New
Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 8th June 2026, 6:30 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 1st June 2026, 5:30 PM English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 7th June 2026, 8:00 AM Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 8th June 2026, 6:30 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 1st June 2026, 5:30 PM English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 7th June 2026, 8:00 AM

अमेरिकी जलवायु निकायों से बाहर निकलने का भारत पर प्रभाव: राहत और नए जोखिम

मुख्य परीक्षा:  सामान्य अध्ययन पेपर-2 

चर्चा मे क्यों ?

  • संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) ने हाल ही में जलवायु परिवर्तन से संबंधित कई अंतरराष्ट्रीय निकायों और समझौतों से अपना नाम वापस लेने की घोषणा की है। 
  • इसमें संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC), अंतरसरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (IPCC), अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA), और अंतरराष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी (IRENA) शामिल हैं।
  • यह कदम राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के पेरिस समझौते से बाहर निकलने के फैसले के बाद आया है, जो 20 जनवरी से प्रभावी होगा। पिछले वर्ष में अमेरिकी प्रशासन ने जलवायु अनुसंधान एजेंसियों के लिए धन और स्टाफ में भी कटौती की।
  • इस निर्णय से वैश्विक जलवायु शासन प्रणाली पर अमेरिका के लगभग पूर्ण अलगाव का संकेत मिलता है, जिसका प्रभाव भारत और अन्य देशों की जलवायु योजनाओं पर पड़ सकता है। 

अमेरिका का उत्सर्जन प्रोफाइल:

  • अमेरिका दुनिया के शीर्ष कार्बन उत्सर्जक देशों में शामिल है।
  • 2024 में CO₂ उत्सर्जन: लगभग 4.9 बिलियन टन, जो वैश्विक उत्सर्जन का 12.7% है।
  • प्रति व्यक्ति उत्सर्जन: 14.6 टन, वैश्विक औसत से बहुत अधिक।
    • अमेरिका जीवाश्म ईंधन और उद्योग से CO का सबसे बड़ा संचयी उत्सर्जक है।
  • ऐतिहासिक वैश्विक योगदान: लगभग 24%।
  • भूमि उपयोग और वन इस उत्सर्जन का लगभग 13% शुद्ध कार्बन सिंक के रूप में संतुलित करते हैं।

अमेरिका और जलवायु परिवर्तन: प्रेम-घृणा का रिश्ता:

  • अमेरिका ने वैश्विक जलवायु परिवर्तन समझौतों को आकार देने में भूमिका निभाई है, 
  • लेकिन बाध्यकारी लक्ष्य अपनाने में पीछे रहा।
    • क्योटो प्रोटोकॉल: अमेरिका ने इसमें भाग नहीं लिया।
    • पेरिस समझौता: अमेरिका ने इसका निर्माण किया लेकिन प्रदर्शन सीमित रहा।
  • ट्रम्प प्रशासन के दौरान अमेरिका ने जलवायु अनुसंधान में कटौती की और समझौतों से पीछे हट गया।

वैश्विक जलवायु संस्थानों से अमेरिका के बाहर निकलने के परिणाम:

  • अल्पकालिक वैश्विक प्रभाव सीमित हो सकता है क्योंकि दुनिया पहले से ही 2030 के लक्ष्यों की राह से भटक चुकी है।
  • दीर्घकालिक रूप से, बहुपक्षीय जलवायु सहयोग कमजोर हो सकता है।
  • अमेरिका की अनुपस्थिति चीन को वैश्विक नेतृत्व में आगे बढ़ाने का अवसर दे सकती है।
  • सौर और पवन ऊर्जा अब आर्थिक और रणनीतिक रूप से आकर्षक हैं, इसलिए ऊर्जा संक्रमण को पूरी तरह से रोकना मुश्किल है।

भारत के जलवायु और ऊर्जा संक्रमण पर प्रभाव:

  • अल्पकालिक राहत
    • अमेरिका के बहुपक्षीय जलवायु निकायों से हटने से भारत पर तेजी से डीकार्बनाइजेशन का दबाव अल्पकालिक रूप से कम हो सकता है।
  • स्वच्छ ऊर्जा निवेश में अनिश्चितता
    • हालांकि, अमेरिका का बाहर निकलना भारत में स्वच्छ प्रौद्योगिकी निवेश को प्रभावित कर सकता है।
  • भारत-अमेरिका जलवायु सहयोग पर झटका
    • पहले भारत और अमेरिका के बीच जलवायु और स्वच्छ ऊर्जा में मजबूत साझेदारी थी।
    • अब इस सहयोग के रुकने से भारत को अपने ऊर्जा परिवर्तन की योजनाओं को फिर से समायोजित करना पड़ सकता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) और वित्तपोषण
    • अमेरिका ने ISA से खुद को अलग कर लिया है।
    • अमेरिका ने अब तक इस गठबंधन को कोई वित्तीय सहायता नहीं दी।
    • भविष्य में वित्तपोषण और गति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

निष्कर्ष:

  • अमेरिका के बहुपक्षीय जलवायु निकायों से बाहर निकलने के कदम से भारत को अल्पकालिक राहत तो मिल सकती है, लेकिन दीर्घकालिक जोखिम भी बढ़ सकते हैं। 
  • भारत को अपनी जलवायु और ऊर्जा रणनीतियों को और मजबूत बनाना होगा, और नए अंतरराष्ट्रीय सहयोग के विकल्प तलाशने होंगे।
  • इस परिस्थिति में भारत के लिए स्वच्छ ऊर्जा निवेश, अंतर्राष्ट्रीय साझेदारी और नवाचार पर ध्यान देना आवश्यक है ताकि वह वैश्विक ऊर्जा संक्रमण में अग्रणी बना रहे।
« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR