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भारत की मध्य एशिया में पहुँच

(प्रारंभिक परीक्षा : राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ)
(मुख्य परीक्षा : सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2 अंतर्राष्ट्रीय संबंध- भारत एवं इसके पड़ोसी संबंध; द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले करार)

संदर्भ

अफगानिस्तान की नाटकीय पारिस्थितियों ने उसके पडोसी देशों की भू-रणनीतिक तथा भू-आर्थिक चिंताओं को उत्प्रेरित किया है। इस संदर्भ में भारत ने मध्य एशिया और काकेशस देशों के साथ अपने द्विपक्षीय और क्षेत्रीय संबंधों को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता महसूस की है।

मध्य एशिया में भारत की बढ़ती उपस्थति

  • हाल ही में, भारत ने किर्गिस्तान में विकास परियोजनाओं के लिये $ 200 मिलियन का लाइन ऑफ क्रेडिट प्रदान किया है। साथ ही, उच्च प्रभाव वाली सामुदायिक विकास परियोजनाओं (HICDP) से संबंधित एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर भी हस्ताक्षर किया है।
  • विगत माह विदेश मंत्री ने कज़ाखस्तान की राजधानी नूर सुल्तान में ‘एशिया में बातचीत और विश्वास-निर्माण उपाय’ (CICA) वार्ता के छठे संस्करण में भाग लिया। यह इस क्षेत्र में चार माह के दौरान विदेश मंत्री का तीसरा दौरा था।
  • सी.आई.सी.ए. में भारत ने ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) को विस्तार देने के चीन के तरीकों की निंदा करते हुए कहा कि ‘क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देने के लिये अधिक से अधिक कनेक्टिविटी आवश्यक है, लेकिन इसे संकीर्ण हितों से प्रेरित होकर विस्तार नहीं दिया जाना चाहिये’। साथ ही, भारत ने इस मंच से सीमा पार आतंकवाद के समर्थन के लिये पाकिस्तान की कड़ी आलोचना की है।
  • हाल ही में, भारतीय विदेश मंत्री ने आर्मेनिया की यात्रा की। यह किसी भी भारतीय विदेश मंत्री की पहली आर्मेनिया यात्रा है। इस दौरान दोनों देश व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ावा देने के लिये सहमत हुए हैं।
  • भारत ‘यूरोपीय सुरक्षा और सहयोग संगठन’ (OSEC) के मिंस्क समूह के अंतर्गत अज़रबैजान और आर्मेनिया के बीच नागोर्नो-कराबाख संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन करता है।
  • भारत मध्य एशिया में अपनी पहुँच को विस्तार देने के लिये उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) में ईरान के रणनीतिक चाबहार बंदरगाह को शामिल किये जाने का प्रयास कर रहा है।
  • हाल ही में, भारत ने 'अफगानिस्तान पर दिल्ली क्षेत्रीय सुरक्षा वार्ता' की मेजबानी की है, जिसमें सात अन्य देशों (रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान) के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों ने हिस्सा लिया है।
  • वार्ता में सुरक्षा प्रमुखों द्वारा अफगानिस्तान से उत्पन्न सुरक्षा चिंताओं और व्यावहारिक सहयोग के विषयों, जैसे- खुफिया जानकारी साझा करना, सूचना एकत्रित करना एवं आतंकवाद विरोधी क्षमता-निर्माण पर चर्चा की गई। वास्तव में यह बदलते संबंधों के नए आयाम ही हैं, जिन्होंने इन सभी देशों को एक मंच पर इकठ्ठा किया है।

शंघाई सहयोग संगठन: कितना प्रासंगिक

  • अफगानिस्तान पर अपना वर्चस्व पुनः स्थापित कर तालिबान ने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की कमियों को उजागर किया है, जो वस्तुतः अफगानिस्तान से उत्पन्न आतंकवाद के खतरों की प्रतिक्रिया के तौर पर बनाया गया था।
  • अधिकांश सदस्य देशों द्वारा एस.सी.ओ. का उपयोग अपने क्षेत्रीय भू-रणनीतिक और सुरक्षा हितों के लिये किया जाता रहा है, जिससे इस समूह के अंतर्गत विश्वास में कमी और टकराव में वृद्धि हुई है।
  • एस.सी.ओ. सामूहिक रूप से अफगानिस्तान की चुनौतियों का सामना करने में विफल रहा है। फलतः मध्य एशियाई देशों ने अगस्त माह के दौरान तुर्कमेनिस्तान में अफगानिस्तान की चुनौतियों पर समीक्षा बैठक की, जिसके अंतर्गत अफगानिस्तान के भीतर और उससे संलग्न सीमाओं पर मध्य एशियाई आतंकवादी समूहों की उपस्थिति पर चिंता व्यक्त की गई।

