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यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम

प्रारंभिक  परीक्षा- POCSO  एक्ट
मुख्य परीक्षा - सामान्य अध्ययन -  पेपर ,2
             

चर्चा में क्यों -

  • हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट ने  सहमति के बावजूद 17 वर्षीय लड़की से बलात्कार करने के लिए 25 वर्षीय व्यक्ति को दोषी ठहराने वाले विशेष अदालत के फैसले को रद्द कर दिया।

मुख्य बिंदु

  • न्यायमूर्ति भारती एच. डांगरे की एकल पीठ ने 10 जुलाई को एक विशेष अदालत के 21 फरवरी, 2019 के फैसले को रद्द करते हुए ये फैसला दिया ।
  • POCSO अधिनियम के तहत विशेष अदालत ने एक 25 वर्षीय व्यक्ति को दोषी ठहराया था और उसे 17 वर्षीय लड़की के साथ बलात्कार और यौन उत्पीड़न करने के लिए 10 साल जेल की सजा सुनाई थी, जबकि लड़की ने कहा था कि वे सहमति से रिश्ते में थे। 
  • लड़की ने विशेष अदालत को बताया था कि मुस्लिम कानून के तहत उसे बालिग माना जाता है और उनका निकाह हो चुका है।
  • उच्च न्यायालय ने कहा कि वह सहमति से यौन संबंध बनाने के बावजूद निचली अदालत द्वारा केवल लड़की के नाबालिग होने के आधार पर व्यक्ति को दोषी ठहराने वाले फैसले से सहमत नहीं हो सकता।

हाई कोर्ट की टिप्पणी-

  • हाई कोर्ट के अनुसार,अब समय गया है कि हमारे देश की  संसद को वैश्विक स्तर के अनुसार किशोरों के यौन संबंधों के लिए सहमति की उम्र  सीमा पर संज्ञान लेना चाहिए
  • कोर्ट ने  'यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम' के तहत आपराधिक मामलों की बढ़ती संख्या पर चिंता जताते हुए यह टिप्पणी की,  जिसमें आरोपियों को तब भी दंडित किया जाता है जब पीड़ित किशोर  यह कहते हैं कि वे सहमति से रिश्ते में थे।
  • कोर्ट  ने कहा कि "रोमांटिक रिश्तों के अपराधीकरण ने न्यायपालिका, पुलिस और बाल संरक्षण प्रणाली का महत्वपूर्ण समय बर्बाद करके आपराधिक न्याय प्रणाली पर बोझ डाल दिया है"
  • पीठ ने कहा कि यद्यपि POCSO अधिनियम किशोरावस्था में विपरीत लिंग के प्रति स्वाभाविक भावनाओं को नहीं रोक सकता है, लेकिन एक ऐसे लड़के को दंडित करना जो अपने जैविक परिवर्तनों के कारण एक नाबालिग लड़की के साथ सहमति से संबंध बनाता है, 'बच्चे के सर्वोत्तम हित' के खिलाफ होगा। 
  • कोर्ट ने कहा, "केवल यह आशंका कि किशोर आवेगपूर्ण  बुरा निर्णय लेंगे, उन्हें एक ही वर्ग में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है और उनकी इच्छा  को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
  • सहमति की उम्र को जरूरी तौर पर शादी की उम्र से अलग किया जाना चाहिए क्योंकि यौन कृत्य केवल शादी के दायरे में नहीं होते हैं और केवल समाज, बल्कि न्यायिक प्रणाली को भी इस महत्वपूर्ण पहलू पर ध्यान देना चाहिए।
  • पीठ ने कहा कि भारत में 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की की सहमति महत्वहीन हो जाती है, भले ही वह यौन गतिविधि में सक्रिय भागीदार हो किंतु इसे कानून की नजर में 'कोई सहमति नहीं' माना जाता है। 
  • इसमें कहा गया है कि किशोरों के मामले में जो सहमति से यौन संबंध बनाते हैं, "केवल एक को ही परिणाम भुगतना पड़ता है"
  • यद्यपि POCSO अधिनियम,  बच्चों के यौन शोषण को रोकने का उद्देश्य रखता है, किंतु इसने  एक 'अधूरा क्षेत्र' (Grey Area) बना दिया है जिसके परिणामस्वरूप सहमति से बनाये  किशोर संबंधों को भी अपराध घोषित कर दिया गया है।
  • कोर्ट ने कहा कि "यौन स्वायत्तता में वांछित यौन गतिविधि में शामिल होने का अधिकार और अवांछित यौन आक्रामकता से संरक्षित होने का अधिकार शामिल है"। 

वैश्विक परिदृश्य-

  • यह देखते हुए कि कई देशों ने किशोरों के लिए सहमति से यौन संबंध बनाने की उम्र सीमा  कम कर दी है, बॉम्बे हाई कोर्ट ने  कहा कि अब समय गया है कि हमारे देश और संसद को दुनिया भर में हो रही घटनाओं को ध्यान में रखना चाहिए।
  • न्यायाधीश ने कहा, “भारत में विभिन्न क़ानूनों द्वारा सहमति की आयु में वृद्धि की गई है और इसे 1940 से 2012 तक 16 वर्ष तक बनाए रखा गया था, जो संभवतः विश्व स्तर पर सबसे अधिक आयु में से एक है, क्योंकि अधिकांश देशों ने अपनी सहमति की आयु सीमा 14 से 16 के भीतर निर्धारित की है। 
  • दूसरी ओर कोर्ट  ने कहा कि जर्मनी, इटली, पुर्तगाल और हंगरी में सहमति की उम्र 14 वर्ष है और लंदन, वेल्स तथा श्रीलंका में 16 वर्ष है। जापान में सहमति की उम्र 13 वर्ष है और बांग्लादेश में 16 साल से कम उम्र की लड़की के साथ यौन संबंध बनाने पर बलात्कार की सजा दी जाती है।
  • सहमति की उम्र पर जापान में छात्रों द्वारा समर्थित एक आंदोलन का जिक्र करते हुए न्यायमूर्ति डांगरे ने कहा, "यह आवश्यक है कि हमारे देश को इस संबंध में दुनिया भर में जो कुछ भी हो रहा है उसे देखना होगा, लेकिन एक बात निश्चित है कि इस पूरे परिदृश्य में, यदि एक युवा लड़के को एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार करने के लिए दंडित किया जाता है, केवल इस आधार पर  कि वह 18 वर्ष से कम उम्र की  है ।किंतु यदि  इस कृत्य में लड़की  बराबर की भागीदार है, तो उसे गंभीर दंड का पालन करना होगा अर्थात जीवन भर साथ रहना होगा।

यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम-

  • इस अधिनियम का प्रमुख उद्देश्य, बच्चों को यौन उत्पीड़न, और अश्लील साहित्य के अपराधों से बचाने तथा संबंधित मामलों और घटनाओं के परीक्षण के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना करना है।
  • यह अधिनियम, भारत द्वारा हस्ताक्षरित, संयुक्त राष्ट्र के बाल अधिकारों पर कन्वेंशन, 1989 के प्रावधानों से भी सुसंगत है।
  • विभिन्न अपराधों के लिए सजा प्रावधानों को कठोर बनाने के लिए 2019 में इस अधिनियम में संशोधन किया गया था।

मुख्य प्रावधान

  • पॉस्को अधिनियम, 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को यौन उत्पीड़न, यौन शोषण, और बाल पोर्नोग्राफी से बचाने के लिए बनाया गया था।
  • इस अधिनियम के तहत, 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति की सहमति भी अप्रासंगिक है।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए प्रश्न - यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

  1. यह संयुक्त राष्ट्र के बाल अधिकारों पर कन्वेंशन, 1989 के प्रावधानों के अनुरूप  है।
  2. यह 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को यौन उत्पीड़न, यौन शोषण, और बाल पोर्नोग्राफी से बचाने के लिए बनाया गया था।
  3. इस अधिनियम के तहत, 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति की सहमति भी अप्रासंगिक है।

 उपर्युक्त में से कितना/कितने कथन सत्य है/हैं?

(a) केवल एक

(b) केवल दो

(c) सभी तीनों

(d) कोई नहीं

उत्तर - (c) 

मुख्य परीक्षा के लिए प्रश्न - हाल ही में 'यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम' पर  बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा की टिप्पणी पर विचार करें । क्या इस अधिनियम में सुधार की आवश्यकता है?

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