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आरक्षण प्रणाली के पुनरुद्धार की आवश्यकता

(प्रारंभिक परीक्षा :  भारतीय राज्यतंत्र और शासन- संविधान, राजनीतिक प्रणाली)
(मुख्य परीक्षा : सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 - केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।)

संदर्भ

  • ‘राष्ट्रीय पात्रता सह-प्रवेश परीक्षा’ (NEET) परीक्षा में अन्य पिछड़े वर्ग (OBC) के लिये आरक्षण स्वीकृत करने तथा जाति जनगणना पर एक नए सिरे से बहस ने पुनः ‘सकारात्मक कार्रवाई’ (Affirmative Action) को सुर्खियों में ला दिया है।
  • भारतीय गणतंत्र की स्थापना के समय जिस ‘सकारात्मक कार्रवाई कार्यक्रम’ की परिकल्पना की गई थी, वस्तुतः वह संविधान निर्माताओं द्वारा तैयार किये गए उल्लेखनीय प्रावधानों में से एक है।
  • यह प्रावधान ऐतिहासिक रूप से ‘असमान और दमनकारी’ सामाजिक व्यवस्था में ‘न्याय के सिद्धांत’ को प्रतिपादित करने के दृष्टिकोण से बेहद महत्त्वपूर्ण रहा है।

समता का अभाव

  • इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि यह प्रावधान भारतीय लोकतंत्र की प्रमुख ‘सफलताओं’ में से एक रहा है। लेकिन इस प्रावधान में समय के साथ कई समस्याएँ भी शामिल हो गई हैं, जिन पर तत्काल ध्यान देने और संवाद करने की आवश्यकता है।
  • राज्य के राजनीतिक और सार्वजनिक संस्थानों में आरक्षण के माध्यम से ये कल्पना की गई थी कि पीढ़ियों से उत्पीडन और अपमान झेलने वाले कमज़ोर वर्गों को ‘सत्ता तथा निर्णय-निर्माण’ में सहभागी बनाया जाए।
  • हालाँकि, अक्षमता दूर करने संबंधी इस रणनीति ने हमारे ‘विषम समाज’ के कई समूहों के जीवन में कोई रूपांतरण नहीं किया है।

वर्तमान नीति से संबंधित समस्याएँ

  • आरक्षण के दायरे में शामिल ऐसे वर्ग, जो आरक्षण का लाभ अर्जित करने में सक्षम नहीं है, उनकी तरफ से माँग की जा रही है कि उन्हें आरक्षण का लाभ पहुँचाने के लिये कोई वैकल्पिक नीति तैयार की जाए।
  • ‘ओ.बी.सी. के उप-वर्गीकरण पर रोहिणी आयोग’ की रिपोर्ट द्वारा जारी किये गए आँकड़े इन वर्गों की माँग को समझने के लिये एक बेहतर दृष्टिकोण प्रदान करते हैं।
  • विगत पाँच वर्षों के दौरान सरकारी नौकरियों में नियुक्ति और शैक्षिक संस्थानों में प्रवेश संबंधी ओ.बी.सी. के आँकड़ों के आधार पर आयोग ने निष्कर्ष निकाला है कि केंद्रीय ओ.बी.सी. कोटे का 97 प्रतिशत लाभ केवल 25 प्रतिशत जातियों ने ही उठाया है। 
  • 983 ओ.बी.सी. समुदायों में से कुल ओ.बी.सी.के 37 प्रतिशत का केंद्र सरकार की नौकरियों और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रवेश, दोनों में ‘शून्य प्रतिनिधित्व’ है। साथ ही रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि ओ.बी.सी. समुदायों की सिर्फ 10 प्रतिशत जातियों ने 24.95 प्रतिशत नौकरियों में नियुक्ति और शैक्षिक संस्थानों में प्रवेश संबंधी लाभ अर्जित किया है।
  • गौरतलब है कि रोहिणी आयोग के आँकड़े सिर्फ केंद्र सरकार के दायरे में आने वाले संस्थानों पर आधारित हैं। राज्य और समाज के स्थानीय स्तरों पर विभिन्न सामाजिक समूहों की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों पर शायद ही कोई ‘मूर्त आँकड़ें’ उपलब्ध हैं।
  • परिणामस्वरूप ‘आरक्षण के विषम वितरण’ ने ‘सबाल्टर्न एकजुटता’ की राजनीतिक परियोजनाओं को गंभीर रूप से बाधित किया है। वे राजनीतिक दल, जो कभी वंचित वर्ग को एकजुट करने में सक्षम थे, अब उनके लिये इस तरह का समर्थन हासिल करना मुश्किल हो रहा है।
  • इस परिघटना को ‘कथित निम्न जातियों’ की एकता तोड़ने की साजिश के रूप में देखने की बजाय इस समस्या पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

