संदर्भ
- पिछले लगभग छह दशकों में भारतीय चुनावी राजनीति में महिलाओं की भूमिका में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। आज महिलाओं की मतदान भागीदारी लगभग पुरुषों के बराबर पहुँच चुकी है, और कई राज्य चुनावों में तो महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से भी अधिक रहा है। फिर भी यह बढ़ती हुई भागीदारी राजनीतिक प्रतिनिधित्व और निर्णय-निर्माण की शक्ति में समान रूप से परिलक्षित नहीं होती। इस प्रकार भारतीय लोकतंत्र में एक स्पष्ट विरोधाभास दिखाई देता है—चुनावी प्रक्रिया में व्यापक समावेशन, लेकिन संरचनात्मक स्तर पर समानता का अभाव।
मतदाता के रूप में महिलाओं की स्थिति
- स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती दशकों में चुनावी भागीदारी में स्पष्ट लैंगिक अंतर मौजूद था। यद्यपि महिलाओं को औपचारिक रूप से मतदान का अधिकार प्राप्त था, फिर भी उनका मतदान प्रतिशत पुरुषों की तुलना में काफी कम रहा। उदाहरण के लिए, 1967 के लोकसभा चुनाव में पुरुषों का मतदान प्रतिशत 66.7 था, जबकि महिलाओं का 55.5 प्रतिशत था, अर्थात लगभग 11.2 प्रतिशत अंकों का अंतर। इसी प्रकार 1971 के चुनाव में यह अंतर बढ़कर 11.8 प्रतिशत अंक हो गया।
- वस्तुतः इस अंतर के पीछे कई सामाजिक-संरचनात्मक कारण थे। महिलाओं की अपेक्षाकृत कम साक्षरता, सार्वजनिक स्थानों पर सीमित आवाजाही, घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ तथा राजनीतिक दलों की ओर से महिलाओं तक सीमित पहुँच—ये सभी कारक महिलाओं की कम भागीदारी के लिए जिम्मेदार रहे।
- हालाँकि 1980 के दशक के बाद से यह अंतर धीरे-धीरे कम होने लगा। 2009 तक यह घटकर 4.4 प्रतिशत अंक रह गया। पिछले एक दशक में इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिला।
- 2014 के लोकसभा चुनाव में यह अंतर केवल 1.5 प्रतिशत अंक रह गया, जबकि 2019 और 2024 के चुनावों में महिलाओं का मतदान लगभग पुरुषों के बराबर दर्ज किया गया।
राज्य विधानसभा चुनावों में रुझान
- राज्य विधानसभा चुनावों के आँकड़े भी इसी प्रवृत्ति की पुष्टि करते हैं। 1990 के दशक के प्रारंभिक वर्षों में महिलाओं का मतदान प्रतिशत औसतन पुरुषों से 4–5 प्रतिशत अंक कम था। लेकिन 2000 के दशक में यह अंतर लगातार कम होता गया। 2005–07 के चुनावों में यह घटकर 1.8 प्रतिशत अंक रह गया और 2008–10 तक यह 1 प्रतिशत अंक के आसपास पहुँच गया।
- 2011 के बाद स्थिति में एक नया बदलाव देखा गया। कई राज्यों में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक होने लगा। 2011–13 के बीच औसत अंतर 1.13 प्रतिशत अंक रहा, जो 2015–16 में बढ़कर 2.82 प्रतिशत अंक तक पहुँच गया। यद्यपि बाद के वर्षों में यह अंतर कुछ कम हुआ, फिर भी 2020–25 की अवधि में यह 1.6 प्रतिशत अंक के सकारात्मक स्तर पर बना रहा। इस प्रकार दीर्घकालीन दृष्टि से देखा जाए तो पहले लैंगिक अंतर कम हुआ और बाद में महिलाओं की हल्की बढ़त में परिवर्तित हो गया।
मतदान से परे राजनीतिक भागीदारी
- मतदान में लगभग समानता प्राप्त होने के बावजूद चुनावी अभियानों में महिलाओं की सक्रियता अभी भी पुरुषों की तुलना में कम है।
- 2009 से 2024 के बीच हुए लोकसभा चुनावों में पुरुषों की भागीदारी सार्वजनिक राजनीतिक गतिविधियों—जैसे सभाओं, रैलियों या जुलूसों में अधिक रही है।
- हालाँकि समय के साथ महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि अवश्य हुई है। चुनावी सभाओं और रैलियों में महिलाओं की उपस्थिति 2009 में लगभग 9 प्रतिशत थी, जो हाल के चुनावों में बढ़कर लगभग 16 प्रतिशत तक पहुँच गई है। फिर भी पुरुषों की भागीदारी लगभग दोगुनी बनी हुई है।
