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स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया की रिपोर्ट

प्रारंभिक परीक्षा- समसामयिकी
मुख्य परीक्षा- सामान्य अध्ययन, पेपर-2

संदर्भ-

  • अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सस्टेनेबल एम्प्लॉयमेंट  के स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, 25 वर्ष से कम उम्र के 42.3% स्नातक बेरोजगार हैं।

मुख्य बिंदु-

  • भले ही समग्र बेरोजगारी दर 2017-18 के 8.7 प्रतिशत से घटकर 2021-22 में 6.6 प्रतिशत हो गई, लेकिन 2021-22 में भारत के 25 साल से कम उम्र के 42 प्रतिशत से अधिक स्नातक बेरोजगार थे।
  • कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी के संबंध में रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोनो वायरस महामारी के बाद 60 प्रतिशत महिलाएं स्व-रोज़गार में हैं, जबकि महामारी से पहले यह आंकड़ा 50 प्रतिशत था।
  • हालांकि यह महिलाओं की कार्यबल भागीदारी में वृद्धि का संकेत देता है,किंतु इसके साथ-साथ स्व-रोज़गार आय में गिरावट भी आई, जो 2022 में 2019 की पहली तिमाही की तुलना में 85 प्रतिशत थी, जो महामारी से प्रेरित संकट के प्रभाव को दर्शाती है।
  • इसके अलावा, अंतर-पीढ़ीगत परिवर्तनीयता में भी वृद्धि हुई है, लेकिन सामान्य जातियों से संबंधित श्रमिकों की तुलना में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति श्रेणियों के श्रमिकों के लिए यह प्रवृत्ति कमजोर रही है।
  • शिक्षा और आयु समूहों के आधार पर बेरोजगारी के लिए, रिपोर्ट में कहा गया है कि 25 वर्ष से कम आयु के 42.3 प्रतिशत स्नातक बेरोजगार हैं, जबकि समान आयु वर्ग में उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने वालों के लिए यह आंकड़ा 21.4 प्रतिशत है। उल्लेखनीय रूप से, कम शैक्षणिक योग्यता के साथ बेरोजगारी की दर में भी कमी आई है।
  • रिपोर्ट की सह-लेखिका रोजा अब्राहम के अनुसार, यहां दो चीजें संभावित रूप से हो रही हैं-
    1.  एक तो यह कि एक स्नातक के रूप में आपकी आकांक्षाएं और आप जिस तरह का काम करना चाहते हैं उसकी महत्वाकांक्षा और न्यूनतम वेतन की मांग बहुत अधिक है। इसलिए यदि अर्थव्यवस्था ऐसी नौकरियाँ पैदा नहीं कर रही है, तो वे बेरोजगार होना पसंद करते हैं।
    2.  दूसरा संभावित कारण यह हो सकता है कि स्नातक स्तर की शिक्षा प्राप्त करने वाले लोग उच्च आय वाले घरों से आते हैं या कम से कम एक अच्छी नौकरी करने वाले माता-पिता से जुड़े होते हैं। इस प्रकार के युवाओं के लिए बेरोजगार रहना एक विलासिता है। उन्हें आवश्यक रूप से पैसा कमाने की आवश्यकता नहीं है, यही कारण है कि आप उस श्रेणी के लिए उच्च बेरोजगारी संख्या देखते हैं।
  • अंतर-पीढ़ीगत ऊर्ध्वगामी गतिशीलता के संबंध में, 2018 में आकस्मिक वेतन के रूप में काम करने वाले 75.6 प्रतिशत एससी/एसटी दंपत्ति के बच्चे भी आकस्मिक वेतन वाले काम में शामिल थे। इसकी तुलना में, 2004 में यह आंकड़ा 86.5 प्रतिशत था, जो दर्शाता है कि आकस्मिक वेतन वाले श्रमिकों के बच्चे अन्य प्रकार के रोजगार, विशेष रूप से अनौपचारिक नियमित मजदूरी वाले काम में चले गए हैं।
  • इस आंकड़े में गिरावट सामान्य जाति वर्ग के लिए अधिक महत्वपूर्ण है, जो 2004 में 83.2 प्रतिशत से बढ़कर 2018 में 53 प्रतिशत हो गई है। देखने में एक सुखद बात यह है कि 2004 और 2018 के बीच, ऊपर की ओर गतिशीलता की प्रवृत्ति रही है। यह देखने में बहुत अच्छा है लेकिन दूसरी बात यह है कि इस प्रकार की ऊर्ध्वगामी गतिशीलता सामान्य जातियों के लिए कहीं अधिक सच है। 
  • कार्यबल में जाति-वार भागीदारी पर, रिपोर्ट में पाया गया कि जहां 1983 और 2021 के बीच आकस्मिक वेतन वाले काम में एससी श्रमिकों की हिस्सेदारी में काफी कमी आई है, वहीं सामान्य जाति के श्रमिकों के लिए यह कमी अधिक महत्वपूर्ण रही है। उदाहरण के लिए, 2021 में सामान्य जाति के 13 प्रतिशत श्रमिकों की तुलना में 40 प्रतिशत अनुसूचित जाति के श्रमिक आकस्मिक रोजगार में थे। इसके अलावा, सामान्य जाति के 32% श्रमिकों के विपरीत लगभग 22 प्रतिशत अनुसूचित जाति श्रमिक नियमित वेतनभोगी कर्मचारी थे।
  • आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण 2021-22 के अनुसार, उस अवधि में भारत में बेरोजगारी दर 4.1 प्रतिशत थी। 
  • रिपोर्ट में भारत में आर्थिक विकास की प्रकृति के बारे में कहा गया है कि, एक बात जो सामने आती है वह यह है कि आर्थिक विकास ने रोजगार की गारंटी नहीं दी है। जीडीपी में प्रत्येक प्रतिशत वृद्धि के साथ, रोजगार पैदा करने की क्षमता में व्यवस्थित रूप से गिरावट आई ।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए प्रश्न-

प्रश्न- अजीम प्रेमजी का संबंध किस क्षेत्र से है?

(a) रियल स्टेट

(b) आईटी उद्योग

(b) बैंकर

(d) ज्वेलर्स

उत्तर- (b)

मुख्य परीक्षा के लिए प्रश्न-

प्रश्न-  स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया की रिपोर्ट के आधार पर भारत में बेरोजगारी की स्थिति बताएं।

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