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नाभिकीय संलयन ऊर्जा 

(प्रारंभिक परीक्षा : सामान्य विज्ञान)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नप्रत्र-3 : विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- विकास एवं अनुप्रयोग और रोज़मर्रा के जीवन पर इसका प्रभाव)

संदर्भ  

हाल ही में, संयुक्त राज्य अमेरिका के वैज्ञानिकों ने पहली बार नाभिकीय संलयन के लिये प्रयोगशाला में प्रयुक्त ऊर्जा की तुलना में अधिक ऊर्जा उत्पादन के लक्ष्य को हासिल कर लिया है।  

प्रमुख बिंदु 

  • कैलिफोर्निया में लॉरेंस लिवरमोर नेशनल लेबोरेटरी के वैज्ञानिकों ने संलयन प्रयोग में लेज़र का उपयोग करके पहली बार शुद्ध ऊर्जा लाभ (Net Energy Gain) के लक्ष्य को प्राप्त किया है।  
  • वैज्ञानिकों ने शुद्ध ऊर्जा लाभ को प्राप्त करने के लिये उच्च ऊर्जा से युक्त लेजर बीम का उपयोग किया है, जिसे 'जड़त्वीय संलयन' (inertial fusion) भी कहा जाता है। विदित है कि दक्षिणी फ्रांस में अंतर्राष्ट्रीय थर्मोन्यूक्लियर प्रायोगिक रिएक्टर (ITER) नामक परियोजना में नाभिकीय संलयन के लिये मजबूत चुंबकीय क्षेत्र का उपयोग किया जाता है। 

शुद्ध ऊर्जा लाभ की चुनौतियाँ

  • नाभिकीय संलयन प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में ऊर्जा की खपत होती है, इसलिये इस प्रक्रिया को आत्मनिर्भर बनाने के लिये प्रयुक्त की जाने वाली ऊर्जा की तुलना में अधिक ऊर्जा को प्राप्त करना एक महत्त्वपूर्ण चुनौती है।
  • संलयन में प्रयुक्त तापमान सूर्य के केंद्र में मौजूद तापमान से 10 गुना अधिक होता है प्रयोगशाला में इस तरह के चरम वातावरण को बनाने के लिये भारी मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होती है। अब तक, ऐसी प्रयोगात्मक संलयन प्रतिक्रियाओं में उत्पादित ऊर्जा उपयोग की जाने वाली ऊर्जा से कम रही है। 
  • विदित है कि चुंबकीय संलयन की तुलना में जड़त्वीय संलयन के माध्यम से ब्रेक-ईवन ऊर्जा स्तर को प्राप्त करना अपेक्षाकृत आसान है। ब्रेक-ईवन एक ऐसी स्थिति है, जिसमें प्रयुक्त की जाने वाली ऊर्जा एवं उत्पादित की जाने वाली ऊर्जा बराबर होती है। 

क्या है नाभिकीय संलयन ऊर्जा 

  • परमाणु के नाभिक में संचित अपार ऊर्जा का उपयोग करने की विधि को परमाणु संलयन विधि के नाम से जाना जाता है। यह वह प्रक्रिया है जो सूर्य और अन्य सभी तारों को शक्ति प्रदान करती है।
  • संलयन विधि में, दो हल्के तत्त्वों के नाभिक आपस में जुड़कर एक भारी परमाणु के नाभिक का निर्माण करते हैं। जबकि वर्तमान में दुनिया भर में उपयोग की जा रही परमाणु ऊर्जा की विखंडन विधि में एक भारी तत्त्व के नाभिक को नियंत्रित तरीके से हल्के तत्त्वों में विभाजित किया जाता है।
  • नाभिकीय संलयन विधि में दो परमाणुओं के नाभिक 100 मिलियन डिग्री सेल्सियस (180 मिलियन फारेनहाइट) या उससे अधिक ताप पर संलयित होकर एक नए बड़े परमाणु का निर्माण करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है। 
  • पृथ्वी पर संलयन के लिये परिस्थितियों के निर्माण में एक प्लाज़्मा उत्पन्न करना और उसे बनाए रखना शामिल है। प्लाज़्मा ऐसी गैसें हैं जो इतनी गर्म होती हैं कि इलेक्ट्रॉन परमाणु नाभिक से मुक्त हो जाते हैं। 

