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परिसीमन पर बहस: संघवाद, लोकतंत्र और समान मत-मूल्य के बीच संतुलन

संदर्भ 

लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों के संभावित पुनर्निर्धारण के साथ परिसीमन (Delimitation) एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। वर्ष 2027 की जनगणना के आंकड़ों के बाद परिसीमन की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है। यह केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदलने का विषय नहीं, बल्कि संघवाद, लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व, जनसंख्या नियंत्रण और ‘एक व्यक्ति, एक मत, एक मूल्य’ के बीच संतुलन का प्रश्न है।  

परिसीमन का अर्थ और संवैधानिक आधार 

  • परिसीमन का अर्थ लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण तथा सीटों के पुनर्समायोजन से है। इसके दो प्रमुख आयाम हैं - 
    • पहला, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच उनकी जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण और
    • दूसरा, प्रत्येक राज्य के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण।  
  • इस प्रक्रिया को स्वतंत्र परिसीमन आयोग द्वारा संचालित किया जाता है। आयोग के आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और उन्हें न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। 
  • संविधान का अनुच्छेद 81 लोकसभा की संरचना तथा राज्यों के बीच सीटों के आवंटन से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद 82 प्रत्येक जनगणना के बाद सीटों और निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्समायोजन का प्रावधान करता है। वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था में लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 550 निर्धारित है। 

सीटों के पुनर्वितरण पर रोक 

  • राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का अंतिम पुनर्वितरण वर्ष 1973 में 1971 की जनगणना के आधार पर किया गया था। इसके बाद संसद ने 1976 और 2001 में सीटों के पुनर्वितरण को स्थगित किया और यह रोक वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ा दी गई। 
  • वर्ष 2001 की जनगणना के बाद गठित परिसीमन आयोग ने राज्यों के बीच सीटों के अनुपात में बदलाव किए बिना केवल राज्यों के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया। इसकी सिफारिशें 2008 में लागू हुईं और 2009 का लोकसभा चुनाव नए निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर हुआ। 

संविधान संशोधन की आवश्यकता क्यों? 

  • नए परिसीमन के लिए अपने-आप में संविधान संशोधन आवश्यक नहीं है, क्योंकि अनुच्छेद 81 और 82 इसके लिए पहले से संवैधानिक आधार प्रदान करते हैं। संशोधन तभी आवश्यक होगा, जब मौजूदा प्रावधानों में बदलाव किया जाना हो।
  • उदाहरण के लिए, लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या बढ़ाना या 2027 की जनगणना के बजाय 2011 की जनगणना को परिसीमन का आधार बनाना संविधान संशोधन की मांग करेगा। इसी संदर्भ में लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाकर 850 तक करने, 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण करने और कुल सीटों में एक-तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षण जैसे प्रस्ताव चर्चा में रहे हैं। 

किसे लाभ, किसे नुकसान? 

  • परिसीमन का सबसे संवेदनशील पक्ष राज्यों की जनसंख्या वृद्धि में अंतर है। वर्तमान में 543 लोकसभा सीटों का वितरण मुख्यतः 1971 की जनगणना पर आधारित है। यदि भविष्य में नई जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण किया जाता है, तो दक्षिणी राज्यों की सीटों में हिस्सेदारी घटने की आशंका है, जबकि उत्तर भारत के अधिक जनसंख्या वाले राज्यों, विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान, को अपेक्षाकृत अधिक सीटें मिल सकती हैं। 
  • इसका कारण यह है कि दक्षिणी राज्यों ने अपेक्षाकृत पहले जनसंख्या स्थिरीकरण हासिल किया, जबकि कई उत्तरी राज्यों में लंबे समय तक जनसंख्या वृद्धि की दर अधिक रही। इस प्रकार, परिसीमन अप्रत्यक्ष रूप से उन राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकता है, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया है। 

