चर्चा में क्यों ?
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का प्रभाव केवल तेल और गैस तक सीमित नहीं रह सकता। विशेषज्ञों के अनुसार क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता भारत के कई प्रमुख उद्योगों की आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर सकती है।

प्रमुख बिन्दु
- इस्पात, उर्वरक, सीमेंट, निर्माण और बिजली पारेषण जैसे क्षेत्र पश्चिम एशिया से आयात होने वाले कच्चे माल पर काफी निर्भर हैं।
- चूना पत्थर, सल्फर, जिप्सम, डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (DRI) और तांबे के तार जैसी महत्वपूर्ण औद्योगिक सामग्रियों के आयात में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी आधे से अधिक है।
- खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों सहित पश्चिम एशिया भारत का एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है।
- वर्ष 2025 में भारत ने इस क्षेत्र से लगभग 98.7 अरब डॉलर मूल्य का आयात किया था।
- ऊर्जा और लॉजिस्टिक सुविधाओं पर बढ़ते हमलों तथा वैश्विक व्यापार के महत्वपूर्ण मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य के संभावित बंद होने की आशंका ने आपूर्ति में व्यवधान के खतरे को और बढ़ा दिया है।
पश्चिम एशिया संघर्ष का ऊर्जा क्षेत्र से परे प्रभाव
- पश्चिम एशिया दुनिया के प्रमुख तेल और गैस आपूर्ति क्षेत्रों में से एक है, इसलिए यहां किसी भी प्रकार का संघर्ष वैश्विक ऊर्जा बाजार को तुरंत प्रभावित करता है।
- भारत के पास सीमित अवधि के लिए ही कच्चे तेल का रणनीतिक भंडार उपलब्ध है।
- ऐसे में भारतीय रिफाइनरी कंपनियों ने रियायती दरों पर उपलब्ध रूसी तेल का आयात बढ़ाना शुरू कर दिया है।
- यदि कतर से एलएनजी की आपूर्ति बाधित होती है, तो गैस कंपनियों को औद्योगिक उपयोग के लिए गैस की आपूर्ति में कटौती करनी पड़ सकती है।
उर्वरक, विनिर्माण और निर्यात पर संभावित प्रभाव
- यदि होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाली समुद्री आपूर्ति बाधित होती है, तो इसका असर ऊर्जा क्षेत्र से आगे बढ़कर कई अन्य उद्योगों पर भी पड़ सकता है।
- विशेषज्ञों के अनुसार उर्वरक उद्योग, विनिर्माण क्षेत्र के कच्चे माल, निर्माण सामग्री तथा हीरा निर्यात उद्योग को आपूर्ति संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
निर्माण क्षेत्र की भेद्यता
- भारत का निर्माण और अवसंरचना क्षेत्र पश्चिम एशिया से आयात होने वाले कई खनिजों पर निर्भर करता है।
- चूना पत्थर:
- भारत ने लगभग 483 मिलियन डॉलर मूल्य का चूना पत्थर आयात किया, जिसमें से करीब 68.5% पश्चिम एशिया से आया।
- यह सीमेंट उत्पादन के लिए एक महत्वपूर्ण कच्चा माल है।
- जिप्सम:
- भारत ने लगभग 129 मिलियन डॉलर का जिप्सम आयात किया, जिसमें पश्चिम एशिया की हिस्सेदारी 62.1% रही।
- इसका उपयोग सीमेंट और अन्य निर्माण सामग्री में व्यापक रूप से किया जाता है।
- इन सामग्रियों की आपूर्ति बाधित होने से सीमेंट की कीमतें बढ़ सकती हैं और अवसंरचना परियोजनाओं में देरी हो सकती है।
उर्वरक और इस्पात उद्योगों के लिए जोखिम
- सल्फर:
- भारत ने पश्चिम एशिया से लगभग 420 मिलियन डॉलर मूल्य का सल्फर आयात किया, जो कुल आयात का लगभग 65.8% है।
- इसका उपयोग सल्फ्यूरिक एसिड के उत्पादन में होता है, जो उर्वरक और रसायन उद्योग के लिए आवश्यक है।
- डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (DRI):
- इस्पात उत्पादन के लिए उपयोग होने वाले DRI का लगभग 59.1% आयात पश्चिम एशिया से होता है, जिसकी कीमत करीब 190 मिलियन डॉलर है।
हीरा प्रसंस्करण उद्योग पर प्रभाव
- भारत का हीरा प्रसंस्करण उद्योग भी इस संकट से प्रभावित हो सकता है।
- भारत में हीरों की कटाई और पॉलिशिंग के लिए उपयोग किए जाने वाले 40% से अधिक कच्चे हीरे पश्चिम एशिया से आयात किए जाते हैं, जिससे यह उद्योग भी आपूर्ति व्यवधान के प्रति संवेदनशील हो जाता है।
इस्पात क्षेत्र पर ऊर्जा का दबाव
- विशेषज्ञों के अनुसार कुछ कच्चे माल के वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध हैं, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती ऊर्जा की बढ़ती और अस्थिर कीमतें हैं।
- यदि पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ता है तो तेल और गैस की कीमतों में वृद्धि हो सकती है, जिससे औद्योगिक उत्पादन लागत बढ़ेगी और इस्पात उद्योग पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।
वैकल्पिक कच्चे माल की उपलब्धता
- यदि पश्चिम एशिया से आपूर्ति बाधित होती है तो कुछ कच्चे माल अन्य देशों से भी प्राप्त किए जा सकते हैं।
- चूना पत्थर: थाईलैंड और वियतनाम
- डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (DRI): लीबिया और मलेशिया
- हालांकि ये विकल्प ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव की समस्या का समाधान पूरी तरह नहीं कर सकते।
इस्पात उद्योग की गैस पर निर्भरता
- भारत का इस्पात उद्योग डीकार्बोनाइजेशन की रणनीति के तहत प्राकृतिक गैस (एलपीजी और एलएनजी) पर तेजी से निर्भर होता जा रहा है।
- इस कारण वैश्विक गैस बाजार में होने वाली किसी भी बाधा का सीधा प्रभाव इस उद्योग पर पड़ सकता है। उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने चेतावनी दी है कि गैस और स्क्रैप की उपलब्धता पहले से ही इस्पात उत्पादकों के लिए चिंता का विषय बन चुकी है।
उर्वरक क्षेत्र पर संभावित प्रभाव
- फिलहाल उर्वरक क्षेत्र को तत्काल किसी बड़े संकट का सामना नहीं करना पड़ सकता क्योंकि यह मांग का ऑफ-सीजन है।
- हालांकि यदि एलएनजी और सल्फर की आपूर्ति में लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है तो घरेलू यूरिया उत्पादन और अगले कृषि सीजन के लिए इसकी उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
- इस जोखिम को कम करने के लिए उर्वरक उद्योग दक्षिण-पूर्व एशिया सहित अन्य क्षेत्रों में सल्फर जैसे इनपुट के वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की तलाश कर रहा है।
निष्कर्ष
पश्चिम एशिया में बढ़ता संघर्ष केवल ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव भारत के कई महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्रों पर पड़ सकता है। यदि आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान लंबे समय तक जारी रहता है तो इससे निर्माण, इस्पात, उर्वरक और निर्यात उद्योगों की लागत बढ़ सकती है तथा अवसंरचना परियोजनाओं में देरी हो सकती है। ऐसे में भारत के लिए कच्चे माल के वैकल्पिक स्रोत विकसित करना, आपूर्ति श्रृंखला को विविध बनाना और रणनीतिक भंडार को मजबूत करना बेहद आवश्यक हो गया है।