संलयन ऊर्जा के लाभ 

  • नाभिकीय संलयन से प्राप्त ऊर्जा स्वच्छ ऊर्जा का एक महत्त्वपूर्ण स्त्रोत है, जो कार्बन मुक्त ऊर्जा के उत्पादन में सहायक है।  
  • विखंडन रिएक्टरों के विपरीत इस ऊर्जा के उत्पादन से रेडियोधर्मी परमाणु अपशिष्ट का उत्पादन नहीं होता है।
  • संलयन ईंधन से भरे एक मिनी ट्रक में 2 मिलियन मीट्रिक टन कोयले या 10 मिलियन बैरल तेल के बराबर ऊर्जा होती है। इसके अतिरिक्त इस विधि में विकिरण जोखिम की चुनौती नगण्य होती है। 
  • संलयन ईंधन के दो स्रोत, हाइड्रोजन और लिथियम, पृथ्वी के कई हिस्सों में व्यापक रूप से उपलब्ध हैं। विदित है कि हाइड्रोजन बम में संलयन प्रक्रिया का उपयोग किया जाता है।  

नाभिकीय विखंडन और नाभिकीय संलयन  

  • विखंडन एक भारी तत्त्व (उच्च परमाणु द्रव्यमान संख्या के साथ) को टुकड़ों में विभाजित करता है, जबकि संलयन दो हल्के तत्त्वों (कम परमाणु द्रव्यमान संख्या के साथ) को जोड़ता है, जिससे एक भारी तत्त्व बनता है।   
  • किसी ईंधन के प्रति ग्राम नाभिकीय विखंडन से उत्पादित ऊर्जा की अपेक्षा नाभिकीय संलयन की अभिक्रिया में चार गुना अधिक ऊर्जा उत्पादित होती है। 
  • उदाहरण के लिये, हाइड्रोजन के एक भारी समस्थानिक, जिसे ट्रिटियम कहा जाता है, के दो नाभिकों का संलयन एक यूरेनियम परमाणु के विखंडन से कम से कम चार गुना अधिक ऊर्जा उत्पन्न करता है।  
  • पारंपरिक नाभिकीय विखंडन रिएक्टरों के द्वारा रेडियोसक्रिय अपशिष्ट का उत्पादन होता है, जबकि नाभिकीय संलयन में इस अपशिष्ट का उत्पादन नहीं होता है।

अंतर्राष्ट्रीय थर्मोन्यूक्लियर प्रायोगिक रिएक्टर 

  • आई.टी.ई.आर. एक बड़े पैमाने का वैज्ञानिक प्रयोग है जिसका उद्देश्य ऊर्जा स्रोत के रूप में संलयन की व्यवहार्यता को सिद्ध करना है। यह दक्षिणी फ़्रांस के सेंट पॉल लेज़ ड्यूरेंस में निर्माणाधीन है।
  • इस परियोजना में 35 देश भागीदार हैं, जिनमें 27 यूरोपीय संघ के देश, स्विट्जरलैंड, यूनाइटेड किंगडम, चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका शामिल हैं।
  • यह परियोजना चालू होने के पश्चात् विश्व की सबसे बड़ी मशीन बन जाएगी जो ‘लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर’ (CERN) या गुरुत्वाकर्षण तरंगों का पता लगाने के लिये लीगो (LIGO) परियोजना से भी अधिक बड़ी होगी। 
  • भारत, इस परियोजना में वर्ष 2005 में शामिल हुआ तथा भारत की ओर से परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत अहमदाबाद स्थित एक प्रयोगशाला ‘प्लाज्मा अनुसंधान संस्थान’,   परियोजना में भाग लेने वाली एक प्रमुख संस्था है।   
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