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मिस्र में भारतीय अभिलेख

संदर्भ 

  • हाल ही में École Française d’Extrême-Orient (EFEO) और लुसाने विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने मिस्र के थीबन नेक्रोपोलिस (वैली ऑफ द किंग्स) में एक युगांतरकारी खोज की है। यहाँ की छह प्राचीन कब्रों के भीतर तमिल-ब्राह्मी, संस्कृत और प्राकृत भाषा में लगभग 30 नए अभिलेखों का दस्तावेजीकरण किया गया है। 
  • यद्यपि इन कब्रों में मौजूद ग्रीक (यूनानी) अभिलेख 1926 से ही ज्ञात थे किंतु पहली से तीसरी सदी ईस्वी के बीच के ये भारतीय अभिलेख अब तक शोधकर्ताओं की नज़रों से ओझल रहे थे। यह खोज सिद्ध करती है कि प्राचीन काल में दक्षिण एशिया और भूमध्यसागरीय विश्व के बीच केवल व्यापारिक ही नहीं, बल्कि गहरे सांस्कृतिक संबंध भी थे। 
  • तमिल एपिग्राफी पर इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में ‘फ्रॉम द वैली ऑफ द किंग्स टू इंडिया: इंडियन इंस्क्रिप्शन्स इन इजिप्ट’ शीर्षक वाले एक पेपर के अनुसार जिन लोगों ने ये इंस्क्रिप्शन्स बनाए है, वे भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी, पश्चिमी एवं दक्षिणी क्षेत्रों से आए थे, जिनमें से ज़्यादातर लोग दक्षिण से थे।  “चिकाई कोणाङ

‘सिगाई कोर्रन’ (Cikai Koṟṟaṉ): एक नाम और इतिहास  

  • इन अभिलेखों में सबसे विशिष्ट नाम ‘सिगाई कोर्रन’ के रूप में उभरा है। यह नाम पाँच अलग-अलग कब्रों में आठ बार अंकित पाया गया।
    • प्रमुखता: एक स्थान पर यह नाम प्रवेश द्वार से लगभग चार मीटर की ऊँचाई पर उकेरा गया है जो स्पष्ट रूप से वहाँ अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के एक सचेत प्रयास को दर्शाता है।
    • सांस्कृतिक संगम: यह नाम स्वयं में एक हाइब्रिड (मिश्रित) संस्कृति का प्रतीक है। ‘सिगाई’ (Cikai) संभवतः संस्कृत के ‘शिखा’ (चोटी या मुकुट) से प्रेरित है जबकि ‘कोर्रन (कोणाङ)’ (Koṟṟaṉ) शुद्ध तमिल मूल का शब्द है जिसका अर्थ ‘विजयी’ या ‘राजा’ (कोट्टवन) से जुड़ा है। 
    • हालांकि, ‘सिगाई’ कोई सामान्य व्यक्तिगत नाम नहीं प्रतीत होता है किंतु दूसरा एलिमेंट ‘कोर्रन’ अधिक स्पष्ट तौर पर तमिल है। इसमें युद्ध से जुड़ी गहरी यादें हैं क्योंकि यह एक मूल शब्द ‘कोङराङ’ (koṟṟam) से निकला है जिसका अर्थ जीत व मारना है। यह मूल शब्द चेर योद्धा देवी कोङरावई (Koṟṟavai) और कोङरावङ (koṟṟavaṉ- राजा) में दिखता है।
  • कोर्रन नाम मिस्र में मिली अन्य कलाकृतियों में भी पाया गया है। यह नाम कोर्रपुमान (Koṟṟapumāṉ) में मिलता है, जो 1995 में लाल सागर के बंदरगाह शहर बेरेनिके में मिले एक मृद्भांड के टुकड़े पर अंकित है।
  • विद्वानों के अनुसार, यह नाम संगम कॉर्पस (संग्रह) में भी आता है जहाँ चेर राजा पिटाङ्कोङण (Piṭtāṅkoṟṟaṉ) को कभी-कभी सीधे ‘कोर्रन’ कहा गया है जिनकी प्रशस्ति ‘पुराणनूरु’ (Purananooru) में की गई है और बताया कि प्राचीन चेर राजधानी पुगलूर के अभिलेखों में ये मिलते-जुलते साक्ष्य दूसरी या तीसरी शताब्दी ई.पू. के हैं।

