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स्पाइना बिफिडा

(प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ, सामान्य विज्ञान)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2 व 3: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय; विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- विकास एवं अनुप्रयोग और रोज़मर्रा के जीवन पर इसका प्रभाव)

संदर्भ

वर्ष 1991 से यह तथ्य स्थापित है कि गर्भधारण से पूर्व महिलाओं द्वारा फोलिक एसिड का सेवन करने से स्पाइना बिफिडा के 70% से अधिक मामलों की रोकथाम संभव है। इसके बावजूद तीन दशक बीत जाने के बाद भी भारत उन गिने-चुने देशों में शामिल है जहाँ इस प्रभावी उपाय के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने के लिए कोई ठोस एवं व्यापक प्रयास नहीं किए गए हैं। परिणामस्वरूप, भारत आज भी विश्व में स्पाइना बिफिडा की उच्चतम प्रसार दर वाले देशों में से एक बना हुआ है। 

स्पाइना बिफिडा के बारे में 

  • स्पाइना बिफिडा रीढ़ की हड्डी से जुड़ा एक जन्मजात विकार है जो बचपन में गंभीर स्तर के पक्षाघात का कारण बनता है। इस रोग में पक्षाघात की तीव्रता कुछ मामलों में पैरों में केवल हल्की कमजोरी के रूप में दिखाई देती है।
  • जबकि गंभीर स्थितियों में कूल्हे से नीचे का पूरा शरीर पूर्ण रूप से लकवाग्रस्त हो जाता है। परिणामस्वरूप अनेक बच्चे अल्पायु से ही व्हीलचेयर पर निर्भर हो जाते हैं। 
  • इस रोग से प्रभावित बच्चों में मस्तिष्क में अत्यधिक द्रव का संचय (हाइड्रोसेफालस), मूत्र एवं मल नियंत्रण की समस्या, क्लब फुट जैसी अस्थि विकृतियाँ तथा अन्य चिकित्सीय जटिलताएँ भी देखी जाती हैं। 
  • यद्यपि कई बच्चों में पक्षाघात और मूत्र असंयम पाया जाता है, फिर भी सामान्यतः उनकी बौद्धिक क्षमता प्रभावित नहीं होती है। 

स्पाइना बिफिडा के कारण

  • गर्भधारण से पूर्व तथा गर्भावस्था के शुरुआती चरण में फोलिक एसिड का पर्याप्त मात्रा में सेवन न करना (प्रमुख कारण)
  • मातृ कुपोषण एवं एनीमिया की स्थिति
  • सूक्ष्म पोषक तत्वों के पूरक के अभाव में होने वाला अनियोजित गर्भधारण
  • आनुवंशिक प्रवृत्ति के साथ पर्यावरणीय प्रभावों की संयुक्त भूमिका 

स्पाइना बिफिडा का उपचार 

  • शीघ्र शल्य हस्तक्षेप: जन्म के तुरंत बाद रीढ़ की हड्डी में मौजूद दोष को शल्य चिकित्सा द्वारा बंद किया जाता है जिससे संक्रमण की संभावना कम होती है और आगे होने वाली तंत्रिका क्षति को रोका जा सके।
  • हाइड्रोसेफालस का उपचार: मस्तिष्क में जमा अतिरिक्त द्रव को बाहर निकालने के लिए वेंट्रिकुलो-पेरिटोनियल (वीपी) शंट की स्थापना की जाती है।
  • पुनर्वास सेवाएँ: रोगी की गतिशीलता, कार्यक्षमता व आत्मनिर्भरता बढ़ाने के उद्देश्य से लंबे समय तक फिजियोथेरेपी एवं ऑक्यूपेशनल थेरेपी प्रदान की जाती है।
  • अस्थि-रोग संबंधी देखभाल: क्लब फुट जैसी हड्डियों की विकृतियों के सुधार के लिए आवश्यकतानुसार शल्य चिकित्सा, ब्रेसिज़ अथवा प्लास्टर का उपयोग किया जाता है। 

भारत में सार्थक प्रयासों का अभाव 

  • भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है जहाँ इस सरल एवं प्रभावी उपाय के प्रति जन-जागरूकता फैलाने के लिए न तो राज्य स्तर पर और न ही केंद्र सरकार के स्तर पर कोई ठोस पहल की गई है। 
  • इस उपेक्षा का परिणाम यह है कि देश में हर वर्ष हजारों बच्चे गंभीर पक्षाघात के साथ जन्म ले रहे हैं जिससे अनेक परिवारों को गंभीर सामाजिक और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। 
  • भारत में यह स्थिति प्रतिवर्ष 25,000 से अधिक बच्चों को प्रभावित करती है जिसके कारण यह विश्व में इसकी सर्वाधिक प्रसार दर वाले देशों में शामिल हो गया है। साथ ही, स्पाइना बिफिडा से ग्रस्त भारत के 75% से अधिक बच्चों तक आवश्यक चिकित्सीय सेवाएँ नहीं पहुँच पातीं हैं। 
  • यह रोग परिवारों, समुदायों तथा संपूर्ण स्वास्थ्य प्रणाली पर गंभीर सामाजिक-आर्थिक दबाव उत्पन्न करता है। इस संदर्भ में रोकथाम पर किया गया प्रत्येक एक रुपया का खर्च उपचार एवं दीर्घकालिक पुनर्वास में लगने वाले 100 रुपए से भी अधिक की बचत करने की क्षमता रखता है। 

वैश्विक प्रयास एवं अनुसंधान

  • दुनिया के अनेक देशों ने स्पाइना बिफिडा की रोकथाम के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्तर पर जन-जागरूकता अभियान संचालित किए हैं तथा फोलिक एसिड अनुपूरण को बढ़ावा देने वाली योजनाएँ लागू की हैं। 
  • इसके अलावा 68 देशों ने कानून के माध्यम से कुछ प्रमुख खाद्य पदार्थों में फोलिक एसिड का फोर्टिफिकेशन अनिवार्य कर दिया है। इन देशों में जागरूकता कार्यक्रमों और खाद्य फोर्टिफिकेशन के संयुक्त प्रभाव से फोलिक एसिड से रोके जा सकने वाले मामलों को लगभग समाप्त कर दिया गया है जिससे स्पाइना बिफिडा की व्यापकता दर घटकर प्रति 1,000 जन्मों पर 1 से भी कम रह गई है। 
  • इसके विपरीत भारत में इसकी व्यापकता अब भी अस्वीकार्य रूप से अधिक बनी हुई है जो लगभग 4 प्रति 1,000 जन्म हैं जिसका प्रमुख कारण ऐसे प्रभावी एवं व्यापक प्रयासों का अभाव है।
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