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भारत में अध्यादेश (Ordinance) और न्यायिक स्वतंत्रता पर उठे संवैधानिक प्रश्न

संदर्भ 

  • भारतीय लोकतंत्र की नींव शक्ति के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत पर टिकी है, जहाँ न्यायपालिका को कार्यपालिका के किसी भी हस्तक्षेप से मुक्त रखने का प्रावधान है। हाल ही में सरकार द्वारा लाए गए एक अध्यादेश और कोलेजियम द्वारा उस पर दिखाई गई सहमति ने इस स्थापित संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राष्ट्रपति द्वारा जारी इस अध्यादेश के जरिए सुप्रीम कोर्ट में जजों की स्वीकृत संख्या 34 से बढ़ाकर 38 कर दी गई है, जिसके बाद रिक्त पदों पर नई नियुक्तियां भी हो चुकी हैं। 
  • इस कदम ने कानूनी विशेषज्ञों के बीच एक गंभीर विमर्श को जन्म दिया है कि क्या यह प्रक्रिया न्यायपालिका की निष्पक्षता और सेवाकाल की सुरक्षा (Security of Tenure) को प्रभावित करती है। 

अध्यादेश की संवैधानिक सीमाएं और न्यायपालिका का रुख 

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 123 राष्ट्रपति को अध्यादेश (Ordinance) जारी करने की असाधारण शक्ति देता है। इसका उपयोग केवल तब किया जा सकता है जब संसद का सत्र न चल रहा हो और कोई तात्कालिक या आपातकालीन स्थिति उत्पन्न हो गई हो।  
  • अस्थायी प्रकृति : अध्यादेश द्वारा बनाया गया कानून स्थायी नहीं होता। संसद का सत्र दोबारा शुरू होने के छह सप्ताह के भीतर यदि इसे दोनों सदनों की मंजूरी नहीं मिलती, तो यह स्वतः ही निष्प्रभावी हो जाता है। 
  • पुनः प्रख्यापन (Re-promulgation) पर रोक : सरकारें अक्सर विधायी गतिरोध से बचने के लिए एक ही अध्यादेश को बार-बार जारी करती रही हैं। 

यद्यपि इस प्रवृत्ति पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक निर्णयों में कड़ा रुख अपनाया है : 

  • डी.सी. वाधवा बनाम बिहार राज्य (1986) : शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया था कि बार-बार अध्यादेश लाना विधायी प्रक्रिया को दरकिनार करना है और यह संविधान के साथ एक धोखा है।
  • कृष्णा कुमार सिंह बनाम बिहार राज्य (2017) : सात जजों की संविधान पीठ ने दोहराया कि अध्यादेश का उपयोग संसद के समानांतर कानून बनाने की फैक्ट्री के रूप में नहीं किया जा सकता। यह केवल असाधारण परिस्थितियों के लिए आरक्षित एक असाधारण व्यवस्था है। 

न्यायाधीशों की संख्या का निर्धारण और बुनियादी ढांचा 

  • संविधान के अनुच्छेद 124(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट के जजों की संख्या तय करने का अधिकार संसद को कानून (Statute) बनाकर दिया गया है। इतिहास में जब भी जजों की संख्या बढ़ी है, वह संसदीय अधिनियम के माध्यम से ही हुआ है। 
  • वर्ष 2015 के प्रसिद्ध एनजेएसी (NJAC) मामले (सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ) में कोर्ट ने 99वें संविधान संशोधन को केवल इसलिए रद्द कर दिया था क्योंकि उसमें कार्यपालिका (कानून मंत्री) को जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में वीटो जैसी शक्ति मिल रही थी। तब कोर्ट ने माना था कि:
    • न्यायिक स्वतंत्रता संविधान का एक मूल ढांचा (Basic Structure) है, जिससे कोई समझौता नहीं हो सकता। न्यायपालिका को न केवल बाहरी दबाव से मुक्त होना चाहिए, बल्कि जनता की नजरों में उसे कार्यपालिका से पूरी तरह तटस्थ और अलग दिखना भी चाहिए। 

वर्तमान संकट: अस्थायी पदों पर स्थायी नियुक्तियां 

वर्तमान विवाद की जड़ें इस बात में छिपी हैं कि जो 5 नए जज नियुक्त हुए हैं, उनमें से 3 जज उन पदों पर बैठे हैं जिनका सृजन किसी स्थायी कानून द्वारा नहीं, बल्कि एक अस्थायी अध्यादेश के जरिए हुआ है। यह स्थिति निम्नलिखित तीन मोर्चों पर चिंता पैदा करती है: 

1. सेवाकाल की असुरक्षा (Compromised Tenure):

  • संविधान जजों को हटाने के लिए महाभियोग जैसी बेहद जटिल प्रक्रिया देता है ताकि वे निडर होकर काम कर सकें। लेकिन यहाँ, जिन पदों पर ये तीन जज नियुक्त हैं, 
    • वे पद ही छह सप्ताह बाद समाप्त हो सकते हैं यदि संसद इसे कानून में न बदले। 
    • राष्ट्रपति इस अध्यादेश को कभी भी वापस ले सकते हैं।
  • ऐसी स्थिति में जजों का अस्तित्व अप्रत्यक्ष रूप से सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर हो जाता है। 

2. पक्षपात का आभास (Perception of Bias):

  • सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आने वाले अधिकांश मामलों में केंद्र सरकार स्वयं एक पक्ष (Litigant) होती है। ऐसे में जो जज अपने पद के स्थायित्व के लिए सरकार के संसदीय बहुमत पर निर्भर हैं, उनके द्वारा दिए गए फैसलों पर (चाहे वे कितने भी निष्पक्ष क्यों न हों) जनता के बीच पक्षपात का संदेह पैदा हो सकता है।

3. कोलेजियम का सोचा-समझा जोखिम:

  • कोलेजियम द्वारा इस अध्यादेश को स्वीकार करना एक रणनीतिक भूल या एक बड़ा जोखिम माना जा सकता है। न्यायपालिका ने अपनी संस्थागत प्रतिष्ठा को राजनीतिक प्रक्रिया के भरोसे छोड़ दिया है, जो भविष्य में कार्यपालिका के साथ सौदेबाजी (Negotiation) की संस्कृति को बढ़ावा दे सकता है।

संभावित संवैधानिक चुनौतियाँ

स्थिति

परिणाम

यदि विधेयक अध्यादेश का स्थान ले लेता है

यह विसंगति समाप्त हो जाएगी। जजों के पद वैध और स्थायी हो जाएंगे, जिससे तात्कालिक संवैधानिक संकट टल जाएगा।

यदि विधेयक पारित नहीं होता है

अदालत की स्वीकृत संख्या फिर से 34 हो जाएगी। चूंकि 'वाधवा केस' के तहत दोबारा अध्यादेश लाना प्रतिबंधित है, इसलिए वे पद समाप्त हो जाएंगे। उन पदों पर आसीन जजों के भविष्य और निष्कासन को लेकर एक अभूतपूर्व संवैधानिक संकट खड़ा हो जाएगा, क्योंकि जजों को पद से हटाने की सामान्य प्रक्रिया यहां लागू करना जटिल होगा। 

दिए गए फैसलों की वैधता: डी फैक्टो सिद्धांत 

  • यदि भविष्य में यह अध्यादेश संसद में पारित नहीं भी होता है, तो भी इन जजों द्वारा इस अवधि में दिए गए निर्णय कानूनी रूप से अमान्य नहीं होंगे। गोकारजू रंगाराजू बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1981) के मामले के अनुसार, डी फैक्टो डॉक्ट्रिन सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि पद पर रहते हुए किसी प्राधिकारी द्वारा जनहित में किए गए कार्य वैध माने जाते हैं, भले ही बाद में उनकी नियुक्ति में कोई तकनीकी या संवैधानिक त्रुटि क्यों न पाई जाए। 

व्यापक प्रभाव 

न्यायिक स्वतंत्रता पर:

  • अध्यादेश के आधार पर की गई नियुक्तियों को मान्यता देने से न्यायपालिका की संस्थागत एवं संरचनात्मक स्वायत्तता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। 
  • इससे ऐसी परंपरा विकसित होने की आशंका है, जिसमें कार्यपालिका संसद की पूर्ण विधायी प्रक्रिया से गुज़रे बिना न्यायालय की संरचना को प्रभावित कर सके। परिणामस्वरूप, न्यायपालिका की निष्पक्षता और स्वतंत्रता को लेकर जनता की धारणा कमजोर पड़ सकती है। 

संवैधानिक शासन पर:

  • यह घटनाक्रम अध्यादेश जारी करने की संवैधानिक शक्ति के दायरे और उसके उचित प्रयोग पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
  • साथ ही, यह डी.सी. वाधवा निर्णय द्वारा स्थापित सिद्धांतों की व्यावहारिक सीमाओं की भी परीक्षा लेता है।
  • भविष्य में अध्यादेश की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाले नए वादों और न्यायिक विवादों की संभावना बढ़ सकती है।  

कोलेजियम प्रणाली पर:

  • कोलेजियम द्वारा इस अध्यादेश को स्वीकार करना एक रणनीतिक लेकिन जोखिमपूर्ण निर्णय के रूप में देखा जा सकता है।
  • इस कदम से ऐसा प्रतीत होता है कि संस्था ने अपनी साख और विश्वसनीयता को इस उम्मीद पर निर्भर कर दिया है कि राजनीतिक प्रक्रिया अंततः इसे विधिक मान्यता प्रदान करेगी।
  • इसके दूरगामी प्रभाव न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच भविष्य में होने वाले संवाद तथा संबंधों पर भी पड़ सकते हैं। 

विशेषज्ञों की प्रमुख चिंताएँ  

  • न्यायाधीशों के पद की सुरक्षा (Security of Tenure) न्यायिक स्वतंत्रता का मूल आधार है, और ऐसी व्यवस्था इस सिद्धांत को कमजोर कर सकती है।
  • न्यायपालिका का वास्तव में स्वतंत्र होना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक यह भी है कि वह कार्यपालिका से स्पष्ट रूप से स्वतंत्र दिखाई दे, ताकि जनता का विश्वास बना रहे।
  • इतिहास में राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट की कोर्ट-पैकिंग योजना (Court-Packing Plan) जैसे उदाहरण दर्शाते हैं कि न्यायालय की संरचना में कार्यपालिका का हस्तक्षेप लोकतांत्रिक संस्थाओं के संतुलन के लिए खतरा बन सकता है। 
  • डी.सी. वाधवा और कृष्णा कुमार सिंह मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि अध्यादेश की शक्ति का उपयोग नियमित कानून निर्माण के विकल्प के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। ये निर्णय अध्यादेशों को समानांतर विधायी माध्यम बनाने के विरुद्ध चेतावनी देते हैं।
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