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नीलकुरिंजी की नई किस्में

चर्चा में क्यों

हाल ही में, विशेषज्ञों के एक समूह ने पश्चिमी घाट के इडुक्की में संथानपारा में कल्लीप्पारा पहाड़ी क्षेत्र में नीलकुरिंजी पौधे की कुछ नई किस्मों की पहचान की है।

प्रमुख बिंदु

  • विशेषज्ञों के अनुसार ये पौधे स्ट्रोबिलांथेस कुंथियाना (Strobilanthes kunthiana) किस्म से संबंधित हैं।
  • स्ट्रोबिलैन्थेस कुंथियाना के अतिरिक्त इस पहाड़ी श्रृंखला में पाए गए अन्य नीलकुरिंजी फूल इस प्रकार हैं- 
    • स्ट्रोबिलांथेस एनामलैइका (Strobilanthes anamallaica) 
    • स्ट्रोबिलांथेस हेयनियस (Strobilanthes heyneanus) 
    • स्ट्रोबिलांथेस पलनेनसिस (Strobilanthes pulnyensis)
    • स्ट्रोबिलांथेस नियोस्पर (Strobilanthes neoasper)
  • उल्लेखनीय है कि नीलकुरिंजी की ये सभी प्रजातियां पश्चिमी घाटों की स्थानिक हैं और लगभग 200 एकड़ के कल्लीप्पारा पहाड़ियों पर फैली हुई हैं।
  • नीलकुरिंजी के इन पौधों को मुन्नार के संरक्षित क्षेत्रों के बाद सबसे बड़ी प्रजातियों में से एक माना जा सकता है।
  • मंगलादेवी पर्वतमाला से लेकर कर्नाटक में कूर्ग तक विशेषज्ञों ने स्ट्रोबिलांथेस कुंथियाना किस्म की लगभग 100 आबादी की पहचान की गयी है।

नीलकुरिंजी के बारे में

  • यह फूलों की एक दुर्लभ प्रजाति है जो 12 वर्ष में एक बार खिलते हैं। यह एक प्रकार की झाड़ियाँ है जो केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में पश्चिमी घाट के शोला वनों में पाई जाती हैं।
  • इसका वैज्ञानिक नाम स्ट्रोबिलांथेस कुंथियाना (Strobilanthes kunthiana) है। इन्हें स्थानीय रूप से कुरिंजी के नाम से जाना जाता है। ये 1,300 से 2,400 मीटर की ऊँचाई पर उगती हैं। भारत में इन फूलों की लगभग 45 प्रजातियाँ पाई जाती हैं जो लगभग 6, 9, 12 या 16 वर्षों के अंतराल पर खिलती हैं।
  • नीलगिरि हिल्स का नाम नीलकुरिंजी के बैंगनी-नीले फूलों के नाम पर ही रखा गया है। तमिलनाडु का पलियान आदिवासी समुदाय अपनी आयु की गणना के लिये इसे संदर्भ वर्ष के रूप में प्रयोग करता था। 
  • केरल में स्थित एराविकुलम राष्ट्रीय उद्यान नीलकुरिंजी फूलों का सबसे बड़ा अभयारण्य है।  
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