(प्रारंभिक परीक्षा: आर्थिक और सामाजिक विकास) (मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास व रोज़गार से संबंधित विषय, औद्योगिक नीति में परिवर्तन और इनका प्रभाव, समावेशी विकास तथा इससे उत्पन्न विषय) |
संदर्भ
भारत और न्यूजीलैंड द्वारा महज नौ महीनों में एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर वार्ताएं पूरी कर लेना वैश्विक व्यापार कूटनीति के संदर्भ में एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। इस समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर वर्ष 2026 में किए जाने प्रस्तावित हैं। यद्यपि जब विश्व अर्थव्यवस्था संरक्षणवाद एवं भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं से जूझ रही है तो यह समझौता भारत की हिंद-प्रशांत आर्थिक रणनीति और व्यापार विविधीकरण के प्रयासों को मजबूती देता है।
मुक्त व्यापार समझौता: अवधारणा एवं महत्व
- मुक्त व्यापार समझौता दो देशों के बीच ऐसा द्विपक्षीय करार होता है जिसके तहत वस्तुओं, सेवाओं और निवेश पर शुल्क तथा गैर-शुल्क बाधाओं को कम या समाप्त किया जाता है।
- इसका उद्देश्य व्यापार को सुगम बनाना, निवेश प्रवाह बढ़ाना और आर्थिक सहयोग को गहरा करना होता है।
भारत–न्यूजीलैंड FTA के प्रमुख लक्ष्य
इस समझौते के माध्यम से दोनों देश कई रणनीतिक उद्देश्यों को साधना चाहते हैं-
- वर्तमान व्यापार स्तर को दोगुना कर पाँच वर्षों में इसे 5 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य
- मेक इन इंडिया प्रोग्राम के अनुरूप अगले 15 वर्षों में न्यूजीलैंड से लगभग 20 अरब अमेरिकी डॉलर के निवेश को प्रोत्साहन देना
- वैश्विक संरक्षणवाद और कुछ बाजारों में ऊँचे शुल्क के बीच भारतीय निर्यातकों के लिए वैकल्पिक गंतव्य उपलब्ध कराना
- अस्थायी रोजगार वीजा और शैक्षणिक सहयोग के माध्यम से सेवा व्यापार को मजबूती प्रदान करना
वर्तमान व्यापार परिदृश्य
- वित्त वर्ष 2025 में भारत–न्यूजीलैंड द्विपक्षीय व्यापार 1.3 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 49% की वृद्धि दर्शाता है। इसके बावजूद दोनों अर्थव्यवस्थाओं के आकार को देखते हुए यह स्तर अपेक्षाकृत कम है।
- भारतीय निर्यात मुख्यतः फार्मास्यूटिकल्स, वस्त्र, इंजीनियरिंग उत्पाद और आईटी सेवाओं तक सीमित है। न्यूजीलैंड से आयात ऊन, फल, वानिकी उत्पाद और डेयरी वस्तुओं पर केंद्रित है।
- वस्तुतः व्यापार संरचना में असमानता व्याप्त होने के कारण मूल्य-श्रृंखला एकीकरण की संभावनाएँ अभी पूरी तरह साकार नहीं हो पाई हैं।
प्रस्तावित FTA की प्रमुख विशेषताएँ
- शुल्क उदारीकरण: भारत-न्यूजीलैंड के लगभग 95% निर्यात पर शुल्क में छूट देगा, जबकि न्यूजीलैंड भारत की सभी शुल्क लाइनों पर शून्य शुल्क तक पहुँच प्रदान करेगा।
- संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा: भारत ने डेयरी, चावल, गेहूँ, चीनी, प्याज, खाद्य तेल और रबर जैसे क्षेत्रों को उदारीकरण से बाहर रखकर किसानों की आजीविका की रक्षा की है।
- श्रम-प्रधान उद्योगों को बढ़ावा: वस्त्र, परिधान, चमड़ा, जूते, इंजीनियरिंग और फार्मा क्षेत्रों को प्राथमिकता देने से रोजगार सृजन में सहायता मिलेगी।
- सेवाएँ एवं आवागमन: न्यूजीलैंड की तरफ से प्रत्येक वर्ष 5,000 अस्थायी रोजगार वीजा जारी किए जाने का प्रावधान किया गया है जिससे भारतीय पेशेवरों को न्यूजीलैंड में तीन वर्ष तक कार्य करने का अवसर मिलेगा।
चुनौतियाँ और अवरोध
किसी भी बड़े समझौते की तरह इसके कार्यान्वयन में कुछ बाधाएँ संभावित हैं:
- कृषि संबंधी चिंताएँ: भारत में डेयरी एवं बागवानी समूहों की ओर से विरोध की संभावना रहती है।
- न्यूजीलैंड में आंतरिक राजनीति: वहाँ के सत्तारूढ़ गठबंधन में अप्रवासन और स्थानीय डेयरी क्षेत्र पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर मतभेद हो सकते हैं।
- गैर-टैरिफ बाधाएँ (Non-Tariff Barriers): कड़े प्रमाणन मानक एवं स्वच्छता (SPS) नियम शुल्क कटौती के लाभ को सीमित कर सकते हैं।
भविष्य की राह
समझौते को सफल बनाने के लिए केवल कागजी हस्ताक्षर पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि ठोस जमीनी कदम उठाने होंगे:
- एकीकृत मूल्य श्रृंखला: दोनों देशों को मिलकर कृषि-प्रसंस्करण (Agri-processing) में निवेश करना चाहिए ताकि कच्चे माल को उच्च मूल्य वाले उत्पादों में बदला जा सके।
- सेवा क्षेत्र में विस्तार: शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, पर्यटन और डिजिटल सेवाओं में सहयोग के नए द्वार खोलने होंगे।
- सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यमों का सशक्तिकरण: छोटे एवं मध्यम उद्यमों को न्यूजीलैंड के बाजार तक पहुँचने के लिए तकनीकी और वित्तीय सहायता प्रदान करने की आवश्यकता है।
- प्रवासी शक्ति (Diaspora): न्यूजीलैंड में रह रहे भारतीय समुदाय को कौशल हस्तांतरण और नवाचार के सेतु के रूप में उपयोग किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता घरेलू हितों और वैश्विक व्यापार आकांक्षाओं के बीच एक संतुलित प्रस्थान बिंदु है। यदि इसका प्रभावी कार्यान्वयन किया जाता है तो यह न केवल व्यापारिक लाभ प्रदान करेगा, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की आर्थिक स्थिति को अधिक मजबूत करेगा। यह समझौता स्थिरता, आय सुरक्षा एवं सतत आर्थिक विकास के लक्ष्यों के अनुरूप है।