मत के असमान मूल्य की समस्या 

  • सीटों के पुनर्वितरण पर लंबे समय तक लगी रोक ने राज्यों के बीच एक सांसद द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने वाले मतदाताओं की संख्या में बड़ा अंतर पैदा किया है।  
  • वर्ष 1967 में अधिकांश बड़े राज्यों में एक सांसद लगभग चार से पांच लाख मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करता था। आज केरल में एक सांसद लगभग 14 लाख, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार में लगभग 19 लाख मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करता है। राष्ट्रीय स्तर पर यह औसत लगभग 18 लाख मतदाता प्रति निर्वाचन क्षेत्र हो सकता है।
  • इस स्थिति से ‘एक व्यक्ति, एक मत, एक मूल्य’ के सिद्धांत पर प्रश्न उठता है। यदि एक सांसद अलग-अलग राज्यों में अलग संख्या में मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करता है, तो प्रत्येक मत का प्रभाव समान नहीं रह जाता।

संघवाद बनाम लोकतांत्रिक समानता 

  • परिसीमन के केंद्र में दो परस्पर संबंधित, लेकिन कई बार विरोधी सिद्धांत हैं। पहला है संघवाद, जिसके अनुसार राज्य भारतीय संघ की महत्वपूर्ण राजनीतिक इकाइयां हैं। इसलिए जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को केवल कम जनसंख्या के कारण राजनीतिक प्रतिनिधित्व में नुकसान नहीं होना चाहिए।  
  • दूसरी ओर लोकतांत्रिक समानता का सिद्धांत प्रत्येक नागरिक के मत को समान महत्व देने की मांग करता है। अनुच्छेद 81 में यथासंभव राष्ट्रीय औसत जनसंख्या के आधार पर सीट आवंटन की व्यवस्था इसी संतुलन की गुंजाइश प्रदान करती है।  

अतः चुनौती यह है कि जनसंख्या आधारित समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करते हुए राज्यों के संघीय हितों की भी रक्षा की जाए।

जानबूझकर हेरफेर की चुनौती 

  • परिसीमन में केवल मतदाताओं की संख्या समान करना पर्याप्त नहीं है। निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं किस प्रकार निर्धारित की जाती हैं, इसका चुनावी परिणामों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है। 
  • क्रैकिंग, जिसमें किसी दल के समर्थकों को अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में इस प्रकार फैला दिया जाता है कि वे बहुमत न बना सकें; और पैकिंग, जिसमें किसी दल के समर्थकों को कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में अत्यधिक केंद्रित कर दिया जाता है। दोनों स्थितियां मतों और सीटों के बीच असंतुलन पैदा कर सकती हैं। इसलिए परिसीमन प्रक्रिया में पारदर्शिता और स्वतंत्र निगरानी अत्यंत आवश्यक है। 

आगे की राह 

  • परिसीमन को व्यापक राजनीतिक और अंतर-राज्यीय सहमति के साथ आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। इसके लिए सीटों के पुनर्वितरण और निर्वाचन क्षेत्र निर्धारण के पारदर्शी एवं वस्तुनिष्ठ मानदंड तय किए जाने चाहिए। राजनीतिक फेरबदल की आशंका को रोकने के लिए स्वतंत्र निगरानी तथा सार्वजनिक परामर्श को मजबूत करना होगा। 
  • जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों के हितों की रक्षा के लिए राज्यसभा में प्रतिनिधित्व या वित्तीय हस्तांतरण जैसे क्षतिपूरक उपायों पर भी विचार किया जा सकता है। साथ ही, स्पष्ट समय-सीमा और व्यापक जन-जागरूकता सुनिश्चित करना आवश्यक है। 

निष्कर्ष 

  • परिसीमन महज निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारत के संघीय ढांचे, लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक शक्ति के भविष्य से जुड़ा संवेदनशील विषय है। एक ओर समान मत-मूल्य लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल भावना है, वहीं दूसरी ओर जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के हितों की रक्षा संघवाद की आवश्यकता है।
  • इसलिए आगामी परिसीमन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत लोकतांत्रिक समानता और संघीय संतुलन के बीच कितना विवेकपूर्ण सामंजस्य स्थापित करता है। पारदर्शिता, राजनीतिक सहमति, स्वतंत्र प्रक्रिया और राज्यों के हितों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण ही इस चुनौती का दीर्घकालिक समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं। 
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