईंधन दरों पर प्रति-चक्रीय कर नीति अपनानी चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने पर सीमा शुल्क (Customs Duty) एवं उत्पाद शुल्क (Excise Duty) में कटौती कर खुदरा कीमतों को स्थिर रखा जा सकता है।
निष्कर्ष
वर्तमान थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित मुद्रास्फीति मांग में अत्यधिक वृद्धि का परिणाम न होकर लागत-जन्य और आपूर्ति-बाधित झटकों का परिणाम है। अतः इसके स्थायी समाधान के लिए संरचनात्मक अवसंरचनात्मक सुधारों तथा लोचदार राजकोषीय नीतियों का सामंजस्य स्थापित करना समय की मांग है।