- इसी प्रकार जुलूसों और घर-घर जाकर प्रचार करने जैसी गतिविधियों में भी महिलाओं की भागीदारी लगभग 5–6 प्रतिशत से बढ़कर 11 प्रतिशत तक पहुँची है, लेकिन यह पुरुषों से अभी भी पीछे है। इससे स्पष्ट होता है कि महिलाएँ सार्वजनिक राजनीतिक गतिविधियों में अधिक दिखाई देने लगी हैं, परंतु चुनावी अभियानों में उनकी सक्रिय भूमिका अभी सीमित है।
पारिवारिक स्वीकृति और सामाजिक प्रतिबंध
- महिलाओं की राजनीतिक सक्रियता पर सामाजिक और पारिवारिक संरचनाओं का भी गहरा प्रभाव पड़ता है। 2019 में किए गए लोकनीति–सीएसडीएस सर्वेक्षण के अनुसार, अधिकांश महिलाओं ने बताया कि रैलियों में भाग लेने, उम्मीदवारों से मिलने या प्रचार गतिविधियों में शामिल होने के लिए उन्हें परिवार की अनुमति की आवश्यकता होती है। इससे स्पष्ट है कि राजनीतिक भागीदारी में लैंगिक अंतर केवल व्यक्तिगत रुचि या क्षमता का परिणाम नहीं है, बल्कि सामाजिक मानदंडों और पारिवारिक संरचनाओं से भी जुड़ा हुआ है।
प्रतिनिधित्व का प्रश्न
- जहाँ मतदाता के रूप में महिलाओं की भागीदारी लगभग बराबरी तक पहुँच चुकी है, वहीं संसद में उनका प्रतिनिधित्व अभी भी सीमित है। 1952 की पहली लोकसभा में केवल 22 महिलाएँ चुनी गई थीं। इसके बाद कई दशकों तक महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम स्तर पर ही बना रहा। 1977 में यह संख्या घटकर केवल 19 रह गई।
- 21वीं सदी में कुछ सुधार अवश्य दिखाई देता है। 2009 में 59 महिला सांसद चुनी गईं, 2014 में यह संख्या 62 हुई और 2019 में बढ़कर 78 तक पहुँच गई, जो अब तक का उच्चतम स्तर है। 2024 के चुनाव में यह संख्या थोड़ी घटकर 74 रह गई। फिर भी कुल लोकसभा सदस्यों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 14 प्रतिशत ही है, जो कि मतदाताओं में उनकी लगभग आधी आबादी के अनुपात से बहुत कम है।
उम्मीदवार चयन में असमानता
- महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व को समझने के लिए उम्मीदवारों की संख्या का विश्लेषण भी महत्वपूर्ण है। 1957 में केवल 45 महिलाओं ने लोकसभा चुनाव लड़ा था, जबकि 1996 तक यह संख्या बढ़कर 599 हो गई।
- हाल के चुनावों में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है—
- 2014 में 668,
- 2019 में 726 और
- 2024 में 800 महिला उम्मीदवार मैदान में थीं।
- फिर भी कुल उम्मीदवारों की तुलना में यह संख्या काफी कम है, क्योंकि पुरुष उम्मीदवारों की संख्या हजारों में होती है। इसलिए चुनावी प्रतिस्पर्धा में महिलाएँ अभी भी अल्पसंख्यक हैं।
जीतने की क्षमता का तर्क
- राजनीतिक दल अक्सर यह तर्क देते हैं कि महिलाएँ चुनाव जीतने में अपेक्षाकृत कम सक्षम होती हैं, इसलिए उन्हें कम टिकट दिए जाते हैं। लेकिन उपलब्ध आँकड़े इस धारणा का समर्थन नहीं करते। 1957 के चुनाव में लगभग 49 प्रतिशत महिला उम्मीदवार विजयी हुई थीं, जबकि पुरुषों की सफलता दर लगभग 33 प्रतिशत थी। वस्तुतः 1962 में भी महिलाओं की सफलता दर 47 प्रतिशत थी, जबकि पुरुषों की 25 प्रतिशत।
- यद्यपि हाल के चुनावों में भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। 2019 में लगभग 11 प्रतिशत महिला उम्मीदवार जीतने में सफल रहीं, जबकि पुरुषों की सफलता दर लगभग 6 प्रतिशत थी। 2024 में भी महिलाओं की सफलता दर 9 प्रतिशत रही, जो पुरुषों के 6 प्रतिशत से अधिक है। इससे स्पष्ट होता है कि अवसर मिलने पर महिलाएँ चुनाव जीतने में सक्षम हैं।
राजनीतिक स्वायत्तता और सामाजीकरण
- महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व केवल उम्मीदवारों की सीमित संख्या का परिणाम नहीं है, बल्कि राजनीतिक स्वायत्तता से जुड़ी चुनौतियों से भी संबंधित है। यद्यपि महिलाएँ मतदान में सक्रिय हैं, परंतु उनके मतदान निर्णय हमेशा पूरी तरह स्वतंत्र नहीं होते। 2014 में लगभग 51 प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि उन्होंने बिना किसी सलाह के मतदान किया, जबकि 2024 में यह आँकड़ा थोड़ा घटकर 50 प्रतिशत रह गया।
- इसके अतिरिक्त कई महिलाएँ परिवार के भीतर राजनीतिक समानता को महत्वपूर्ण मानती हैं। लगभग 52 प्रतिशत महिलाओं का मानना है कि परिवार के सदस्यों के साथ समान राजनीतिक विचार होना आवश्यक है।
राजनीतिक व्यवस्था में संरचनात्मक बाधाएँ
- राजनीतिक व्यवस्था के भीतर भी कई बाधाएँ मौजूद हैं। लोकनीति–सीएसडीएस के अध्ययन के अनुसार 58 प्रतिशत महिलाओं का मानना है कि राजनीतिक परिवार से आने वाली महिलाओं के लिए राजनीति में प्रवेश करना अपेक्षाकृत आसान होता है। इसी प्रकार 57 प्रतिशत महिलाओं का कहना है कि आर्थिक रूप से संपन्न पृष्ठभूमि की महिलाओं को राजनीति में लाभ मिलता है।
- लगभग 44 प्रतिशत महिलाओं को लगता है कि राजनीतिक दल उम्मीदवार चयन में पुरुषों को प्राथमिकता देते हैं। इसी तरह कई महिलाओं का यह भी मानना है कि मतदाता भी पुरुष उम्मीदवारों के पक्ष में अधिक झुकाव रखते हैं।
सामाजिक और संरचनात्मक चुनौतियाँ
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जब महिलाओं से उनकी राजनीतिक भागीदारी में बाधा बनने वाले कारकों के बारे में पूछा गया, तो कई प्रकार के सामाजिक और संरचनात्मक कारण सामने आए। लगभग 22 प्रतिशत महिलाओं ने पितृसत्तात्मक व्यवस्था को सबसे बड़ी बाधा बताया। इसके बाद घरेलू जिम्मेदारियाँ (13 प्रतिशत) और व्यक्तिगत स्तर की सीमाएँ—जैसे आत्मविश्वास, जागरूकता या अनुभव की कमी (12 प्रतिशत) प्रमुख कारणों के रूप में सामने आईं।
समाधान और आगे की दिशा
महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को वास्तविक प्रतिनिधित्व में बदलने के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुधार आवश्यक हैं।
- सबसे पहले, राजनीतिक दलों में आंतरिक सुधार आवश्यक है। दलों को उम्मीदवार चयन प्रक्रिया में महिलाओं के लिए न्यूनतम कोटा या लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए, ताकि उन्हें पर्याप्त संख्या में टिकट मिल सकें।
- दूसरा, महिला आरक्षण का प्रभावी क्रियान्वयन अत्यंत महत्वपूर्ण है। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें उनके प्रतिनिधित्व को संरचनात्मक रूप से बढ़ा सकती हैं।
- तीसरा, राजनीतिक प्रशिक्षण और नेतृत्व विकास की आवश्यकता है। महिलाओं के लिए नेतृत्व प्रशिक्षण, राजनीतिक शिक्षा और क्षमता निर्माण कार्यक्रम उनके आत्मविश्वास और राजनीतिक दक्षता को बढ़ा सकते हैं।
- चौथा, आर्थिक और संसाधन संबंधी सहायता भी महत्वपूर्ण है। चुनाव लड़ना महँगा होता है, इसलिए महिलाओं को वित्तीय सहायता, अभियान संसाधन और नेटवर्क उपलब्ध कराए जाने चाहिए।
- पाँचवाँ, सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन आवश्यक है। पितृसत्तात्मक मान्यताओं को चुनौती देने, महिलाओं की सार्वजनिक भूमिका को स्वीकार करने तथा परिवार और समाज में समानता को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता और शिक्षा महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
निष्कर्ष
- स्पष्ट है कि भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की चुनावी भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और मतदान के स्तर पर लगभग समानता स्थापित हो चुकी है। इसके बावजूद राजनीतिक प्रतिनिधित्व और निर्णय-निर्माण की शक्ति में महिलाओं की उपस्थिति अभी भी सीमित है।
- महिला आरक्षण विधेयक का पारित होना इस असमानता को दूर करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। हालांकि वास्तविक चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि महिलाओं की बढ़ती चुनावी भागीदारी राजनीतिक संस्थाओं में प्रभावी प्रतिनिधित्व और वास्तविक निर्णय-निर्माण की शक्ति में भी परिवर्तित हो सके।