संदर्भ
- राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET-UG) में कथित अनियमितताओं और प्रश्नपत्र लीक की घटनाओं के विरोध में लगभग 12,000 प्रदर्शनकारियों द्वारा जंतर-मंतर से संसद भवन तक आयोजित संसद मार्च के उपरांत नई दिल्ली जिले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू की गई। पुलिस प्रशासन द्वारा अनुमति के अभाव का हवाला देते हुए प्रदर्शनकारियों को संसद मार्ग से पूर्व ही बैरिकेडिंग के माध्यम से रोक दिया गया।
- वस्तुतः इस घटनाक्रम ने एक बार फिर आपातकालीन निवारक शक्तियों के प्रयोग, नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार तथा प्रशासनिक नियंत्रण के मध्य संतुलन पर मौलिक बहस को जन्म दे दिया है।
वैधानिक ढांचा: असाधारण आपातकालीन शक्ति
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 (पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता, CrPC की धारा 144) कार्यपालक मजिस्ट्रेट (Executive Magistrate) को लोक व्यवस्था बनाए रखने हेतु त्वरित और निवारक आदेश पारित करने का असाधारण अधिकार प्रदान करती है।
- प्रयोग का आधार: जब मजिस्ट्रेट के पास यह मानने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हों कि तत्काल रोकथाम या त्वरित उपचार वांछनीय है।
- उद्देश्य: किसी व्यक्ति को विशिष्ट कार्य से अलग रखना ताकि मानव जीवन, स्वास्थ्य या सुरक्षा को खतरा, लोक शांति में व्यवधान, अथवा दंगे जैसी स्थितियों को रोका जा सके।
- प्रकृति: यह प्रावधान मूलतः एक अस्थायी और आपातकालीन उपाय है, जो किसी विशिष्ट तात्कालिक खतरे के निवारण हेतु अधिकतम दो माह की अवधि के लिए लागू किया जाता है।
व्यावहारिक प्रयोग एवं अनुभवजन्य अध्ययन
सामान्य जनधारणा के विपरीत कि धारा 163 (या पूर्ववर्ती 144) का उपयोग मुख्य रूप से राजनीतिक विरोध-प्रदर्शनों और जनसभाओं को प्रतिबंधित करने के लिए होता है, दिल्ली में इसके व्यावहारिक अनुप्रयोग पर किए गए एक अनुभवजन्य अध्ययन (The Use and Misuse of Section 144 CrPC - मार्च 2023) के निष्कर्ष चौंकाने वाले हैं:
1. प्रदर्शनों पर सीमित उपयोग:
- अध्ययन में शामिल लगभग 5,400 आदेशों में से केवल 1.5% (81 आदेश) गैर-कानूनी सभाओं को प्रतिबंधित करने से संबंधित थे।
2. दैनिक सूक्ष्म-प्रशासन का साधन (Tool for Micro-Governance):
- 25.6% आदेश: बैंकों, एटीएम, होटलों और सिनेमाघरों को सीसीटीवी कैमरे लगाने हेतु दिए गए निर्देश।
- 43% आदेश: कोरियर सेवाओं, साइबर कैफे और प्रयुक्त वस्तुओं (second-hand goods) के व्यापारियों को आगंतुकों/कर्मचारियों का रिकॉर्ड रखने हेतु जारी निर्देश।
- अन्य आदेश: धात्विक मांझा (पतंग का धागा), ड्रोन उड़ाने या विद्यालयों के समीप गुटखा/पान बिक्री पर प्रतिबंध।
3. वैधानिक सीमा का यांत्रिक नवीनीकरण (Mechanical Renewal):
- अध्ययन के अनुसार, दो माह की वैधानिक सीमा समाप्त होते ही इन आदेशों को साइक्लोस्टाइल (हूबहू नकल) रूप में बार-बार पुनः जारी कर दिया जाता है। यहाँ तक कि कोविड-19 महामारी के दौरान भी बंद संस्थानों हेतु इन आदेशों का स्वतः नवीनीकरण किया गया।
- यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए बनाई गई एक असाधारण शक्ति को पुलिस और जिला प्रशासन ने नियमित नियमन (routine administration) के साधन में परिवर्तित कर दिया है।
न्यायिक दृष्टिकोण एवं संवैधानिक मिसालें
सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि निवारक शक्तियों का मनमाना या नियमित प्रयोग असंवैधानिक है:
बाबूलाल पराते बनाम महाराष्ट्र राज्य (1961):
सर्वोच्च न्यायालय ने प्रावधान की संवैधानिक वैधता को तो सही ठहराया, किंतु यह स्पष्ट किया कि इस शक्ति का प्रयोग केवल लोक व्यवस्था को गंभीर और विशिष्ट खतरों से बचाने के लिए आपात स्थिति में ही किया जा सकता है। यह शक्ति असीमित या अनियंत्रित नहीं है।
मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (2018)
जंतर-मंतर क्षेत्र में सभी प्रकार के प्रदर्शनों पर लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध (Blanket Prohibition) को निरस्त करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि पूर्ण प्रतिबंध अनुचित है। अदालत ने अधिकारियों को पूर्ण प्रतिबंध के स्थान पर एक सहानुभूतिपूर्ण एवं विनियमित अनुमति तंत्र (Regulated Permission Mechanism) विकसित करने का निर्देश दिया।
प्रशासनिक शिथिलता पर टिप्पणी:
संसद के समीप सभाओं पर प्रतिबंध से जुड़ी एक अन्य याचिका में न्यायालय ने माना कि व्यावहारिक रूप से पुलिस अनुमति-आधारित प्रणाली को कभी अनुमति न देकर एक अप्रत्यक्ष पूर्ण प्रतिबंध में बदल देती है, जिसे स्पष्ट दिशानिर्देशों द्वारा सुधारा जाना आवश्यक है।
निष्कर्ष
जंतर-मंतर पर हालिया विरोध-प्रदर्शन के दौरान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 का प्रयोग यह रेखांकित करता है कि अनुच्छेद 19(1)(ख) के तहत नागरिकों को प्राप्त शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के एकत्र होने के मौलिक अधिकार तथा राज्य के लोक व्यवस्था बनाए रखने के दायित्व के बीच सूक्ष्म संतुलन की आवश्यकता है। असाधारण शक्तियों का नियमन और नियमित प्रशासनिक कार्यों के लिए सामान्य विधायी प्रक्रियाओं का पालन ही लोकतांत्रिक व्यवस्था की गरिमा को अक्षुण्ण रख सकता है।