New
Final Result - UPSC CSE Result, 2025 GS Foundation (P+M) - Delhi : 23rd March 2026, 11:30 AM Navratri offer UPTO 75% + 10% Off | Valid till 26th March GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 17th March 2026 Final Result - UPSC CSE Result, 2025 GS Foundation (P+M) - Delhi : 23rd March 2026, 11:30 AM Navratri offer UPTO 75% + 10% Off | Valid till 26th March GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 17th March 2026

पेरुम्बिडुगु मुथरैयार द्वितीय

भारत के उपराष्ट्रपति ने राजा पेरुम्बिडुगु मुथरैयार द्वितीय (705 ई.–745 ई.) की स्मृति में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया। यह पहल दक्षिण भारत के एक महत्वपूर्ण किंतु अपेक्षाकृत कम चर्चित शासक को सम्मान देने के रूप में देखी जा रही है। 

पेरुम्बिडुगु मुथरैयार द्वितीय का ऐतिहासिक परिचय

  • पेरुम्बिडुगु ‘मुथरैयार वंश’ के प्रमुख शासकों में से एक थे। इन्होंने सुवरन मारन की उपाधि धारण की थी और उन्हें ‘शत्रुभयंकर’ जैसे वीरतासूचक नामों से भी संबोधित किया जाता था।
  • ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उन्होंने पल्लव शासक नंदिवर्मन के साथ अनेक युद्धों में साहस एवं रणनीतिक कुशलता का परिचय दिया। 
  • सैन्य पराक्रम के साथ-साथ पेरुम्बिडुगु मुथरैयार को एक कुशल एवं न्यायप्रिय प्रशासक के रूप में भी स्मरण किया जाता है। 
  • उनके शासनकाल में विद्वानों व धार्मिक विचारकों को संरक्षण प्राप्त था। जैन आचार्य विमलचंद्र का उनके दरबार में शैव विद्वानों से शास्त्रार्थ करने के लिए आना इस बात का संकेत देता है कि उनका दरबार बौद्धिक व धार्मिक विमर्श का केंद्र था। 

मुथरैयार वंश का इतिहास 

  • मुथरैयार प्रारंभ में पल्लवों के सामंत के रूप में कार्य करते थे। पल्लव साम्राज्य की शक्ति कमजोर पड़ने के साथ-साथ मुथरैयार जैसे क्षेत्रीय सरदारों ने अधिक स्वतंत्रता एवं राजनीतिक प्रभाव अर्जित कर लिया तथा धीरे-धीरे स्वयं शासक के रूप में उभरने लगे। 
  • अपने शासन के उत्कर्ष काल में मुथरैयारों का नियंत्रण तंजावुर, पुदुक्कोट्टई, पेराम्बलुर, तिरुचिरापल्ली तथा कावेरी नदी के आसपास के विस्तृत क्षेत्रों तक फैल गया। पल्लवों के सामंत होने के कारण मुथरैयारों पर पल्लव स्थापत्य शैली का गहरा प्रभाव पड़ा। 
  • वे महान मंदिर निर्माताओं के रूप में प्रसिद्ध हुए। वस्तुतः मुथरैयार शासकों ने विशेष रूप से गुफा मंदिरों के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया और यह परंपरा नौवीं शताब्दी के शुरुआती दशकों तक जारी रही।
« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR
X