अपर्याप्त आँकड़े

  • जैसा कि रेखांकित किया गया है कि विभिन्न सामाजिक समूहों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति से संबंधित सटीक आँकड़ों की सख्त आवश्यकता है।
  • यद्यपि जाति-आधारित आरक्षण से सामाजिक गतिशीलता में वृद्धि तथा राजनीतिक तौर पर परिपक्व और दृश्यमान वंचित जातियों के कुछ लोगों का उद्भव हुआ है, फिर भी हमारे पास नीतिगत उपायों के लिये पर्याप्त आँकड़ें नहीं हैं।
  • इस संबंध में कोई अनुभवजन्य आँकड़ें उपलब्ध नहीं है कि उदारीकरण ने वंचित जातियों को कितना लाभ पहुँचाया या उनके लिये कितने नए अवसर सृजित हुए हैं।
  • इस संबंध में भी कोई जानकारी प्राप्त नहीं हैं कि बिना किसी सामाजिक सुरक्षा के इन समूहों ने किस प्रकार पूंजीवादी व्यवस्था में स्वयं का बचाव किया है।
  • सदियों से हाशिये पर रहने वाले समूह का बड़ा हिस्सा अभी भी इस उम्मीद में है कि सरकार उनकी स्थिति में सुधार के लिये नीतिगत हस्तक्षेप करेगी।

सकारात्मक कार्रवाई

  • वर्तमान में एक ऐसी व्यवस्था की तत्काल आवश्यकता है, जो इन कमियों को दूर करके अंतर-समूह की माँगों के प्रति संवेदनशील हो। चूँकि आरक्षण का कोई वर्गीकरण नीतिगत संशोधन और विखंडन को प्रेरित करेगा, अतः दो चीजों की आवश्यकता है- 
  1. साक्ष्य-आधारित नीतिगत विकल्पों को विकसित करने की, जिन्हें विशिष्ट समूहों की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये तैयार किया जाना चाहिये।
  2. संयुक्त राज्य अमेरिका या यूनाइटेड किंगडम के ‘समान अवसर आयोग’ जैसी संस्था की, जो दो महत्त्वपूर्ण कार्य कर सके:
    • जाति, लिंग, धर्म और अन्य सामूहिक असमानताओं सहित विभिन्न समुदायों की सामाजिक-आर्थिक-आधारित जनगणना के आँकड़ों से ‘वंचित सूचकांक’ बनाए और उनके अनुरूप नीतियाँ बनाने के लिये रैंकिंग प्रदान करे।
    • भेदभाव रहित और समान अवसर के लिये नियोक्ताओं और शैक्षणिक संस्थानों के प्रदर्शन को ऑडिट कर ‘बेस्ट प्रैक्टिसेस’ को विभिन्न क्षेत्रकों में लागू करे।
  • इससे संस्थागत स्तर पर नीति तैयार करने और उसकी निगरानी करने में सुलभता होगी।
  • भारत में सकारात्मक कार्रवाई व्यवस्था में किसी भी सार्थक सुधार को शुरू करने के लिये ‘सामाजिक-आर्थिक जाति-आधारित जनगणना’ एक आवश्यक पूर्व शर्त बन जाती है।

निष्कर्ष

  • गौरतलब है कि इसी तरह के सुझाव एक दशक पहले समान अवसर आयोग, 2008 की विशेषज्ञ समिति ने अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय को सौंपे थे।
  • हालाँकि इस संबंध में बहुत कम नीतिगत प्रगति हुई है। बाद की सरकारें ‘तात्कालिक और अदूरदर्शी राजनीतिक लाभ’ को ध्यान में रखते हुए इस तरह के आमूल नीति विकल्पों के साथ जुड़ने के लिये अनिच्छुक रही हैं।
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