संबंधों के बदलते आयाम

  • सोवियत संघ के विघटन से मध्य एशियाई देश स्वतंत्र गणराज्य के तौर पर उभरने लगे।  परिणामस्वरूप इस रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र के साथ भारत ने अपने संबंधों को नए सिरे से स्थापित करने के उद्देश्य से इन्हें वित्तीय सहायता प्रदान की और राजनयिक संबंध स्थापित किये। 
  • इसी क्रम में, भारत ने रक्षा सहयोग को प्रोत्साहित करने और व्यापार संबंधों को प्रगाढ़ बनाने के लिये कज़ाखस्तान, ताज़िकिस्तान और उज़बेकिस्तान के साथ एक रणनीतिक साझेदारी समझौता (SPA) स्थापित किया।
  • वर्ष 2012 में, भारत की 'कनेक्ट सेंट्रल एशिया' नीति का उद्देश्य इस क्षेत्र के साथ भारत के राजनीतिक, आर्थिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को आगे बढ़ाना था। हालाँकि, भारत के प्रयासों को पाकिस्तान द्वारा पहुँच मार्ग देने की अनिच्छा के कारण रोक दिया गया था। इस स्थिति का फायदा उठा कर चीन ने कज़ाखस्तान में बहुप्रतीक्षित बी.आर.आई. की शुरुआत की।
  • बी.आर.आई. के अंतर्गत चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) ने भारत की संप्रभुता का उल्लंघन कर, भू-रणनीतिक और सुरक्षा चिंताओं में वृद्धि कर भारत की सुरक्षा और विदेश नीति को फिर से निर्धारित करने के लिये प्रेरित किया।
  • जुलाई 2015 में भारतीय प्रधानमंत्री ने सभी मध्य एशियाई देशों का दौरा किया। परिणामतः मध्य एशिया वह कड़ी बन गया जिसने यूरेशिया को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत के पक्ष में कर रखा है।
  • सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में चाबहार बंदरगाह को विकसित करने के लिये वर्ष 2015 में भारत ने ईरान के साथ समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किये, जो वर्ष 2003 से उदासीनता में था।
  • अधिकांश मध्य एशियाई देश भारत के चाबहार बंदरगाह को अपने निर्यात बाज़ारों में विविधता लाने और चीन की महत्त्वाकांक्षाओं को नियंत्रित करने वाले अवसर के रूप में देखते हैं।
  • साथ ही शिनजियांग में उइगर मुस्लिमों के साथ चीन के कड़े रवैये ने मध्य एशियाई देशों के अंदर सामाजिक असंतोष को जन्म दिया है जिससे इन देशों में चीन के प्रति स्वाभाविक नकारात्मक रुझान देखा जा सकता है।

आगे की राह

  • मध्य एशियाई देश भारत को एक भागीदार के रूप में शामिल करना चाहते हैं क्योंकि इन्हें अपने रणनीतिक संबंधों में विविधता लाने की आवश्यकता महसूस हो रही है।
  • भारत को वर्ष 2018 में अश्गाबात समझौते के अंतर्गत शामिल किया गया है, जिससे भारत को मध्य एशिया और यूरेशिया के साथ अपना व्यापार बढ़ाने के साथ इस क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों तक पहुँच सुलभ हुई है।
  • इस क्षेत्र के भीतर चीन विरोधी भावनाओं में वृद्धि और तालिबान से सुरक्षा खतरों ने भारत और मध्य एशिया को अपनी भागीदारी बढ़ाने की अनुमति दी है। अतः भारत को इस अवसर का लाभ उठाना चाहिये।
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