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भारत में बढ़ता मृत्युदंड की स्थिति

संदर्भ

  • वर्ष 2023 के अंत में 561 कैदियों को मृत्युदंड दिए जाने के साथ भारत में मृत्युदंड की सजा पाने वालों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। वर्ष 2004 के बाद से यह संख्या अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुँच गई है। साथ ही, सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2023 में सुने गए मामलों में मृत्युदंड पाए लगभग 55% अर्थात छह कैदियों को बरी कर दिया। मृत्युदंड की सजा पर विचार के लिए न्यायालय ने संविधान पीठ बुलाने की पहल की।
  • अधीनस्थ न्यायालयों में मृत्युदंड की सजा पाने वाले और सर्वोच्च न्यायालय से बरी होने वाले कैदियों की बढ़ती संख्या भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली के भीतर प्रणालीगत चुनौतियों को उजागर करती है।

 भारत में मृत्युदंड की वर्तमान स्थिति

  • डेथ पेनल्टी इंडिया रिपोर्ट, 2016 के अनुसार, वर्ष 2000-15 के बीच निचली अदालतों द्वारा दिए गए मृत्युदंड में से अपीलीय स्तर पर अंतत: 4.9% मृत्युदंड की ही पुष्टि की गई। 
  • मृत्युदंड पर प्रोजेक्ट 39A के वर्ष 2023 के वार्षिक आंकड़ों से पता चलता है कि मनोज बनाम मध्य प्रदेश राज्य (मई 2022) में अपने निर्देशों के माध्यम से सजा में सुधार करने के न्यायालय के प्रयास ट्रायल अदालतों तक पहुंचने में विफल रहे हैं। 
  • वर्ष 2023 में ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्तों से संबंधित जानकारी के अभाव में 86.96% मौत की सज़ाएँ दीं।
  • विगत कुछ वर्षों में न्यायालय के समक्ष मृत्युदंड के अधिकांश मामलों में न्यायालय ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा है किंतु मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया है।

मृत्युदंड प्राप्त कैदी की अवस्था 

  • मृत्युदंड की सजा पाए कैदी फांसी के डर से मानसिक रूप से परेशान रहते हैं। जेलों के भीतर उन्हें हिंसा, उपहास व अपमान का शिकार होना पड़ता है। 
  • इन कैदियों को कार्य, शिक्षा एवं आराम से अलग करने वाली जेल नीतियां अमानवीय परिस्थितियों से निपटने के लिए उनके पास उपलब्ध छोटे साधनों को समाप्त कर देती हैं। 
  • मृत्युदंड का अनुभव जीवन भर के लिए व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक रूप से प्रभावित करता है जो किसी कैदी के बरी होने या सजा में परिवर्तन के बाद भी जारी रहता है।
  • मृत्युदंड पाने वाले अधिकांश कैदियों को बरी किए जाने या सजा कम करने से पहले अनावश्यक रूप से मौत की सजा की भयावहता का सामना करना पड़ता है।  

मृत्युदंड की आवश्यकता 

पक्ष में तर्क 

  • मृत्युदंड से समाज में कानून के भय का स्तर कायम रहता है। ऐसा माना जाता है कि यदि मृत्युदंड की सज़ा दी जाए तो कोई व्यक्ति हत्या जैसे जघन्य अपराध करने से स्वयं को रोक सकता है।
  • राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ना, आतंकवाद, बलात्कार जैसे जघन्य अपराध राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे के लिए खतरनाक हैं। इस तरह के कृत्यों से देश और उसके लोगों के अस्तित्व को खतरा है।
  • यह पीड़ितों के परिवारों को न्यायिक व आत्मिक संतुष्टि प्रदान करता है और संभावित अपराधियों के लिए निवारक के रूप में कार्य करता है। 

विपक्ष में तर्क

  • डेथ पेनल्टी इंडिया रिपोर्ट, 2016 (DPIR) के अनुसार, भारत में मृत्युदंड पाए सभी दोषियों में से लगभग 75% दलित, ओ.बी.सी. एवं धार्मिक अल्पसंख्यक जैसे सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित श्रेणियों से संबद्ध हैं।
  • मृत्युदंड मौलिक रूप से अमानवीय व अपमानजनक है। ऐसे कानून व प्रक्रियाएं बनाना संभव है जो वास्तव में मौत के हकदार लोगों को ही फांसी दिया जाना सुनिश्चित करें।
  • मृत्युदंड के लिए अपीलीय प्रक्रिया लंबी है, जिससे मौत की सजा पाने वाले अपराधियों को प्राय: क्रूरतापूर्वक व्यवहार व दीर्घकालीन अनिश्चितता सहन करने के लिए मजबूर किया जाता है।
  • मृत्युदंड पर न्यायापालिका के विभिन्न निर्णय
  • मोफ़िल ख़ान बनाम झारखंड राज्य (2021) : सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि राज्य इस बात की पुष्टि करने के लिए साक्ष्य एकत्र करने के लिए बाध्य है कि अभियुक्त के सुधार व पुनर्वास की कोई संभावना नहीं है।
  • बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980) : सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि केवल दुर्लभतम एवं क्रूर मामलों में ही मृत्युदंड दिया जाना चाहिए।
  • डिगा अनम्मा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1974) : सर्वोच्च न्यायालय ने यह सिद्धांत दिया कि हत्या के अपराध के लिए आजीवन कारावास की सजा है और कुछ मामलों में ही मृत्युदंड अपवाद है।

आगे की राह 

  • अभियुक्तों को पर्याप्त कानूनी प्रतिनिधित्त्व, सबूतों का समय पर खुलासा और पारदर्शी निर्णयन प्रक्रिया के माध्यम से मुकदमे की कार्यवाही में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। 
  • संशोधित वैधानिक प्रावधानों, विचाराधीन कैदियों के अधिकारों, गिरफ्तारी व जमानत देने के संबंध में न्यायिक निर्णयों एवं जेल सुधारों पर विभिन्न समितियों की सिफारिशों को लागू करके विचाराधीन कैदियों की संख्या कम करने पर जोर दिया जाना चाहिए।
  • मृत्युदंड देने में चूक व त्रुटि को रोकने के लिए पुलिस सुधार, गवाह सुरक्षा योजना एवं पीड़ित मुआवजा योजना जैसे उपायों के साथ आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधारात्मक दृष्टिकोण की आवश्यकता है।
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