(प्रारंभिक परीक्षा: भारत का प्राकृतिक भूगोल) (मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 1: भौतिक भूगोल की मुख्य विशेषताएँ, महत्त्वपूर्ण भू-भौतिकीय घटनाएँ, भौगोलिक विशेषताएँ) |
संदर्भ
राजस्थान, मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश में फैले हुए चंबल नदी के खड्ड परिदृश्य एवं इसके संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र दोनों को नया आकार दे रहे हैं।
चंबल के खड्ड का अवलोकन
- चंबल की खड्ड (बीहड़) एक अनोखी भू-आकृति विशेषता है जो चंबल नदी बेसिन (यमुना की एक सहायक नदी) के किनारे गंभीर अवनालिका अपरदन से बनी है। यह प्रक्रिया काफी हद तक मानव-भू-आकृतिक है और मानवीय गतिविधियों ने प्राकृतिक अपरदनकारी शक्तियों को बढ़वा दिया है।
- ये बीहड़ अर्ध-शुष्क क्षेत्र की भू-आकृति का एक प्राकृतिक परिणाम हैं जो सदियों से पानी व हवा के अपरदन से बने हैं। यह अवैज्ञानिक कृषि पद्धतियों, वनों की कटाई और जलोढ़ मैदानों के प्राकृतिक अपक्षय के कारण मृदा अपरदन से होता है।
- खड़ी ढलानें और अर्ध-शुष्क जलवायु अपवाह कटाव को तेज करते हैं जिससे इलाके में गहरी अवनलिका बन जाती हैं।
पारिस्थितिक महत्व
- ये बीहड़ शुष्क पर्णपाती वन, घास के मैदान और झाड़ीदार आवासों के पैच हैं जो नदी के किनारे के इलाकों के पास भारतीय चिकारा (चिंकारा), भारतीय लोमड़ी और मगरमच्छों को सहारा देते हैं।
- राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य (स्थापना 1979) घड़ियाल, गंगा डॉल्फिन, इंडियन स्किमर और रेड-क्राउन्ड कछुए जैसी प्रजातियों की रक्षा करता है।
सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
ये बीहड़ बड़े इलाकों को खेती के लिए अनुपयुक्त बना देते हैं जिससे स्थानीय समुदायों में आर्थिक संकट एवं पलायन होता है।
ऐतिहासिक रूप से चंबल घाटी डकैती जैसी गतिविधियों से जुड़ी थी, जिसे ऊबड़-खाबड़ इलाके व खराब प्रशासन ने बढ़ावा दिया था।
सरकारी पहल
- बीहड़ सुधार परियोजनाएँ (1980 के दशक से)– केंद्रीय मृदा व जल संरक्षण अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान (CSWCRTI) द्वारा समन्वित
- नीति आयोग की 2020 की पहल– सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल के माध्यम से बीहड़ों को उत्पादक कृषि वानिकी भूमि में बदलने की योजना
- मध्य प्रदेश बीहड़ सुधार परियोजना– बायोइंजीनियरिंग, चेक डैम और कृषि वानिकी का उपयोग करके 60,000 हेक्टेयर भूमि को पुनः प्राप्त करने का लक्ष्य
- हाल के घटनाक्रम (2020–2024)- इसरो व एन.आर.एस.सी. मानचित्रण पहलों ने लक्षित भूमि बहाली के लिए खड्ड की तीव्रता को वर्गीकृत किया है। मुरैना एवं भिंड जिलों में पायलट परियोजनाएँ वृक्षारोपण के माध्यम से सफल कार्बन पृथक्करण का प्रदर्शन करती हैं।
चुनौतियाँ
- अवैध रेत खनन और वनों की कटाई जारी रहना
- केंद्र व राज्य एजेंसियों के बीच खंडित नीति समन्वय
- बहाली कार्यक्रमों में सामुदायिक भागीदारी की कमी