चाबहार बंदरगाह : भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी, सामरिक हित और उभरती भू-राजनीतिक चुनौतियाँ
संदर्भ
हाल ही में अमेरिकी युद्ध सचिव (Secretary of War) पीट हेगसेथ द्वारा सोशल मीडिया पर साझा की गई एक तस्वीर, जिसमें अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान के चाबहार बंदरगाह के समुद्री नियंत्रण टावर (Maritime Control Tower) के क्षतिग्रस्त होने का दृश्य प्रदर्शित किया गया, जिसने भारत की सामरिक एवं आर्थिक चिंताओं को पुनः केंद्र में ला दिया है।
यद्यपि भारत के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत द्वारा संचालित शाहिद बेहिश्ती टर्मिनल को कोई प्रत्यक्ष क्षति नहीं पहुँची है, तथापि इस घटना ने चाबहार परियोजना के भविष्य, अमेरिकी प्रतिबंधों तथा भारत की क्षेत्रीय संपर्क (Connectivity) नीति पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।
भारत के लिए चाबहार का सामरिक महत्व
चाबहार बंदरगाह ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित उसका एकमात्र महासागरीय बंदरगाह है, जो सीधे हिंद महासागर से जुड़ा है तथा होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता को कम करता है।
इसके दो प्रमुख टर्मिनलों ‘शाहिद बेहिश्ती और शाहिद कलंतरी’ में से शाहिद बेहिश्ती टर्मिनल का संचालन भारत की इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) द्वारा ईरान के पोर्ट्स एंड मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन के साथ 10 वर्षीय नवीकरणीय समझौते के अंतर्गत किया जाता है।
भारत के लिए चाबहार का महत्व केवल एक बंदरगाह तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उसकी कनेक्ट सेंट्रल एशिया नीति, पड़ोस प्रथम (Neighbourhood First) तथा विस्तारित पड़ोस (Extended Neighbourhood) रणनीति का महत्वपूर्ण आधार है। यह भारत को पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान तथा मध्य एशिया तक वैकल्पिक एवं निर्बाध व्यापारिक पहुँच उपलब्ध कराता है, क्योंकि पाकिस्तान भारतीय वस्तुओं के पारगमन की अनुमति नहीं देता।
इसके अतिरिक्त, चाबहार अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) का एक महत्त्वपूर्ण घटक है, जो भारत को ईरान, रूस, मध्य एशिया तथा यूरोप से जोड़ने वाला बहु-मॉडल परिवहन नेटवर्क है। परिणामस्वरूप, यह परियोजना भारत की व्यापारिक प्रतिस्पर्धात्मकता, ऊर्जा सुरक्षा तथा यूरेशियाई क्षेत्र में सामरिक उपस्थिति को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
भारत का निवेश एवं परियोजना की प्रगति
भारत और ईरान ने मई 2024 में शाहिद बेहिश्ती टर्मिनल के संचालन एवं विकास हेतु 10 वर्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसने पूर्व के अल्पकालिक अनुबंधों का स्थान लिया।
परियोजना के अंतर्गत भारत ने बंदरगाह उपकरणों की आपूर्ति हेतु लगभग 120 मिलियन अमेरिकी डॉलर की अनुदान सहायता तथा 250 मिलियन अमेरिकी डॉलर की ऋण सहायता (Line of Credit) की प्रतिबद्धता व्यक्त की है।
अमेरिकी प्रतिबंधों से उत्पन्न वित्तीय जोखिमों को कम करने के उद्देश्य से भारत ने अपने निवेश का अग्रिम भुगतान किया तथा अपनी परिचालन हिस्सेदारी स्थानीय संस्थाओं को हस्तांतरित कर दिया।
वर्ष 2018 से चाबहार बंदरगाह 450 से अधिक जहाजों, 1.34 लाख से अधिक TEUs कंटेनरीकृत कार्गो तथा लगभग 8.7 मिलियन टन बल्क एवं सामान्य माल का संचालन कर चुका है, जो इसकी व्यावसायिक उपयोगिता को रेखांकित करता है।
अमेरिकी प्रतिबंध और भारत की चुनौतियाँ
चाबहार परियोजना पर अमेरिकी प्रतिबंध ईरान के विरुद्ध उसकी व्यापक आर्थिक एवं सामरिक नीति का हिस्सा हैं। वर्ष 2018 में अमेरिका के ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) से बाहर निकलने के बाद तेहरान पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए। यद्यपि प्रारंभ में अफगानिस्तान के मानवीय एवं आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए चाबहार को प्रतिबंधों से छूट प्रदान की गई थी, किंतु समय-समय पर इन छूटों की अनिश्चितता ने परियोजना की प्रगति को प्रभावित किया।
हाल में प्रतिबंध छूट समाप्त होने के बाद भारत की प्रत्यक्ष परिचालन भूमिका सीमित हो गई है। इससे परियोजना के वित्तपोषण, उपकरणों की आपूर्ति तथा भविष्य के निवेश पर अनिश्चितता बढ़ी है। विदेश मंत्रालय ने संकेत दिया है कि भारत इस विषय पर संबंधित पक्षों के साथ निरंतर संवाद बनाए हुए है।
भारत एवं ईरान के लिए व्यापक रणनीतिक महत्व
भारत के लिए चाबहार केवल व्यापारिक सुविधा नहीं, बल्कि ग्वादर बंदरगाह (पाकिस्तान) के रूप में विकसित हो रहे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के संतुलन का भी माध्यम है। ग्वादर और चाबहार के बीच लगभग 140 किलोमीटर की दूरी इन्हें क्षेत्रीय सामरिक प्रतिस्पर्धा का प्रतीक बनाती है।
वहीं ईरान के लिए चाबहार सिस्तान-बलूचिस्तान क्षेत्र के आर्थिक विकास का प्रमुख आधार है तथा यह मध्य एशिया, अफगानिस्तान और रूस के लिए समुद्री प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करता है। इसलिए यह बंदरगाह दोनों देशों की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और आर्थिक रणनीति का अभिन्न अंग है।
उभरती भू-राजनीतिक चुनौतियाँ
अमेरिकी सैन्य कार्रवाई तथा प्रतिबंधों की अनिश्चितता ने चाबहार परियोजना के भविष्य को जटिल बना दिया है। यदि भारत की भूमिका सीमित होती है और चीन ईरान में अपनी आर्थिक एवं सामरिक उपस्थिति को और सुदृढ़ करता है, तो क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन भारत के प्रतिकूल हो सकता है।
इसके अतिरिक्त, केंद्रीय बजट 2026–27 में चाबहार परियोजना के लिए पृथक आवंटन का अभाव भी भविष्य की नीति को लेकर प्रश्न उत्पन्न करता है। यदि परियोजना अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ती, तो भारत अफगानिस्तान एवं मध्य एशिया तक अपने सबसे महत्वपूर्ण गैर-पाकिस्तानी संपर्क मार्ग को कमजोर होते हुए देख सकता है।
आगे की राह
भारत को चाबहार परियोजना के संदर्भ में बहुआयामी रणनीति अपनाने की आवश्यकता है। इसके अंतर्गत अमेरिका के साथ प्रतिबंध संबंधी व्यावहारिक समाधान खोजने, ईरान के साथ दीर्घकालिक सहयोग को बनाए रखने, चाबहार अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) को शीघ्र क्रियान्वित करने तथा मध्य एशिया के साथ आर्थिक साझेदारी को सुदृढ़ करने की दिशा में प्रयास आवश्यक हैं। साथ ही, परियोजना के लिए वित्तीय एवं संस्थागत समर्थन को निरंतर बनाए रखना भी महत्वपूर्ण होगा।
निष्कर्ष
चाबहार बंदरगाह भारत की विदेश नीति, क्षेत्रीय संपर्क, ऊर्जा सुरक्षा तथा यूरेशियाई रणनीति का आधारभूत स्तंभ है। यह परियोजना भारत को पाकिस्तान पर निर्भरता से मुक्त वैकल्पिक संपर्क मार्ग उपलब्ध कराने के साथ-साथ चीन की बढ़ती क्षेत्रीय उपस्थिति के संतुलन का भी माध्यम है।
वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियों में चाबहार का भविष्य केवल भारत-ईरान संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हिंद महासागर क्षेत्र, मध्य एशिया तथा व्यापक इंडो-पैसिफिक रणनीति में भारत की दीर्घकालिक भूमिका को भी प्रभावित करेगा। अतः भारत के लिए आवश्यक है कि वह सामरिक स्वायत्तता, बहुपक्षीय कूटनीति तथा आर्थिक हितों के मध्य संतुलन स्थापित करते हुए इस परियोजना को दीर्घकालिक दृष्टि से आगे बढ़ाए।