‘कोपां आया और उसने देखा’: एक जीवंत उपस्थिति 

  • एक अन्य अभिलेख में दर्ज वाक्य कोपां वर्त कंतन (Kopāṉ varata kantan) अर्थात ‘कोपां आया और उसने देखा’ ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
    • वैश्विक परंपरा: यह वाक्य संरचना ठीक वैसी ही है जैसी उस समय के ग्रीक यात्रियों द्वारा उपयोग की जाती थी। इससे पता चलता है कि भारतीय यात्री (ग्रीक के ज्ञान के साथ) वहाँ के लिए केवल विदेशी नहीं थे, बल्कि वे तत्कालीन ‘कॉस्मोपॉलिटन’ (विश्वनागरिक) संस्कृति का हिस्सा थे।
    • साहित्यिक जुड़ाव: ‘कोपां’, ‘चातन’ (Cātaṉ) और ‘किरण’ (Kiraṉ) जैसे नाम तमिलनाडु के प्राचीन संगम कालीन साहित्य और स्थानीय अभिलेखों में भी बहुतायत में मिलते हैं। 
    • तमिलनाडु के अम्मानकोविलपट्टी में भी कोपां नाम पाया गया है। 

उत्तर से दक्षिण तक: विविध भारतीय प्रतिनिधित्व 

  • अभिलेखों का विश्लेषण यह भी स्पष्ट करता है कि मिस्र पहुँचने वाले ये लोग केवल दक्षिण भारत तक सीमित नहीं थे।
    • भाषाई विविधता: 30 में से 20 अभिलेख तमिल-ब्राह्मी में हैं जबकि शेष संस्कृत, प्राकृत एवं गांधारी-खरोष्ठी में हैं।
    • शासकीय संबंध: एक संस्कृत अभिलेख में पश्चिमी भारत के ‘क्षहरात’ (Kshaharata) वंश के एक दूत का उल्लेख है। यह संकेत देता है कि इन मार्गों पर केवल व्यापारी ही नहीं, बल्कि राजनयिक व राजकीय प्रतिनिधि भी यात्रा कर रहे थे।  

व्यापार से पर्यटन तक: एक नया परिप्रेक्ष्य 

  • अब तक बेरनाइके (लाल सागर) को भारत-रोमन व्यापार का मुख्य केंद्र माना जाता था, जहाँ से काली मिर्च और रत्नों का आदान-प्रदान होता था। किंतु वैली ऑफ द किंग्स की यह खोज इसका विस्तार करती है-
    • यह दर्शाता है कि भारतीय यात्री तटों को छोड़कर नील घाटी के भीतर तक अर्थात मिस्र के सांस्कृतिक एवं धार्मिक केंद्रों तक पहुँच चुके थे।
    • वे वहाँ की ‘पर्यटन संस्कृति’ का हिस्सा बने और ग्रीक यात्रियों की तरह ही पवित्र स्थलों पर अपनी यादें अंकित कीं। 

निष्कर्ष

मिस्र की शुष्क जलवायु में ये अभिलेख दो हजार वर्षों तक सुरक्षित रहे। ये अभिलेख इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि प्राचीन भारतीय समाज कितना गतिशील और वैश्विक था। यह खोज न केवल तमिल-ब्राह्मी के प्रसार को वैश्विक पटल पर रखती है बल्कि प्राचीन विश्व के इतिहास को फिर से लिखने की मांग करती है। 

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